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411 समाचार
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पीथमपुर के कालेश्वरनाथ

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जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर जिला मुख्यालय से 11 कि. मी. और दक्षिण पूर्वी मध्य रेल्वे के चांपा जंक्शन से मात्र 8 कि. मी. की दूरी पर हसदेव नदी के दक्षिणी तट पर पीथमपुर में कालेश्वरनाथ का एक मंदिर है। जांजगीर के कवि श्री तुलाराम गोपाल ने ``िशवरीनारायण और सात देवालय`` में पीथमपुर को पौराणिक नगर माना है। प्रचलित किंवदंति को आधार मानकर उन्होंने लिखा है कि पौराणिक काल में धर्म वंश के राजा अंगराज के दुराचारी पुत्र राजा बेन प्रजा के उग्र संघर्ष में भागते हुए यहां आये और अंत में मारे गए। चूंकि राजा अंगराज बहुत ही सहिष्णु, दयालु और धार्मिक प्रवृत्ति के थे अत: उनके पवित्र वंश की रक्षा करने के लिए उनके दुराचारी पुत्र राजा बेन के मृत शरीर की ऋषि-मुनियों ने इसी स्थान पर मंथन किया। पहले उसकी जांघ से कुरूप बौने पुरूष का जन्म हुआ। बाद में भुजाओं के मंथन से नर-नारी का एक जोड़ा निकला जिन्हें पृथु और अर्चि नाम दिया गया। ऋषि-मुनियों ने पृथु और अर्चि को पति-पत्नी के रूप में मान्यता देकर विदा किया। इधर बौने कुरूप पुरूष महादेव की तपस्या करने लगा। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव उन्हें दर्शन देकर पार्थिव लिंग की स्थापना और पूजा-अर्चना का विधान बताकर अंतध्र्यान हो गये। बौने कुरूप पुरूष ने जिस कालेश्वर पार्थिव लिग की स्थापना कर पूजा-अर्चना करके मुक्ति पायी थी वह काल के गर्त में समाकर अदृश्य हो गया था। वही कालान्तर में हीरासाय तेली (वैश्य) को दर्शन देकर उन्हें न केवल पेट रोग से मुक्त किया बल्कि उसके वंशबेल को भी बढ़ाया। श्री तुलसीराम पटेल द्वारा सन 1954 में प्रकािशत श्री कलेश्वर महात्म्य में हीरासाय के वंश का वर्णन हैं- तेहिके पुत्र पांच हो भयऊ। िशव सेवा में मन चित दियेऊ।। प्रथम पुत्र टिकाराम पाये। बोधसाय भागवत, सखाराम अरु बुद्धू कहाये।। सो िशवसेवा में अति मन दिन्हा। यात्रीगण को िशक्षा दिन्हा।। यही विघि िशक्षा देते आवत। सकल वंश िशवभक्त कहावत।। कहना न होगा हीरासाय का पूरा वंश िशवभक्त हुआ और मंदिर में प्रथम पूजा का अधिकार पाया। श्री प्यारेलाल गुप्त ने भी `प्राचीन छत्तीसगढ़` में हीरासाय को पीथमपुर के िशव मंदिर में पूजा-अर्चना कर पेट रोग से मुक्त होना बताया हैं। उन्होंंने खरियार (उड़ीसा) के राजा को भी पेट रोग से मुक्त करने के लिए पीथमपुर यात्रा करना बताया हैं। बिलासपर वैभव और बिलासपुर जिला गजेटियर में भी इसका उल्लेख हैं। लेकिन जनश्रुति यह है कि पीथमपुर के कालेश्वरनाथ (अपभ्रंश कलेश्वरनाथ) की फाल्गुन पूर्णिमा को पूजा-अर्चना और अभिषेक करने से वंश की अवश्य वृि़द्ध होती है। खरियार (उड़ीसा) के जिस जमींदार को पेट रोग से मुक्ति पाने के लिए पीथमपुर की यात्रा करना बताया गया है वे वास्तव में अपने वंश की वृिद्ध के लिए यहां आये थे। खरियार के युवराज और उड़ीसा के सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ॰ जे. पी. सिंहदेव ने मुझे बताया कि उनके दादा राजा वीर विक्रम सिंहदेव ने अपने वंश की वृिद्ध के लिए पीथमपुर गए थे। समय आने पर कालेश्वरनाथ की कृपा से उनके दो पुत्र क्रमश: आरतातनदेव और विजयभैरवदेव तथा दो पुत्री कनक मंजरी देवी और शोभज्ञा मंजरी देवी का जन्म हुआ। वंश वृिद्ध होने पर उन्होंने पीथमपुर में एक मंदिर का निर्माण कराया लेकिन मंदिर में मूर्ति की स्थापना के पूर्व 36 वर्ष की अल्पायु में सन् 1912 में उनका स्वर्गवास हो गया। बाद में मंदिर ट्रस्ट द्वारा उस मंदिर में गौरी (पार्वती) जी की मूर्ति स्थापित करायी गयी। यहां एक किंवदंति और प्रचलित है जिसके अनुसार एक बार नागा साधु के आशीर्वाद से कुलीन परिवार की एक पुत्रवधू को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। इस घटना को जानकर अगले वर्ष अनेक महिलाएं पुत्ररत्न की लालसा लिए यहां आई जिससे नागा साधुओं को बहुत परेशानी हुई और उनकी संख्या धीरे धीरे कम होने लगी। कदाचित् इसी कारण नागा साधुओं की संख्या कम हो गयी है। लेकिन यह सत्य है कि आज भी अनेक दंपत्ति पुत्र कामना लिए यहां आती हैं और मनोकामना पूरी होने पर अगले वर्ष जमीन पर लोट मारते दर्शन करने यहां जाते हैं। पीथमपुर के काल कालेश्वरनाथ की लीला अपरम्पार है। छत्तीसगढ़ के भारतेन्दु कालीन कवि श्री वरणत सिंह चौहान ने `िशवरीनारायण महात्म्य और पंचकोसी यात्रा` नामक पुस्तक में पीथमपुर की महत्ता का बखान किया है :- हसदो नदी के तीर में, कलेश्वरनाथ भगवान। दर्शन तिनको जो करे, पावही पद निर्वाण।। फाल्गुन मास की पूर्णिमा, होवत तहं स्नान। काशी समान फल पावही, गावत वेद पुराण।। बारह मास के पूर्णिमा, जो कोई कर स्नान। सो जैईहैं बैकुंठ को, कहे वरणत सिंह चौहान।। पीथमपुर के कालेश्वरनाथ मंदिर की दीवार में लगे शिलालेख के अनुसार [[बिलासपुर]] नामी गुजराती रल्वे ठेकेदार के श्री जगमाल गांगजी ठेकेदार जो की मूल कच्छ कुम्भारीआ के निवासी थे और हसदेव नदी पर रेल्वे पुल बनाए है उन्होंने ने इस मंदिर का निर्माण कार्तिक सुदि 2, संवत् 1953 (सन् 1896) को गोकुल धनजी मिस्त्री से कराया था। चांपा के पडित छविनाथ द्विवेदी ने सन् 1897 में संस्कृत में ``कलिश्वर महात्म्य स्त्रोत्रम`` लिखकर प्रकािशत कराया था। इस ग्रंथ में उन्होंने कालेश्वरनाथ का उद्भव चैत्र कृष्ण प्रतिपदा संवत् 1940 (अर्थात सन् 1883 ई.) को होना बताया है। मंदिर निर्माण संवत् 1949 (सन् 1892) में शुरू होकर संवत् 1953 (सन् 1896) में पूरा होने, इसी वर्ष मूर्ति की प्रतिष्ठा हीरासाय तेली (वैश्य) के हाथों कराये जाने तथा मेला लगने का उल्लेख है। इसी प्रकार पीथमपुर मठ के महंत स्वामी दयानंद भारती ने भी संस्कृत में ``पीथमपुर के श्री शंकर माहात्म्य`` लिखकर सन् 1953 में प्रकािशत कराया था। 36 “लोक में उन्होंने पीथमपुर के िशवजी को काल कालेश्वर महादेव, पीथमपुर में चांपा के सनातन धर्म संस्कृत पाठशला की शाखा खोले जाने, सन् 1953 में ही तिलभांडेश्वर, काशी से चांदी के पंचमुखी िशवजी की मूर्ति बनवाकर लाने और उसी वर्ष से पीथमपुर के मेले में िशवजी की शोभायात्रा निकलने की बातों का उल्लेख किया है। उन्होंने पीथमपुर में मंदिर की व्यवस्था के लिए एक मठ की स्थापना तथा उसके 50 वर्षों में दस महंतों के नामों का उल्लेख इस माहात्म्य में किया है। इस माहात्म्य को लिखने की प्रेरणा उन्हें पंडित िशवशंकर रचित और सन् 1914 में जबलपुर से प्रकािशत ``पीथमपुर माहात्म्य`` को पढ़कर मिली। जन आकांक्षाओं के अनुरूप उन्होंने महात्म्य को संस्कृत में लिखा। इसके 19 वें “लोक में उन्होंने लिखा है कि वि. सं. 1945, फाल्गुन पूर्णमासी याने होली के दिन से इस शंकर देव स्थान पीथमपुर की ख्याति हुई। इसी प्रकार श्री तुलसीराम पटेल ने पीथमपुर : श्री कलेश्वर महात्म्य में लिखा है कि तीर्थ पुरोहित पंडित काशीप्रसाद पाठक पीथमपुर निवासी के प्रपिता पंडित रामनारायण पाठक ने संवत् 1945 को हीरासाय तेली (वैश्य) को िशवलिंग स्थापित कराया था। पीथमपुर में काल कालेश्वरनाथ मंदिर के निर्माण के साथ ही मेला लगना शुरू हो गया था। प्रारम्भ में यहां का मेला फाल्गुन पूर्णिमा से चैत्र पंचमी तक ही लगता था, आगे चलकर मेले का विस्तार हुआ और इंपीरियल गजेटियर के अनुसार 10 दिन तक मेला लगने लगा। इस मेले में नागा साधु इलाहाबाद, बनारस, हरिद्वार, ऋषिकेष, नासिक, उज्जैन, अमरकंटक और नेपाल आदि अनेक स्थानों से आने लगे। उनकी उपस्थिति मेले को जीवंत बना देती थी। मेले में पंचमी के दिन काल कालेश्वर महादेव के बारात की शोभायात्रा निकाली जाती थी। कदाचित् िशव बारात के इस शोभायात्रा को देखकर ही तुलसी के जन्मांध कवि श्री नरसिंहदास ने उिड़या में िशवायन लिखा। िशवायन के अंत में छत्तीसगढ़ी में िशव बारात की कल्पना को साकार किया है। इसी प्रकार पीथमपुर का मठ खरौद के समान शैव मठ था। खरौद के मठ के महंत गिरि गोस्वामी थे, उसी प्रकार पीथमपुर के इस शैव मठ के महंत भी गिरि गोस्वामी थे। पीथमपुर के आसपास खोखरा और धारािशव आदि गांवों में गिरि गोस्वामियों का निवास था। खोखरा में गिरि गोस्वामी के िशव मंदिर के अवशेष हैं और धारािशव उनकी मालगुजारी गांव है। इस मठ के पहले महंत श्री शंकर गिरि जी महाराज थे जो चार वर्ष तक इस मठ के महंत थे। उसके बाद श्री पुरूषोत्तम गिरि जी महाराज, श्री सोमवारपुरी जी महाराज, श्री लहरपुरी जी महाराज, श्री काशीपुरी जी महाराज, श्री िशवनारायण गिरि जी महाराज, श्री प्रागपुरि जी महाराज, स्वामी गिरिजानन्द जी महाराज, स्वामी वासुदेवानन्द जी महाराज और स्वामी दयानन्द जी महाराज इस मठ के महंत हुए। मठ के महंत तिलभांडेश्वर मठ काशी से संबंधित थे। स्वामी दयानन्द भारतीे जी को पीथमपुर मठ की व्यवस्था के लिए तिलभांडेश्वर मठ काशी के महंत स्वामी अच्युतानन्द जी महाराज ने 20.02.1953 को भेजा था। स्वामी गिरिजानन्दजी महाराज पीथमपुर मठ के आठवें महंत हुए। उन्होंने ही चांपा को मुख्यालय बनाकर चांपा में एक `सनातन धर्म संस्कृत पाठशाला` की स्थापना सन् 1923 में की थी। इस संस्कृत पाठशाला से अनेक विद्यार्थी पढ़कर उच्च िशक्षा के लिए काशी गये थे। आगे चलकर पीथमपुर में भी इस संस्कृत पाठशाला की एक शाखा खोली गयी थी। हांलाकि पीथमपुर में संस्कृत पाठशाला अधिक वर्षों तक नहीं चल सकी (लेकिन उस काल में संस्कृत में बोलना, लिखना और पढ़ना गर्व की बात थी। उस समय रायगढ़ और िशवरीनारायण में भी संस्कृत पाठशाला थी। अफरीद के पंडित देवीधर दीवान ने संस्कृत भाषा में विशेष रूचि होने के कारण अफरीद में एक संस्कृत ग्रंथालय की स्थापना की थी। आज इस ग्रंथालय में संस्कृत के दुर्लभ ग्रंथों का संग्रह है जिसके संरक्षण की आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि यहां के दीवान परिवार का पीथमपुर से गहरा संबंध रहा है। सम्प्रति पीथमपुर का मंदिर अच्छी स्थिति में है। समय समय पर चांपा जमींदार द्वारा निर्माण कार्य कराये जाने का उल्लेख िशलालेख में है। रानी साहिबा उपमान कुंवरि द्वारा फर्श में संगमरमर लगवाया गया है। पीथमपुर के आसपास के लोगों द्वारा और क्षेत्रीय समाजों के द्वारा अनेक मंदिरों का निर्माण कराया गया है।केशरवानी प्रोफ़ेसर पीथमपुर के कालेश्वरनाथ मार्च २००६ बिलासा प्रकाशन बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ५८ २६ जुलाई २००८ सन्दर्भ श्रेणी:भारत के शिव मन्दिर श्रेणी:छत्तीसगढ़ में हिन्दू मन्दिर