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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

कावालम माधव पणिक्कर

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right|thumb|300px|कावालम् माधव पणिक्कर कावालम माधव पणिक्कर (३ जून १८९५ - १० दिसम्बर १९६३) भारत के विद्वान, पत्रकार, इतिहासकार, प्रशासक तथा राजनयज्ञ थे। वे सरदार के एम पणिक्कर के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं। परिचय अंगूठाकार|माओ से-तुंग और कावालम माधव पणिक्कर भारत के आधुनिक राजनयज्ञों में सरदार के0एम0 पणिक्कर के नाम का उल्लेख अवश्य किया जाता है। पणिक्कर चीन में लम्बे समय तक भारत के राजदूत रहे। उनका मानना था कि राजनय का जन्म यूरोप में आधुनिक राज्यों के जन्म से सम्बन्धित है। राजनय की परिभाषा देते हुए पणिक्कर ने कहा, ”अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में प्रयुक्त राजनय अपने हितों को दूसरे देशों से अग्रिम रखने की एक कला है।“ ("Diplomacy used in relation to international politics is the art of forwarding one's interest in relation to other countries.") राजनय एक कला है जिसे अपनाकर विश्व के राज्य अपने पारस्परिक सम्बन्धों को बढ़ाते हुए अपने हित साधना करते हैं। पणिक्कर के अनुसार राजनयज्ञ ”एक देश का दूसरे देश में स्थित आँख और कान है।“ कोई भी देश अपने राजनयज्ञों के माध्यम से दूसरे देश की घटनाओं, नीतियों और दृष्टिकोण के बारे में जानकारी प्राप्त कर अपनी विदेश नीति को आवश्यक मोड़ देता रहता है। बहुत से विचारकों ने चातुर्य, कुशलता, कपट आदि को राजनयिक गुण माना है जबकि पणिक्कर के अनुसार धूर्तता, कपट आदि से पूर्ण राजनय अपने देश के प्रति दूसरे देशों की शुभ कामना प्राप्त करने की दृष्टि से प्रेरित होता है और कपट आदि इस उद्देश्य के मार्ग में खतरनाक साधन है। दूसरे देश की शुभकमाना, प्राप्ति के लक्ष्य की पूर्ति चार प्रकार से अधिक अच्छी तरह हो सकती है-दूसरे देश उस देश की नीतियों को ठीक प्रकार से समझें और उसके प्रति सम्मान की भावना रखें, वह देश दूसरे देशों की जनता के न्यायोचित हितों को समझे एवं सर्वोपरि माने तथा वह ईमानदारी से व्यवहार करे। आप बहुत से लोगों को सदा के लिए धोखे में नहीं रख सकते। जब देश की नीति की असलियत जाहिर हो जायेगी तो विश्व-समाज में उस देश के स्तर को धक्का पहुंचेगा। पणिक्कर का मत है कि व्यक्तिगत जीवन की भाँति अन्तर्राष्ट्रीय जीवन में भी ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है। पणिक्कर ने राज्य के प्रति स्वामीभक्ति को एक राजनयज्ञ का आवश्यक गुण माना है। उन्हीं के शब्दों में, ”राजदूत को उस नीति को क्रियान्वित करना होता है, जो उसकी सरकार निर्धारित करती है। ये उसके स्वयं के परामर्शों से भिन्न हो सकती है क्योंकि किसी देश की सरकार ही पूरी स्थिति से परिचित होती है जबकि राजदूत केवल अपने विशिष्ट लक्ष्यों को ही जानता है। इसलिए जब उसे उन अनुदेशों को क्रियान्वित करना पड़ता है जो आधारभूत रूप से उसके विचारों के विरुद्ध हो तो उसे भावना, पक्षपात अथवा मैत्रीभाव से प्रभावित नहीं होना चाहिये और किसी भी स्थिति में उसे सम्बन्धित सरकार को अपने नेत्र टिमटिमाने के द्वारा भी यह प्रकट नहीं करना चाहिये कि उसके स्वयं के विचार भिन्न नहीं है। आदर्श राजदूत को किसी भी परिस्थिति में अपने देश से आए कड़े निर्देशों को मृदु बनाकर अपनी सरकार के व्यवहार का गलत अनुमान नहीं देना चाहिये भले ही उसके देश की विदेश नीति स्वीकारी राज्य को पसन्द न हो। पणिक्कर जो स्वयं एक सफल राजनयिज्ञ थे, स्त्रियों के सानिध्य व सम्पर्क को राजनय का सहायक मानते हैं। सन् 1926 में फ्रांसीसी राजदूत जुलेस केम्बान ने, एक लेख में लिखा था कि सम्माननीय स्त्रियों का संसर्ग राजदूत के लिए लाभदायक होगा। प्रसिद्ध भारतीय विद्वान चाणक्य राजदूतों की स्त्रियों से सम्पर्क का विरोधी था। सभी देशों में स्त्रियों का प्रयोग राष्ट्रीय हित वृद्धि के लिए अति प्राचीनकाल से किया जाता है। भारतीय इतिहास के अति प्राचीनकाल की विष कन्याओं का ऐसा ही प्रयोग था। प्रथम विश्वयुद्ध के काल में माताहारी, विख्यात स्त्री जासूस थी। द्वितीय विश्व युद्ध काल में एक अमेरिकी संकेत लिपिक (Cypher Clerk) ने एक रूसी प्रवासी लड़की के प्रेम में फंसकर रूजवेल्ट और चर्चिल के मध्य आदान-प्रदान हुए कई पत्र दिखा दिये थे। वह लड़की वास्तव में जर्मन जासूस थी। इस क्लर्क को इस अपराध के कारण सात वर्ष की सजा मिली थी। पणिक्कर के अनुसार एक आदर्श राजदूत को अपनी सफलता पर गर्व और असफलता पर निराशा नहीं होना चाहिये। पणिक्कर ने राजदूत के दो मूल कार्यों से सहमति व्यक्ति की हैं- प्रथम, अपनी सरकार को स्थानीय परिस्थितियों तथा वहां की नीतियों से अवगत कराए रखना। दूसरा अपने देश की विदेश-नीति के क्रियान्वयन के लिए देश से आई आज्ञाओं का सफलतापूर्वक पालन करना। किसी भी राजदूत की सफलता अथवा असफलता का उत्तरदायित्व उस देश की अपनी विदेश नीति पर होनी चाहिये, न कि राजनयिक पर, क्योंकि राजदूत विदेश नीति का निर्माण नहीं करते, यह तो उसके विदेश विभाग का कार्य है। पणिक्कर का विचार है कि वार्ताओं के पीछे दबाव का सबसे भयानक व अन्तिम तरीका युद्ध का है। जब समझौते की सम्भावना समाप्त प्रायः हो अथवा वार्ता के सफल परिणाम निकलने की आशा ही क्षीण प्रतीत हो तो युद्ध द्वारा समाधान निकाला जाता है। कृतियाँ अंग्रेजी में उनकी उल्लेखनीय कृतियाँ ये हैं- 1920: Essays on Educational Reconstruction in India 1922: Sri Harsha of Kanauj: a monograph on the history of India in the first half of the 7th century A. D. 1923: Indian Nationalism: its origin, history, and ideals 1928: The Working of Dyarchy in India, 1919–1928 1929: The Evolution of British Policy towards Indian States, 1774–1858 1929: Malabar and the Portuguese: being a history of the relations of the Portuguese with Malabar from 1500 to 1663 1930: The Founding of the Kashmir State: a biography of Maharajah Gulab Singh, 1792–1858 1930: Federal India 1932: Indian States and the Government of India 1934: The New Empire: letters to a Conservative Member of Parliament on the future of England and India 1936: The Indian Princes in Council: a record of the chancellorship of His Highness, the Maharaja of Patiala, 1926–1931 and 1933–1936 1937: His Highness the Maharaja of Bikaner: a biography 1938: Hinduism and the modern world 1942: The States and the Constitutional Settlement 1943: Indian States 1944: The Strategic Problems of the Indian Ocean 1945: India and the Indian Ocean: an essay on the influence of sea power on Indian history 1947: India through the Ages 1953: Asia and Western Dominance: a survey of the Vasco Da Gama epoch of Asian history, 1498–1945 1954: A Survey of Indian History 1954: In Two Chinas: memoirs of a diplomat 1956: The Principles and Practice of Diplomacy 1957: Voice of Truth, a topical symposium: replies to attacks on Christians and missionaries in India 1957: India and China: a study of cultural relations 1958: The Determining Periods of Indian History 1960: A History of Kerala, 1498–1801 1960: The State and the Citizen 1961: Hindu Society at Cross Roads 1961: Essential Features of India Culture 1962: In Defence of Liberalism 1963: Studies in Indian History 1963: The Ideas of Sovereignty and State in Indian Political Thought 1963: The Foundations of New India 1963: The Himalayas in Indian Life 1964: A Survey of Indian History 1964: Hinduism & the West: a study in challenge and response 1964: The Serpent and the Crescent: a history of the Negro empires of western Africa 1965: Lectures on India's Contact with the World in the pre-British Period 1966: The Twentieth Century 1967: Caste and Democracy & Prospects of Democracy in India 1969: Geographical Factors in Indian History 1977: An Autobiography सन्दर्भ पठनीय Kavalam Madhava Panikkar http://www.hindu.com/mag/2004/05/09/stories/2004050900160300.htm A tribute to smaller states The Hindu 26 अगस्त 2016 https://web.archive.org/web/20121106032044/http://www.hindu.com/mag/2004/05/09/stories/2004050900160300.htm 6 नवंबर 2012 live बाहरी कड़ियाँ The Hindu Reformation K. M. Panikkar The Principle and Practices of Diplomacy K. M. Panikkar A tribute to smaller states; The Hindu Sardar K. M. Panikkar biography; Kerala Sahitya Akademi (in Malayalam) श्रेणी:राजनयिक