Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

हसन खां मेवाती

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

हसन खां मेवाती (मृत्यु: 17 मार्च, 1527) मेवात के मुसलमान राजपूत शासक थे। हसन खाँ मेवात के पिछले शासक, अलावल खाँ के पुत्र थे, और राजा नाहर खान मेवाती के वंशज थे , जो 14वीं शताब्दी में मेवात के वली थे। उनके वंश ने लगभग 200 वर्षों तक मेवात राज्य पर शासन किया था। खानवा की लड़ाई में उन्होंने ५००० सिपाहियों के साथ राजपूत परिसंघ की ओर से बाबर के नेतृत्व में मुगल सेना के विरुद्ध हिस्सा लिया था, जिसमें उनकी मृत्यु हो गयी थी।Sharma Gopi Nath Mewar & the Mughal Emperors (1526-1707 A.D.) https://books.google.co.in/books?redir_esc=y&id=jIs9AAAAMAAJ&focus=searchwithinvolume&q=Hasan+Khan+Mewati+ S.L. Agarwala en 1954Powlett P. William Pulwal gazetteer https://books.google.com.in/books? london turbon company eng 1878जनवरी 2024 InternetArchiveBot महासिद्ध हसन खां जिन्नी एक अलौकिक जीवन दर्शन स्वामी सत्येंद्र सत्यसाहिब जी की डायरी से संक्षिप्त में,, ​जीवन परिचय और कालखंड:- हसन खां का जीवन तीन शताब्दियों के संगम का साक्षी रहा। उनका जन्म 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध (लगभग 1770-1790) में हुआ और उन्होंने 20वीं शताब्दी के शुरुआती दशक (लगभग 1905-1910) तक, 120-125 वर्ष की दीर्घायु प्राप्त की। वे मद्रास (चेन्नई) की एक साधारण गली में रहते थे, जहाँ उनकी ख्याति एक सात्विक और शांत सिद्ध पुरुष के रूप में थी। ​साधना का मर्म और सहायक शक्तियाँ हसन खां की सिद्धियों का आधार कोई जादू-टोना नहीं, बल्कि 'ध्वनि विज्ञान' (Naad-Vidya) और 'पवित्र चरित्र' था। उन्होंने एकांत में रहकर सवा लाख मंत्रों का अनुष्ठान कर 'मुसा' और 'हमजाद' नामक सूक्ष्म ऊर्जाओं (जिन्नों) को अपना 'मित्र' बनाया था। उनकी मान्यता थी कि पराशक्तियाँ गुलाम बनाने से नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और 'चिल्ला' (40 दिवसीय एकांत साधना,चिल्ला) के कठिन अनुशासन से सिद्ध होती हैं। ​ऐतिहासिक संबंध और चमत्कार:- हसन खां केवल एक एकांतवासी साधक नहीं थे, बल्कि उस समय के प्रबुद्ध समाज और वैश्विक संस्थाओं के बीच शोध का केंद्र थे:- ​अलीगढ़ और प्रबुद्ध वर्ग:- उनका अलीगढ़ से गहरा नाता था, जहाँ के विद्वान और रईस उनकी यौगिक शक्तियों के कायल थे। ​ब्रिटिश अधिकारियों के सम्मुख प्रदर्शन:- उन्होंने कई अंग्रेज कलेक्टरों की चुनौती पर एक नागिन को नृत्यांगना युवती(इच्छाधारी नागिन) मे बदल नृत्य कराया,ओर 'शून्य से वस्तुएं' (जैसे विदेशी अखबार और ताजे फल, गर्म जलेबी के साथ उस दुकान का मीनू तक) मँगाने के चमत्कार दिखाए, जिसे तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों ने 'परा-मानवीय इच्छाशक्ति' के रूप में स्वीकार किया। ​थ्योसोफिकल सोसायटी:- 1880 से 1900 के बीच वे मद्रास की थ्योसोफिकल सोसायटी के निरंतर संपर्क में रहे। कर्नल ऑलकॉट और एनी बेसेंट जैसे विचारकों के साथ उन्होंने सूक्ष्म जगत की शक्तियों पर गहरा संवाद किया। ​द्विवेदी जी से भेंट:- हिंदी साहित्य के दिग्गज आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उनसे भेंट कर उनकी शक्तियों,जिसमें इच्छाधारी नागिन को प्रत्यक्ष कर उसका साक्षात् नृत्य देखा था,उसको भारतीय प्राचीन विज्ञान का एक विलक्षण प्रमाण माना था।जिसका उन्होंने अपनी अद्भुत आलाप पुस्तक में विस्तार से लिखा है। ​विलक्षण सिद्धियाँ:- उनकी 'चांदी की अंगूठी' और उस पर अंकित विशेष 'नक्श' (यंत्र) उनकी साधना का केंद्र था। वे बिना किसी वाद्य यंत्र के हवा में मधुर संगीत उत्पन्न कर सकते थे और पलक झपकते ही मीलों दूर की वस्तु को भौतिक रूप में उपस्थित कर देते थे। ​त्याग और महाप्रयाण:- हसन खां का जीवन जितना प्रभावशाली था, उनका अंत उतना ही वैराग्यपूर्ण। मृत्यु के कुछ समय पूर्व, उन्होंने अपनी समस्त शक्तियों के प्रतीक—अपनी दिव्य चांदी की अंगूठी और गुरु प्रदत्त सिद्ध ताबीज—को एक पुराने कुएं में विसर्जित कर दिया। उनका उद्देश्य यह था कि उनके द्वारा अर्जित यह गुप्त विद्या किसी अपात्र के हाथ न लगे ओर साधक को शक्तियों से मुक्ति पाकर ही जन्म मिल सकता है,अन्यथा शांति ओर मुक्ति संभव नहीं,, साथ ही अगले जन्म में वे उन्हें फिर से प्राप्त कर ओर भी उन्नत सिद्धियों की ओर बढ़ेंगे।उन्होंने सवा सौ वर्ष की आयु में परम शांति के साथ अपनी देह का त्याग किया। ​निष्कर्ष:- हसन खां के जीवन से यह सिद्ध होता है कि 'मन' (Mind) ही 'पदार्थ' (Matter) का स्वामी है। उनका चरित्र हमें सिखाता है कि बिना संयम और स्थिरता के कोई भी सिद्धि कल्याणकारी नहीं हो सकती ओर बिन साक्षात् गुरु के,जो शिष्य को पहले अपने अमल से साक्षात जिन्न या रूहानी ताकत नहीं दिखा दे,ताकि शिष्य का भय बिल्कुल निकल जाए और चिल्ला करते में बड़े आराम से अपनी साधना कर सके ओर इल्म ओर गैबी ताकत साक्षात हासिल कर अध्यात्म की रस्ते पर बढ़ सके,बिन प्रत्यक्षवादी गुरु के सभी इल्म ज्ञान बेकार है,सारे मंत्र जप केवल मानसिक स्वप्नों के खेल बनकर भ्रमित करती जिंदगी बना बर्बाद करते है।यों प्रत्यक्षवादी गुरु से दीक्षा लेकर असल प्रमाणिक इल्म हासिल करना चाहिए,जो आज बड़ा दुर्लभ ओर भाग्यशाली को मिलता है।इस विषय पर ओर भी समयानुसार ज्ञान मिलेगा,,,,,कैसे श्रीगुरुदेव सत्यसाहिबजी जी जीवनी बुक में पढ़े,मुन्ना भाई ओर उनके दो सहायकों को पंचमुखी हनुमान संस्कृत के 11 पाठों से सिद्धासन पर बैठकर वंश में किया,, इतिहास 1372 में, फिरोज शाह तुगलक ने राजा नाहर खान (जो पहले कोटला के राजा सोनपर पाल के नाम से जाना जाता था) को मेवात का आधिपत्य प्रदान किया । राजा नाहर खान ने मेवात में एक वंशानुगत राजनीति की स्थापना की और वाली -ए-मेवात की उपाधि की घोषणा की । बाद में उनके वंशजों ने मेवात में अपनी संप्रभुता की पुष्टि की। उन्होंने 1527 तक मेवात पर शासन किया।تاریخ میوچھتری ریختہ https://www.rekhta.org/ebooks/detail/tareekh-e-miyo-chhatri-hakeem-abdush-shakoor-ebooks?lang=ur 2022-06-06 Rekhta urتوصیف الحسن میواتی الہندی http://archive.org/details/20200823_20200823_1256 تاریخِ میو اور داستانِ میوات 2020-08-23Tareekh-e-Miyo Chhatri by Hakeem Abdush Shakoor https://www.rekhta.org/ebooks/tareekh-e-miyo-chhatri-hakeem-abdush-shakoor-ebooks 2022-06-14 Rekhta en पतन मेवात के अंतिम खानजादा,शासक हसन खान मेवाती थे , जो खानवा की लड़ाई में मारे गए थे । इस लड़ाई के बाद, मेवात को मुगल साम्राज्य में एकीकृत कर दिया गया और खानजादास मुगल कुलीन वर्ग का हिस्सा बन गए। मेवात के शासक वंशावली मेवात राज्य के शासक शासन1 राजा नाहर खान , राजा - मेवात राज्य के संस्थापक और खानजादा के पूर्वज 1372–14022 राजा खानजादा बहादुर खान - ने 1406 में बहादुरपुर की स्थापना की। 1402–14123 राजा खानजादा अकलीम खान 1412–14174 राजा खानजादा फिरोज खान ने 1419 में फिरोजपुर झिरका की स्थापना की 1417–14225 राजा खानजादा जलाल खान 1422–14436 राजा खानजादा अहमद खान 1443–14687राजा खानजादा जकारिया खान 1468–14858 राजा खानजादा अलावल खान - मानव बलि की प्रथा को रोकने के लिए निकुंभ राजपूतों से बाला किला जीता। 1485–1504 9 राजा खानजादा हसन खान मेवाती - मेवात के अंतिम खानजादा अफगानी शासक। 1504–1527 सन्दर्भ श्रेणी:हरियाणा का इतिहास श्रेणी:मुस्लिम शासक