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ऐरावतेश्वर मंदिर
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महान जीवन्त चोल मन्दिर Cultural i, ii, iii, iv 250 Asia-Pacific 1987 11th 2004 http://whc.unesco.org/en/list/250
ऐरावतेश्वर मंदिर, द्रविड़ वास्तुकला का एक हिंदू मंदिर है जो दक्षिणी भारत के तमिलनाड़ु राज्य में कुंभकोणम के पास दारासुरम में स्थित है। 12वीं सदी में राजराजा चोल द्वितीय द्वारा निर्मित इस मंदिर को तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर तथा गांगेयकोंडा चोलापुरम के गांगेयकोंडाचोलीश्वरम मंदिर के साथ यूनेस्को द्वारा वैश्विक धरोहर स्थल बनाया गया है। इन मंदिरों को महान जीवंत चोल मंदिरों के रूप में जाना जाता है।http://whc.unesco.org/en/list/250/ ग्रेट लिविंग चोला टेम्पल्स - यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज सेंटर 9 मार्च 2011 https://web.archive.org/web/20150912082313/http://whc.unesco.org/en/list/250/ 12 सितंबर 2015 live
पौराणिक कथा
ऐरावतेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। शिव को यहां ऐरावतेश्वर के रूप में जाना जाता है क्योंकि इस मंदिर में देवताओं के राजा इंद्र के सफेद हाथी ऐरावत द्वारा भगवान शिव की पूजा की गई थी। ऐसा माना जाता है कि ऐरावत ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण अपना रंग बदल जाने से बहुत दुखी था, उसने इस मंदिर के पवित्र जल में स्नान करके अपना रंग पुनः प्राप्त किया। मंदिर के भीतरी कक्ष में बनी एक छवि जिसमें ऐरावत पर इंद्र बैठे हैं, के कारण इस धारणा को माना जाता है। देखें पी.वी. जगदीस अय्यर, पीपी 350-351 इस घटना से ही मंदिर और यहां आसीन इष्टदेव का नाम पड़ा.
कहा जाता है कि मृत्यु के राजा यम ने भी यहाँ शिव की पूजा की थी। परंपरा के अनुसार यम, जो किसी ऋषि के शाप के कारण पूरे शरीर की जलन से पीड़ित थे, ऐरावतेश्वर भगवान द्वारा ठीक कर दिए गए। यम ने पवित्र तालाब में स्नान किया और अपनी जलन से छुटकारा पाया। तब से उस तालाब को यमतीर्थम् के नाम से जाना जाता है।
वास्तुकला
thumb|200px|right|Airavateshvarar temple|पवित्र स्थान; सजे रथ के रूप में घोड़ों द्वारा खींचता हुआ
thumb|200px|right|Airavateshvarar temple|खंभे अवधि की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को दर्शाता है
यह मंदिर कला और स्थापत्य कला का भंडार है और इसमें पत्थरों पर शानदार नक्काशी देखने को मिलती है। हालांकि यह मंदिर बृहदीश्वर मंदिर या गांगेयकोंडाचोलीश्वरम मंदिर से बहुत छोटा है, किंतु विस्तार में अधिक उत्तम है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कहा जाता है कि यह मंदिर नित्य-विनोद, "सतत मनोरंजन, को ध्यान में रखकर बनाया गया था।
विमान (स्तम्भ) 24 मीटर (80 फीट) उंचा है। सामने के मण्डपम् का दक्षिणी भाग पत्थर के बड़े पहियों वाले एक विशाल रथ के रूप में है जिसे घोड़ें द्वारा खींचा जा रहा है। देखें चैतन्य, के, पी 42
भीतरी आंगन के पूर्व में बेहतरीन नक्काशीदार इमारतों का एक समूह स्थित है जिनमें से एक को बलिपीट (बलि देने का स्थान) कहा जाता है। बलीपीट की कुरसी पर एक छोटा मंदिर बना है जिसमें गणेश जी की छवि अंकित है। चौकी के दक्षिणी तरफ शानदार नक्काशी से युक्त 3 सीढ़ियों का एक समूह है। चरणों पर प्रहार करने से विभिन्न संगीत ध्वनियां उत्पन्न होती हैं। देखें पी.वी. जगदीस अय्यर, पी 351
आंगन के दक्षिण-पश्चिमी कोने में 4 तीर्थ वाला एक मंडपम है। इनमें से एक पर यम की छवि बनी है। इस मंदिर के आसपास एक विशाल पत्थर की शिला है जिस पर सप्तमाताओं (सात आकाशीय देवियां) की आकृतियां बनी हैं।
center|thumb|650px|ऐरावतेश्वर मन्दिर का विहंगम दृश्य
देवी-देवता
right Horse drawn chariot Darasuram.jpg 100 Chariot spoked wheel Darasuram.jpg 100 Horse-drawn chariot carved onto the mandapam of Airavatesvarar temple, Darasuram (left). The chariot and its wheel (right)are so finely sculpted that they include even the faintest details
मुख्य देवता की पत्नी पेरिया नायकी अम्मन का एक अलग मंदिर है जो ऐरावतेश्वर मंदिर के उत्तर में स्थित है। संभव है जब बाहरी आंगन पूरा रहा हो तो यह मुख्य मंदिर का ही एक हिस्सा रहा हो. वर्तमान समय में, यह एक अलग मंदिर के रूप में अकेला खड़ा है जिसके बड़े आंगन में देवी का मंदिर बना है।
मंदिर में शिलालेख
इस मंदिर में विभिन्न शिलालेख हैं। इन लेखों में से एक में कुलोतुंगा चोल तृतीय द्वारा मंदिरों का नवीकरण कराए जाने का पता चलता है। देखें पी.वी. जगदीस अय्यर, पी 353
बरामदे की उत्तरी दीवार पर शिलालेखों के 108 खंड हैं, इनमें से प्रत्येक में शिवाचार्या (शिव को मानने वाले संत) के नाम, वर्णन व छवियां बनी है जो उनके जीवन की मुख्य घटनाओं को दर्शाती हैं। देखें चैतन्य, के, पी 40 देखें गीता वासुदेवन, पी 55
गोपुरा के पास एक अन्य शिलालेख से पता चलता है कि एक आकृति कल्याणी से लायी गई थी, जिसे बाद में राजाधिराज चोल प्रथम द्वारा कल्याणपुरा नाम दिया गया, पश्चिमि चालुक्य राजा सोमेश्वर प्रथम से उसकी हार के बाद उनके पुत्र विक्रमादित्य षष्ठ (VI) और सोमेश्नर द्वितीय ने चालुक्यों की राजधानी पर कब्जा कर लिया। देखें रिचर्ड डेविस, पी 51
यूनेस्को वैश्विक धरोहर स्थल
thumb|एरावतेश्वर मंदिर का दृश्य
इस मंदिर को वर्ष 2004 में महान चोल जीवंत मंदिरों की सूची में शामिल किया गया। महान चोल जीवंत मंदिरों की सूची में तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर, गांगेयकोंडा चोलापुरम का गांगेयकोंडाचोलीश्वरम मंदिर और दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर शामिल हैं। इन सभी मंदिरों को 10 वीं और 12 वीं सदी के बीच चोलों द्वारा बनाया गया था और इनमे बहुत सी समानताएं हैं। देखें पी.वी. जगदीस अय्यर, पी 351
टिप्पणियां
सन्दर्भ
Geeta Vasudevan The Royal Temple of Rajaraja: An Instrument of Imperial Chola Power Abhinav Publications 2003 81-701-7383-3
P.V. Jagadisa Ayyar South Indian Shrines Asian Educational Services New Delhi 1993 81-206-0151-3
Krishna Chaitanya Arts of India https://archive.org/details/bwb_T2-DTV-240 Abhinav Publications 1987
Richard Davis Lives of Indian images Princeton University Press Princeton, N.J 1997 0-691-00520-6 registration https://archive.org/details/livesofindianima0000davi
बाहरी कड़ियाँ
वर्ल्ड हेरिटेज साइट स्टेटस फॉर एरावतेश्वर टेम्पल
Tamil Nadu
श्रेणी:भारत में विश्व धरोहर स्थल
श्रेणी:हिन्दू विश्व धरोहर स्थल
श्रेणी:तमिलनाडु में हिंदू मंदिर
श्रेणी:तंजावुर, कुंभकोणम के आसपास के मंदिर
श्रेणी:शिव मंदिर