Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

चाँदपुरगढ़ी

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

चांदपुर गढ़ी मई 2022 अंगूठाकार|चाँदपुरगढ़ी के खंडहर चाँदपुरगढ़ी उत्तराखण्ड के 52 गढोँ में एक प्रसिद्ध गढ़ था, बुंगा गांव इसी गढ़ के अन्तर्गत आता है। आज चाँदपुरगढ़ी एक अलग स्थान है जो हमेशा से और आज भी प्राकृतिक सौन्दर्य तथा पर्यटक स्थल के लिये आकर्षण का केद्र बना हुआ हैं और नजाने कितने असुलझे रहस्य अपने गर्भ में समाये हुये हैं यह कर्णप्रयाग का निकटवर्ती आकर्षण है। यह उत्तराखंड राज्य में पड़ता है। गढ़वाल का प्रारंभिक इतिहास कत्यूरी राजाओं का है, जिन्होंने जोशीमठ से शासन किया और वहाँ से 11वीं सदी में अल्मोड़ा चले गये। गढ़वाल से उनके हटने से कई छोटे गढ़पतियों का उदय हुआ, जिनमें पँवार वंश सबसे अधिक शक्तिशाली था जिसने चांदपुरगढ़ी (किला) से शासन किया। कनक पाल को इस वंश का संस्थापक माना जाता है। उसने चांदपुर भानु प्रताप की पुत्री से विवाह किया और स्वयं यहाँ का गढ़पती बन गया।http://tehri.nic.in/pages/display/53-history संग्रहीत प्रति 28 जुलाई 2014 https://web.archive.org/web/20140703145339/http://tehri.nic.in/pages/display/53-history 3 जुलाई 2014 live इस विषय पर इतिहासकारों के बीच विवाद है कि वह कब और कहां से गढ़वाल आया। कुछ लोगों के अनुसार वह वर्ष 688 में मालवा के धारा नगरी से यहां आया। कुछ अन्य मतानुसार वह गुज्जर देश से वर्ष 888 में आया जबकि कुछ अन्य बताते है कि उसने वर्ष 1159 में चांदपुरगढ़ी की स्थापना की। उनके एवं 37वें वंशज अजय पाल के शासन के बीच के समय का कोई अधिकृत रिकार्ड नहीं है। अजय पाल ने चाँदपुरगढ़ी से राजधानी हटाकर 14वीं सदी में देवलगढ़ वर्ष 1506 से पहले ले गया और फिर श्रीनगर (वर्ष 1506 से 1519)। यह एक तथ्य है कि पहाड़ी के ऊपर, किले के अवशेष गाँव से एक किलोमीटर खड़ी चढ़ाई पर हैं जो गढ़वाल में सबसे पुराने हैं तथा देखने योग्य भी हैं। अवशेष के आगे एक विष्णु मंदिर है, जहां से कुछ वर्ष पहले मूर्ति चुरा ली गयी। दीवारें मोटे पत्थरों से बनी है तथा कई में आलाएं या काटकर दिया रखने की जगह बनी है। फर्श पर कुछ चक्राकार छिद्र हैं जो संभवत: ओखलियों के अवशेष हो सकते हैं। एटकिंसन के अनुसार किले का क्षेत्र 1.5 एकड़ में है वह यह भी बताता है कि किले से 500 फीट नीचे झरने पर उतरने के लिये जमीन के नीचे एक रास्ता है। इसी रास्ते से दैनिक उपयोग के लिये पानी लाया जाता होगा। एटकिंसन बताता है कि पत्थरों से कटे विशाल टुकड़ों का इस्तेमाल किले की दीवारों के निर्माण में हुआ जिसे कुछ दूर दूध-की-टोली की खुले खानों से निकाला गया होगा। कहा जाता है कि इन पत्थरों को पहाड़ी पर ले जाने के लिये दो विशाल बकरों का इस्तेमाल किया गया जो शिखर पर पहुंचकर मर गये। यह स्मारक अभी भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की देख-रेख में है।http://www.asidehraduncircle.in/chamoli_hn.html संग्रहीत प्रति 28 जुलाई 2014 https://web.archive.org/web/20140703220320/http://www.asidehraduncircle.in/chamoli_hn.html 3 जुलाई 2014 dead सन्दर्भ