411 REFERENCE · Wikipedia
गोपाल मंदिर झाबुआ
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
गोपाल मंदिर झाबुआ Gopal mandir jhabua.jpg गोपाल मंदिर झाबुआ गोपाल मंदिर झाबुआ India Madhya Pradesh 22.7628 74.5967 inline,title गोपाल कालोनी, झाबुआ पूज्य रामशंकर जी जानी (बड़े बापजी), पूज्य घनश्याम प्रभु जी जानी (छोटे बापजी), माँ रविकांता बेन (गोपाल प्रभु) चार दिवसीय वार्षिकोत्सव, गुरु पूर्णिमा, कृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, गणेश चतुर्थी पंडित विश्वनाथ जी त्रिवेदी (मोटा भाई) स्थापना तिथि: ६ मई १९७१ (१० मई १९७० भूमि पूजन) gopalmandirjhabua.blogspot.com
गोपाल मंदिर झाबुआ भारत के मध्य प्रदेश राज्य के झाबुआ शहर में स्थित एक सुप्रसिद्ध और विशिष्ट हिंदू मंदिर व आध्यात्मिक केंद्र है। यह मंदिर मुख्य रूप से ऋषिकुल परंपरा के तीन महान आध्यात्मिक गुरुओं—पूज्य रामशंकर जी जानी (बड़े बापजी), पूज्य घनश्याम प्रभु जी जानी (छोटे बापजी) और माँ रविकांता बेन (गोपाल प्रभु) की दिव्य चेतना को समर्पित है। यह मंदिर झाबुआ के 'गोपाल कॉलोनी' क्षेत्र में स्थित है और अपनी अनूठी परंपराओं, जैसे कि मूर्ति के स्थान पर 'चित्र पूजा' और पूर्णतः शांत व ध्यानमयी वातावरण के लिए पूरे देश में विशिष्ट स्थान रखता है।Gopal Mandir Jhabua: Timings, History, Travel Guide and how to reach https://tfipost.com/2023/03/gopal-mandir-jhabua-timings-history-travel-guide-and-how-to-reach/ TFI Post 2026-07-01
इतिहास एवं स्थापना
श्री गोपाल मंदिर के निर्माण की वैचारिक पृष्ठभूमि वर्ष १९६८ में तैयार हुई थी। तब भरूच में निवास कर रहीं तीसरी गादीपति माँ गोपाल के आशीर्वाद के लिए झाबुआ के भक्त पहुँचे थे। माँ गोपाल ने झाबुआ में गुरु-भाइयों के एकत्र होने और सामूहिक भजन-पूजन के लिए एक स्थल (कॉलोनी and हॉल) निर्माण की स्वीकृति दी। माँ गोपाल ने स्वयं मंदिर निर्माण के श्रीगणेश हेतु ₹१००१ की पावन राशि पंडित विश्वनाथ जी त्रिवेदी (मोटा भाई) को भेंट की थी।
इसके पश्चात्, वर्ष १९६८ से मंदिर का निर्माण कार्य स्थानीय श्रद्धालुओं के स्वतःस्फूर्त और ऐतिहासिक श्रमदान से प्रारंभ हुआ। करीब तीन वर्षों के अथक परिश्रम के बाद, ६ मई १९७१ को मोहिनी एकादशी के पावन अवसर पर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ प्रभु गोपाल जी की स्थापना की गई और मंदिर का भव्य शुभारंभ हुआ। मंदिर के सुचारू संचालन हेतु सर्वसम्मति से 'गोपाल मंदिर ट्रस्ट' का गठन किया गया।
माँ गोपाल के १० विशेष निर्देश
मंदिर निर्माण के समय माँ गोपाल ने इसके स्वरूप और दर्शन को शुद्ध रखने के लिए १० कड़े और विशिष्ट निर्देश दिए थे, जिनमें पारंपरिक धार्मिक बाह्य आडंबरों का निषेध कर आंतरिक भक्ति पर बल दिया गया था। इनका आज भी पूर्णतः पालन किया जाता है:
मंदिर के निर्माण या संचालन के लिए कभी चंदा नहीं लेना।
किसी भी व्यक्ति का नाम लिखी हुई वस्तु (शिलालेख/पट्टिका) मंदिर में नहीं लगानी।
मंदिर के गर्भगृह में कोई भौतिक मूर्ति स्थापित नहीं करनी।
मंदिर के शिखर पर गुम्बज, घंटा, घड़ियाल, ध्वज, त्रिशूल या कलश आदि कुछ भी नहीं लगाना।
मंदिर को बाहरी दुनिया या दूसरों को दिखाने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि केवल भक्तों के एकांत भजन हेतु बनाना।
मंदिर में मुख्य रूप से केवल पाँच पावन चित्र (फोटो) ही लगाना।
मंदिर में पुजारी के रहने के आवास की पीछे की दीवार मंदिर से एक ही (सटी हुई) हो।
रसोईघर में छोटी अलमारी और फ्लैट रैक की व्यवस्था हो।
बंगले के बड़े कमरे में बड़ी अलमारी हो।
गुरु-परंपरा (आध्यात्मिक गद्दी)
गोपाल मंदिर की वैचारिक और आध्यात्मिक यात्रा मुख्य रूप से ऋषिकुल मंडल के तीन महान गुरुओं के इर्द-गिर्द केंद्रित है:
आद्य गुरु - बड़े बापजी (पूज्य रामशंकर जानी): इस भक्ति और आध्यात्मिक मार्ग की शुरुआत वर्ष १९२९ में बड़े बापजी ने की थी। उनका मूल पैतृक स्थान वर्तमान गुजरात के जंत्राल में स्थित है। उन्होंने जंत्राल में ऋषिकुल की स्थापना कर चुनिंदा शिष्यों को भजनों, उपदेशों और सत्संग के माध्यम से दीक्षित किया। उन्होंने १६ फरवरी १९४७ को देह त्याग किया।
द्वितीय गुरु - छोटे बापजी (पूज्य घनश्याम जानी): बड़े बापजी के महाप्रयाण के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र घनश्यामराय जानी जी (छोटे बापजी) ने इस आध्यात्मिक उत्तरदायित्व को संभाला। उन्होंने मात्र ४० वर्ष की आयु में ८ जुलाई १९६० को देह त्याग किया।
तृतीय गादीपति - गोपाल प्रभु (पूज्य रविकांताबेन जानी): ४ जनवरी १९२० (पौष चौदस) को जन्मीं गुरु-पत्नी रविकांताबेन जानी इस पथ की तीसरी गादीपति बनीं। उनकी अगाध भक्ति और दैवीय आभा के कारण भक्तों ने उन्हें 'गोपाल प्रभु' का नाम दिया। उन्होंने वर्ष १९६० से लेकर ७ फरवरी १९७५ (स्वधाम प्रस्थान) तक हज़ारों श्रद्धालुओं को सन्मार्ग दिखाया।
सेवा का आधुनिक कालक्रम
पंडित विश्वनाथ जी त्रिवेदी (मोटा भाई), जिन्हें गंभीर चिंतन और उत्कृष्ट गुरु की तलाश थी, वे बड़े बापजी के सानिध्य में आए थे। उन्होंने जीवन पर्यंत मंदिर और ऋषिकुल मंडल की अनन्य सेवा की। २२ अगस्त १९९१ को उनके देहावसान के बाद, उनके ज्येष्ठ सुपुत्र श्री रविन्द्र नाथ जी त्रिवेदी ने इस सेवाभार को संभाला (देवलोकगमन वर्ष २००७)। वर्तमान में, उनके सुपुत्र पंडित रूपक त्रिवेदी द्वारा पूरी निष्ठा के साथ मंदिर की पूजा-अर्चना और परंपराओं का निर्वाह किया जा रहा है।
जन्म शताब्दी महोत्सव (ऐतिहासिक आयोजन)
ऋषिकुल परंपरा के गुरुओं के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने के लिए झाबुआ स्थित गोपाल मंदिर में समय-समय पर अत्यधिक उच्च स्तर और विशाल पैमाने पर ऐतिहासिक समारोहों का आयोजन किया जाता रहा है। इनमें मुख्य रूप से दो आयोजन अत्यंत महत्वपूर्ण रहे हैं:
सद्गुरु घनश्याम प्रभु १००वां जन्म शताब्दी महोत्सव (२०१४)
वर्ष २०१४ में द्वितीय गुरु पूज्य घनश्याम प्रभु (छोटे बापजी) के १००वें जन्म शताब्दी वर्ष के पावन अवसर पर झाबुआ में एक विशाल और अभूतपूर्व आध्यात्मिक समागम का आयोजन किया गया था। इस महोत्सव को "आस्था का महाकुंभ" कहा गया, जिसमें देश के कोने-कोने (गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली आदि) से हज़ारों गुरु-भक्त झाबुआ पहुँचे थे। इस भव्य उत्सव के दौरान कई दिनों तक अखंड भजन-कीर्तन, धार्मिक संगोष्ठियाँ और विशाल भंडारों का आयोजन उच्च स्तर पर किया गया, जिससे संपूर्ण झाबुआ क्षेत्र भक्तिमय हो उठा था।झाबुआ में आस्था का महाकुंभ: सद्गुरु घनश्याम प्रभु के 100वें जन्म शताब्दी महोत्सव में उमड़ा भक्ति का सैलाब https://www.jhabuanews.in/2014/09/gopal-mandir-jhabua-100th-shatabdi-mahotsav-2014.html Jhabua News 2026-07-01दीपोत्सव की तरह जगमगाया गोपाल मंदिर https://www.bhaskar.com/news/mp-oth-mat-latest-jhabua-news-023013-562899-nor.html दैनिक भास्कर: 2026-07-01
गोपाल प्रभु १००वां जन्म शताब्दी महोत्सव (२०२०)
जनवरी २०२० में तीसरी गादीपति माँ रविकांता बेन (गोपाल प्रभु) के जन्म शताब्दी वर्ष को समर्पित एक भव्य त्रैमासिक और त्रि-दिवसीय (3 days) मुख्य अध्यात्म महोत्सव का आयोजन किया गया। इस महोत्सव के समापन के अवसर पर विशाल महाआरती का आयोजन किया गया था, जिसमें हज़ारों दीपों से मंदिर प्रांगण जगमगा उठा था। इस उच्च स्तरीय त्रि-दिवसीय आयोजन में देश-विदेश में बसे ऋषिकुल परिवार के लाखों भक्तों ने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सहभागिता की थी। इस दौरान सामूहिक भजन संध्या और जनकल्याण के संकल्पों के साथ महोत्सव का भव्य समापन हुआ था।गोपाल प्रभु 100 जन्म शताब्दी महोत्सव : महाआरती के साथ हुआ ३ दिवसीय अध्यात्म महोत्सव का समापन https://www.jhabuanews.in/2020/01/p-92011.html Jhabua News 2026-07-01Gopal Mandir Janm Shatabdi Mahotsav 2020 https://gopalmandirjhabua.blogspot.com/2020/01/gopal-mandir-janm-shatabdi-mahotsav-2020.html Gopal Mandir Jhabua Official Blog 2026-07-01झाबुआ में अध्यात्म का महाकुंभ: गोपाल मंदिर में शताब्दी समारोह का भव्य समापन, लाखों भक्त हुए भावविभोर https://ashanews.in/jhabua/grand-conclusion-of-the-centenary-celebrations-at-gopal-mandir-jhabua Asha News 2026-07-01 अगस्त 2026 InternetArchiveBot
अनूठी परंपराएँ और विशेषताएँ
गोपाल मंदिर देश के अन्य पारंपरिक हिंदू मंदिरों से सर्वथा भिन्न है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
मूर्ति रहित 'चित्र पूजा': वर्ष १९६० में अपने महाप्रयाण से ठीक पहले छोटे बापजी ने आध्यात्मिक मार्ग में एक बड़ा क्रांतिकारी बदलाव किया। उन्होंने साकार मूर्ति पूजा के स्थान पर 'चित्र पूजा' (तस्वीर की आराधना) का मार्ग दिखाया। इसी कारण मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है।
ध्वज, घंटा और कलश का निषेध: पूर्णतः शांत, एकाग्र और ध्यानमयी वातावरण सुनिश्चित करने के लिए इस मंदिर के शिखर पर न तो कोई ध्वज लगाया जाता है, न कलश स्थापित है, और न ही यहाँ घंटियाँ बजाई जाती हैं। यहाँ का मौन ही इसकी सबसे बड़ी प्रार्थना है।
सामाजिक योगदान और प्रथम नियोजित कॉलोनी
तीसरी गादीपति गोपाल प्रभु की दिव्य इच्छा थी कि स्थानीय लोगों और गुरुभाइयों के लिए पक्के आवास हों। इसी उद्देश्य से मंदिर निर्माण के साथ ही यहाँ हाउसिंग बोर्ड से ऋण (Loan) लेकर एक साथ ३३ सर्वसुविधायुक्त मकान बनाए गए। इस पूरे परिवेश को **'गोपाल कॉलोनी'** नाम दिया गया, जो झाबुआ शहर के इतिहास की पहली पूर्णतः सुनियोजित (Planned) कॉलोनी मानी जाती है।
भौगोलिक विस्तार और वैश्विक परिवार
झाबुआ के "श्री गोपाल मंदिर" के अलावा गुजरात के जंत्राल में मुख्य "ऋषिकुल मंदिर", लिमखेड़ा में "श्री घनश्याम मंदिर" तथा ग्राम बावड़ी में "ऋषिकुल आश्रम बावड़ी" स्थापित हैं।
वर्तमान में इस आध्यात्मिक विचारधारा का विस्तार भारत के २२ राज्यों (जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली आदि) में है। इसके अलावा, यह परिवार वैश्विक स्तर पर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, स्विट्जरलैंड, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, दुबई (संयुक्त अरब अमीरात), नेपाल, न्यूजीलैंड और सिंगापुर जैसे देशों तक फैला हुआ है, जो निरंतर इस ऋषिकुल के उत्थान में अपना योगदान दे रहे हैं।
मंदिर परिसर की संस्थाएँ व दैनिक अनुष्ठान
मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक चेतना का केंद्र है। मंदिर कार्यसमिति की देखरेख में निम्नलिखित संस्थाएँ संचालित होती हैं:
श्री गोपाल वाचनालय: इस समृद्ध वाचनालय में धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और साहित्यिक विषयों से जुड़ी लगभग २०,००० से ४०,००० उत्कृष्ट पुस्तकों का अनूठा संग्रह है, जो शोधार्थियों और स्थानीय पाठकों के लिए ज्ञान का केंद्र है।झाबुआ के गोपाल मंदिर में स्कूल के साथ है बीस हजार पुस्तकों का संग्रह https://www.jagran.com/spiritual/mukhye-dharmik-sthal-gopal-mandir-the-gopal-temple-of-jhabua-has-a-collection-of-twenty-thousand-books-along-with-the-school-23662001.html दैनिक जागरण 2026-07-01
श्री गोपाल शिशु विद्या मंदिर: यहाँ बच्चों के लिए कक्षा १ से ५ तक प्राथमिक शिक्षा प्रदान की जाती है, जिसका पूर्ण संचालन और प्रबंधन मंदिर ट्रस्ट द्वारा किया जाता है।
दैनिक एवं वार्षिक कार्यक्रम
दैनिक क्रम: मंदिर में प्रतिदिन प्रातः ९:३० बजे मुख्य आरती होती है तथा सायंकाल ८:०० से ९:०० बजे तक नियमित भजन संध्या का आयोजन किया जाता है।
वार्षिकोत्सव: प्रतिवर्ष मई माह में चार दिवसीय भव्य वार्षिकोत्सव मनाया जाता है, जिसमें मंदिर की विशेष साज-सज्जा की जाती है और देश-विदेश से हज़ारों श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं। इस दौरान विशाल भंडारे और अखिल भारतीय भजन प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है। गोपाल मंदिर वार्षिकोत्सव : महाआरती के साथ हुआ तीन दिवसीय अध्यात्म महोत्सव का समापन https://www.jhabuanews.in/2019/05/gopal-mandir-jhabua-annual-function-2019.html Jhabua News: 2026-07-01
अन्य उत्सव: गुरु पूर्णिमा, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी और गणेश चतुर्थी के अवसर पर मंदिर में विशेष आध्यात्मिक अनुष्ठान होते हैं।
पहुँच मार्ग
गोपाल मंदिर झाबुआ शहर के मध्य भाग में स्थित होने के कारण सड़क और रेल परिवहन से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है:
रेल मार्ग: सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन मेघनगर रेलवे स्टेशन है, जो मंदिर से मात्र १५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मेघनगर से बस, जीप या स्थानीय वाहनों द्वारा आसानी से झाबुआ पहुँचा जा सकता है।
सड़क मार्ग: यह मंदिर गुजरात के दाहोद शहर से ७५ किलोमीटर और मध्य प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर से १५० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। उज्जैन से भी यहाँ के लिए सुलभ सड़क परिवहन उपलब्ध है।
सन्दर्भ
विकिमैपिया पर देखें, गोपाल मंदिर झाबुआ,
बाहरी कड़ियाँ
श्री गोपाल मंदिर झाबुआ की आधिकारिक वेबसाइट
गोपाल मंदिर झाबुआ: ऑनलाइन दर्शन पोर्टल
http://www.wikimapia.org/#lang=en&lat=22.762856&lon=74.596699&z=18&m=b&search=gopal%20mandir%20jhabua विकिमैपिया पर गोपाल मंदिर की भौगोलिक स्थिति
दैनिक भास्कर: मोबाइल पर भी कर सकेंगे गोपाल मंदिर के लाइव दर्शन
दैनिक भास्कर: गोपाल मंदिर के वार्षिकोत्सव में देशभर से आए श्रद्धालु
गोपाल मंदिर यात्रा गाइड - Trip.com
नईदुनिया: गुरु महाराज माता गोपाल प्रभु का जन्मदिन श्रद्धा-आस्था के साथ मना
पत्रिका: आजादी की 75वीं वर्षगांठ में आजादी के अमृत महोत्सव में गोपाल मंदिर परिसर में परिचर्चा का आयोजन
श्री गोपाल मंदिर आधिकारिक फेसबुक पेज
http://www.youtube.com/thegopalmandir श्री गोपाल मंदिर आधिकारिक यूट्यूब चैनल
श्रेणी:झाबुआ जिले के धार्मिक स्थल
श्रेणी:मध्य प्रदेश के हिन्दू मंदिर
श्रेणी:झाबुआ