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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

प्रकरण ग्रन्थ

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प्रकरण ग्रंथ ऐसे निबंध हैं जो वेदांग आदि दर्शन ग्रंथों के विषयों पर अलग से विचार करते हैं। विष्णुधर्मोत्तर पुराण में प्रकरण की यह परिभाषा दी गयी है, शास्त्रैकादेशमबधं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितं अहुह प्रकारं नाम ग्रन्थभेदं विपस्तितः । प्रकरण ग्रन्थों में शंकराचार्य के ग्रन्थ प्रमुख हैं। उन्होंने विवेकचूडामणि, उपदेशसाहस्री, मनीषापञ्चकम, अपरोक्षानुभूति, आत्मबोध, दशश्लोकी, शतश्लोकी, वाक्यवृत्ति, तत्वबोध, प्रबोधसुधाकर,पञ्चीकरण आदि कई रचनाएँ लिखी हैं। माधवन के दशप्रकरण भी प्रसिद्ध हैं। बृहदयोगवाशिष्ठ वाल्मीकि द्वारा रचित एक ग्रंथ है। किसी निबन्ध की समीक्षा चार कारकों द्वारा की जानी चाहिए। इन्हें सहायक के रूप में जाना जाता है। (१) अधिकारी: अधिकारी अध्ययन के योग्य व्यक्ति है। प्राधिकार का निर्धारण होना चाहिए। ग्रन्थ के आरम्भ में यह संकेत दिया जाएगा कि ग्रन्थ किसके लिए है। (२) विषय : इसका प्रतिपाद्य विषय क्या है, इसका निर्धारण अवश्य होना चाहिए। (३) सम्बन्ध : उपाय और प्रक्रिया के बीच संबंध मजबूत होना चाहिए। (४) प्रयोजन : प्रक्रिया के लाभों पर विचार किया जाना चाहिए। इतिहास एवं प्रयोजन भारतीय दर्शन का विकास सूत्र रूप से प्रारम्भ होकर भाष्य, वार्तिक आदि के रूप में हुआ। इस क्रम के विकास होने में कई सौ वर्षों का समय लगा। वार्तिक का विकास भाष्य में भी कुछ अर्थों के अवशिष्ट रह जाने के कारण हुआ। वार्तिक के रचना के बाद इनके उपर भी अनेकों व्याख्या-ग्रन्थों के विकास होने लगा, यह क्रम भारतीय ज्ञान परम्परा के विकास का स्वर्णकाल रहा है। इस विकास क्रम से इन दर्शनों के सिद्धान्त पुष्ट और परिमार्जित होने के साथ-साथ विरोधी मतों को भी अत्यधिक प्रभावशाली ढंग से खण्डन किये। किन्तु इस विकास क्रम से एक समस्या भी बढने लगी थी, वह यह थी - इनमें प्रारम्भिक तौर पर अध्ययन कर्ताओं कि अरूचि। अरूचि के पनपने का कारण था कि सूत्र, भाष्य और वार्तिक आदि क्रम से विकसित हुये ग्रन्थ अत्यन्त कठिन और दुरूह होने के कारण इनमें प्रवेश पाना बालकों अथवा अल्पबुद्धि वाले मनुष्यों के लिये आसान नही था। इसलिये तत्कालीन आचार्यों ने इन समस्याओं के समाधान के लिये प्रकरण ग्रन्थों कि रचना की। । प्रकरण ग्रन्थ का प्रमुख प्रयोजन यह होता है कि बालकों को अल्प श्रम से ही उस उस शास्त्र में प्रवेश में मिल जाये। प्रायः प्रत्येक प्रकरण ग्रन्थ के मङ्गलाचरण में प्राय: प्रमुख प्रयोजन के रूप में बालकों को सुखपूर्वक बोध को ही ग्रन्थ का प्रमुख प्रयोजन बताया जाता है, जैसे तर्कसंग्रह के मंगलाचरण में स्पष्ट कहा गया कि बालकों को सुखपूर्वक न्यायशास्त्र में प्रवेश के लिये इसकी रचना करता हूँ। इसी प्रकार से तर्कभाषा के भी मंगलाचरण में उल्लेख मिलता है कि जो बालक न्यायशास्त्र में अत्यल्प श्रम से प्रवेश कि कामना करते है उनको ध्यान में रखकर न्यायशास्त्र कि रचना करते है। इसी प्रकार से अर्थसंग्रह के भी मङ्गलाचरण में भी स्पष्ट कहते है कि जैमिनी मत में प्रवेश के लिये अर्थसंग्रह कि रचना करते है। दर्शनिक ग्रन्थ और उनके प्रमुख प्रकरण-ग्रन्थ उत्तरमीमांसा -- तत्त्वबोध, आत्मबोध, वेदान्तसार न्यायदर्शन -- न्यायसार (भासर्वज्ञ), तर्कभाषा (केशव मिश्र) वैशेषिक दर्शन -- लक्षणावली (उदयनाचार्य), तर्कसंग्रह (अन्नम्भट्ट), तर्कामृतम् (जगदीश), भाषापरिच्छेद सांख्य दर्शन -- सांख्यसार (विज्ञानभिक्षु), सांख्यकारिका (ईश्वरकृष्ण), योग दर्शन -- योगसारसंग्रह (विज्ञानभिक्षु) जैन न्याय -- तर्कभाषा (आचार्य यशोविजय) नास्तिक दर्शन -- न्यायप्रवेशकसूत्र (दिङ्नाग) , न्यायबिन्दु (धर्मकीर्ति), तर्कभाषा,(मोक्षाकर) बाहरी कड़ियाँ श्री शंकराचार्य द्वारा रचित प्रकरण ग्रन्थ भारतीय दर्शन के प्रकरण ग्रन्थों का ऐतिहासिक विश्लेषण श्रेणी:भारतीय दर्शन sa:प्रकरणग्रन्थाः