Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

स्वास्थ्य विज्ञान

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

thumb|हाथ धोना, स्वच्छता का एक रूप, संक्रामक रोगों के प्रसार को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है। right|thumb|300px|इक्वाडोर के पम्पुएन्सा में एक साधारण व्यवस्था में, मूत्र-अपवर्तन शुष्क शौचालय (यूरिन-डायवर्जन ड्राई टॉयलेट) का उपयोग करने के बाद एक साधारण नल से हाथ धोते हुए। right|thumb|300px|अस्थायी चलित शौचालय स्वास्थ्यविज्ञान (Hygiene) का ध्येय है कि प्रत्येक मनुष्य की शारीरिक वृद्धि और विकास और भी अधिक पूर्ण हो, जीवन और भी अधिक तेजपूर्ण हो, शारीरिक ह्रास और भी अधिक धीमा हो और मृत्यु और भी अधिक देर से हो। वास्तव में स्वास्थ्य का अर्थ केवल रोगरहित और दु:खरहित जीवन नहीं है। केवल जीवित रहना ही स्वास्थ्य नहीं है। यह तो पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक हृष्टता पुष्टता की दशा है। अधिकतम सुखमय जीवन और अधिकतम मानवसेवा का अवसर पूर्ण स्वस्थता से ही संभव हैं। वायु, जल और भोजन - ये तीन पदार्थ शरीर को धारण करनेवाले तीन आधार स्तम्भ हैं । तथापि इन तीनों पदार्थों में वायु सबसे अधिक आवश्यक है, वायु के बाद जल, और जल के बाद भोजन। ऐसा इसलिये कि बिना भोजन के मनुष्य कई सप्ताहों तक जी सकता है, बिना जल के कई दिनों तक जी सकता है, लेकिन बिना हवा के कई मिनटों तक जीना भी कठिन है । इसी कारण से हवा प्राण कही जाती है। ये तीन पदार्थ इतने आवश्यक होने पर भी यदि योग्य परिमाण में तथा विशुद्ध अवस्था में न मिलें, तो प्राण-रक्षा करने के बजाय प्राणों के गाहक बन जाते हैं । इसलिये इनका पूरा पूरा ज्ञान कर लेना शरीर के स्वास्थ्य के लिये नितान्त आवश्यक है।स्वास्थ्य-विज्ञान (लेखक- डॉ० भास्कर गोविन्द घाणेकर) परिचय स्वास्थ्य से सभी परिचित हैं किंतु पूर्ण स्वास्थ्य का स्तर निश्चित करना कठिन है। प्रत्येक स्वस्थ मनुष्य अपने प्रयास से और भी अधिक स्वस्थ हो सकता है। व्यक्ति के स्वास्थ्य सुधार से समाज और राष्ट्र का स्वास्थ्य स्तर ऊँचा होता है। अपने व्यक्तिगत स्वास्थ्योपार्जन का भार प्रत्येक प्राणी पर ही है। जिस प्रकार धन, विद्या, यश आदि द्वारा जीवन की सफलता अपने ही प्रयास से प्राप्त होती है उसी प्रकार स्वास्थ्य के लिए प्रत्येक को प्रयत्नशील होना आवश्यक है। अनायास या दैवयोग से स्वास्थ्य प्राप्ति नहीं होती परंतु प्राकृतिक स्वास्थ्यप्रद नियमों का निरंतर पालन करने से ही स्वास्थ्य प्राप्ति और उसका संरक्षण संभव है। स्वास्थ्य के संवर्धन, संरक्षण तथा पुनःस्थापन का ज्ञान स्वास्थ्यविज्ञान द्वारा होता है। यह कार्य केवल डाक्टरों द्वारा ही संपन्न नहीं हो सकता। यह तो जनता तथा उसके नेताओं के सहयोग से ही संभव है। स्वास्थ्यवेत्ता सेनानायक की भाँति अस्वास्थ्यता से युद्ध करने हेतु संचालन और निर्देशन करता है किंतु युद्ध तो समस्त जनता को सैनिक की भाँति लड़ना पड़ता है। इसी कारण स्वास्थ्यविज्ञान भी एक सामाजिक शास्त्र है। संपूर्ण समाज की अस्वास्थ्यता के निवारणार्थ संगठित प्रयास लोकस्वास्थ्य की उन्नति के लिए आवश्यक है। लोकस्वास्थ्य लोकस्वास्थ्य के सुधार के लिए स्वास्थ्यसंबंधी आवश्यक ज्ञान प्रत्येक मनुष्य को होना चाहिए। इस ज्ञान के अभाव में कोई सुधार नहीं हो सकता। स्वास्थ्य संबंधी कानून की उपयोगिता स्वास्थ्य शिक्षा के अभाव में नगण्य है और स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा जनता में स्वास्थ्य चेतना होने पर कानून को विशेष आवश्यकता नहीं रहती। स्वास्थ्यशिक्षा वही सफल होती है जो जनता को स्वस्थ्य जीवनयापन की ओर स्वभावत: प्रेरित कर सके। प्रत्येक प्राणी को अपने स्वास्थ्य सुधार के लिए स्वास्थ्य शिक्षा तथा सभी प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त होनी चाहिए। यह तो जन्मसिद्ध मानव अधिकार है और कोई कल्याणकारी राज्य इस सुकार्य से मुख नहीं मोड़ सकता। रोग एक देश से दूसरे देशों में फैल जाते हैं। इसलिए किसी देशविशेष का यदि स्वास्थ्यस्तर गिरा हुआ है तो वह सभी देशों के लिए भयावह है। इसी कारण अंतर्जातीय संस्थाओं द्वारा रोगनियंत्रण और स्वास्थ्यसुधार का कार्य सभी देशों में करने का प्रयास किया जाता है। स्वास्थ्य की देखरेख जन्म से मृत्यु पर्यत सभी के लिए आवश्यक है। मातृत्व स्वास्थ्य, बाल स्वास्थ्य, पाठशाला स्वास्थ्य, व्यावसायिक स्वास्थ्य, सैनिक स्वास्थ्य, जरावस्था, संक्रामक और अन्य रोगों की रोकथाम, रोगचिकित्सा, जल, भोजन और वायु की स्वच्छता, परिवेश स्वास्थ्य आदि स्वास्थ्यविज्ञान के महत्वपूर्ण अंग है। सर्वांगपूर्ण बहुमुखी योजना द्वारा स्वास्थ्यसुधार राष्ट्रोन्नति का प्रमुख साधन है। राष्ट्र के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, उत्पादन और सामाजिक न्याय समान रूप से आवश्यक है और इन चारों क्षेत्रों में संतुलित विकास ही राष्ट्रोन्नति का राजमार्ग प्रशस्त करता है। ये चारों परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं और किसी को भी एक दूसरे से पृथक् नहीं किया जा सकता। प्रत्येक मनुष्य प्राप्त धन से संतोष न कर उससे अधिक उपार्जन करने की निरंतर चेष्टा करता है उसी प्रकार प्रस्फुटित (radiant) स्वास्थ्य लाभ के लिए निरंतर प्रयास द्वारा उत्तरोत्तर वृद्धि पूर्ण धनात्मक (positive) स्वास्थ्य प्राप्त करना चाहिए। सर्वांगपूर्ण स्वास्थ्य के लिए शारीरिक और मानसिक स्वस्थ्यता के साथ साथ प्रत्येक व्यक्ति को समाज में सम्मानित पद भी प्राप्त करना आवश्यक है। समाज द्वारा समादृत स्वस्थ पुरुष अपने समाजसेवी कत्र्तव्यों द्वारा ही समाज का उपयोगी अंग बन सकता है। समाज में हीन पद पानेवाला व्यक्ति स्वस्थ नहीं गिना जा सकता है। लोक-स्वास्थ्य-सुधार का इतिहास तीन कालों में बँटा हुआ हैं : पहला परिशोधी काल जिसमें जल, वायु, भोजन, शरीर, वस्त्र आदि की स्वच्छता का ध्यान दिया जाता था। दूसरा कीटाणु शास्त्र संबंधी ज्ञान का काल जिसमें संक्रामक रोगों का वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त कर उनसे बचने की चेष्टा की गई और तीसरा धनात्मक स्वास्थ्य का वर्तमान काल जिसमें शारीरिक, मानसिक और सामाजिक हृष्टपुष्टतायुक्त सर्वांगपूर्ण समस्त जनता का स्वास्थ्य उत्तरोत्तर संवर्धन किया जाता है। सन्दर्भ इन्हें भी देखें स्वास्थ्य स्वास्थ्य सेवा स्वास्थ्य पर्यटन स्वास्थ्य शिक्षा श्रेणी:स्वास्थ्य श्रेणी:स्वच्छता *