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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

बन्दिनी (1963 फ़िल्म)

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बन्दिनी बन्दिनी.jpg बन्दिनी का पोस्टर बिमल रॉय बिमल रॉय चारु चन्द्र चक्रबर्ती (जरासन्ध) के बंगाली उपन्यास तमसी सचिन देव बर्मन (संगीतकार)शैलेन्द्र तथा गुलज़ार (गीतकार) नबेन्दु घोष (पटकथा)पॉल महेन्द्र (संवाद) अशोक कुमारधर्मेन्द्रनूतन कमल बोस मधु प्रभावलकर यश राज फ़िल्म्स मोहन स्टूडियोज़, मुंबई १५७ मि. 1963 भारत हिन्दी बन्दिनी १९६३ में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है जिसके निर्माता और निर्देशक बिमल रॉय थे जिन्होंने दो बीघा ज़मीन और मधुमती जैसी प्रतिष्ठित फ़िल्में बनायीं थीं। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, धर्मेन्द्र और नूतन। बॉक्स ऑफ़िस में इस फ़िल्म ने ठीक ठाक ही प्रदर्शन किया था। फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में इसे उस वर्ष छ: पुरस्कारों से नवाज़ा गया था जिसमें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार भी शामिल था। यह फ़िल्म एक नारी प्रधान फ़िल्म है, जो कि हिन्दी फ़िल्मों में कम ही देखने को मिलता है। सुजाता के बाद बिमल रॉय की यह दूसरी नारी प्रधान फ़िल्म थी। बंदिनी की कहानी कल्यानी (नूतन) के इर्द-गिर्द घूमती है। यह शायद अकेली ऐसी फ़िल्म है जिसमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गांव की साधारण महिलाओं का योगदान दर्शाया गया हो। संक्षेप कल्यानी (नूतन) जेल में एक क़ैदी है जिसपर खून का इल्ज़ाम है। जेल में एक बुढ़िया कैदी को तपेदिक का रोग लग जाता और कल्यानी स्वेच्छा से उसकी देखभाल करने को राज़ी हो जाती है। बुढ़िया का इलाज करते करते जेल के डॉक्टर देवेन्द्र (धर्मेन्द्र) को कल्यानी से प्यार हो जाता है लेकिन कल्यानी अपने अतीत के कारण उसके प्यार को ठुकरा देती है। देवेन्द्र जेल की नौकरी से इस्तिफ़ा देकर अपने घर वापस चला जाता है। उस जेल के जेलर महेश (तरुण बोस) और देवेन्द्र के घरेलू सम्बन्ध होने के कारण देवेन्द्र जेलर को अपने प्यार के बारे में बता देता है। देवेन्द्र के जाने के बाद जेलर कल्यानी को बुला भेजता है और कल्यानी से अपनी आप बीती सुनाने को कहता है। जब कल्यानी यह कहती है कि उसका अतीत इतना दु:ख भरा है कि वह बोल नहीं पायेगी तो जेलर उससे अपनी कहानी लिख कर देने को कहता है। अब फ़िल्म अतीत में चली जाती है और कल्यानी यह बताती है कि उसके पिता एक गांव में पोस्टमास्टर के ओहदे में कार्यरत थे और वह अपनी माँ और बड़े भाई को खो चुकी थी। उनके गांव में एक स्वतंत्रता सेनानी बिकाश घोष (अशोक कुमार) नज़रबन्द होता है और दोनों को आपस में प्यार हो जाता है। बिकाश कल्यानी से लौटकर आने पर विवाह करने का वादा करके चला जाता है लेकिन फिर कभी वापस नहीं आता है। गांव वालों के अपने पिता को दिये जाने वाले तानों से तंग आकर एक दिन कल्यानी गांव छोड़कर शहर आ जाती है जहाँ उसे एक अस्पताल में नौकरानी की नौकरी मिल जाती है। उसे एक अध-पगली महिला की देखभाल का ज़िम्मा सौंपा जाता है जो उसे काफ़ी बुरा भला कहती रहती है। एक दिन उसकी उसी शहर में रहने वाली सखी आकर बताती है कि कल्यानी के पिता उसे खोजते हुये उसके घर आये थे और फिर जब अस्पताल आने के लिए निकले तो एक मोटर से टकरा गये हैं लेकिन जब तक वे दोनों कल्यानी के पिता को देखने के लिए दूसरे अस्पताल पहुँचती हैं तब तक वे दम तोड़ चुके होते हैं। कल्यानी जब वापस अपने अस्पताल आती है तो देखती है कि उस अध-पगली महिला का पति बिकाश ही है। क्रोध में आकर वह उस महिला को चाय में ज़हर मिलाकर पिला देती है जिससे उसकी मौत हो जाती है और कल्यानी अपना जुर्म क़बूल कर लेती है। फ़िल्म फिर वर्तमान में आती है और जेलर की कोशिशों से कल्यानी की रिहाई हो जाती है। जब कल्यानी जेलर से मिलने पहुँचती है तो जेलर उसको देवेन्द्र की माँ का ख़त पकड़ाता है जिसमें लिखा होता है कि देवेन्द्र की माँ ने कल्यानी को अपनी बहू के रूप में स्वीकार कर लिया है। जेलर कल्यानी को देवेन्द्र के घर भेजने का इन्तज़ाम करता है और उसे जेल की वार्डन के साथ रेलवे स्टेशन (जो कि स्टीमर के स्टेशन के साथ ही है) के लिए रवाना कर देता है। वहाँ उसकी मुलाक़ात बहुत बीमार बिकाश से होती है और बिकाश का साथी उसे बताता है कि जब पार्टी का हुक़्म मिला कि उसे एक पुलिस अफ़सर के रिश्तेदार से मजबूरन शादी करनी पड़ेगी तो बिकाश ने देशप्रेम की ख़ातिर अपने प्रेम की आहूति दे दी। अंत में कल्यानी स्टीमर में बैठकर बिकाश के साथ हो लेती है। चरित्र अशोक कुमार - बिकाश घोष धर्मेन्द्र - डॉक्टर देवेन्द्र (जेल का डॉक्टर) नूतन - कल्याणी तरुण बोस - जेलर इफ़्तेख़ार - डिप्टी जेलर मुख्य कलाकार अशोक कुमार धर्मेन्द्र नूतन दल संगीत इस फ़िल्म के संगीतकार सचिन देव बर्मन हैं तथा गीतकार शैलेन्द्र और गुलज़ार हैं। +बन्दिनी के गीतगीतगायक/गायिका१मोरा गोरा रंग लई लेलता मंगेशकर२जोगी जब से तू आयालता मंगेशकर३मत रो मातामन्ना डे४ओ पंछी प्यारेआशा भोंसले५अब के बरस भेजीआशा भोंसले६मेरे साजन हैं उस पारसचिन देव बर्मन७ओ जाने वाले हो सके तोमुकेश रोचक तथ्य यह फ़िल्म बिमल रॉय द्वारा निर्देशित अंतिम फ़िल्म थी। गीतकार के रूप में यह गुलज़ार की पहली फ़िल्म थी। उन्होंने इस फ़िल्म के लिए मोरा गोरा रंग लई ले लिखा है। परिणाम बौक्स ऑफिस समीक्षाएँ नामांकन और पुरस्कार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार - बिमल रॉय फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार - नूतन फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार - बिमल रॉय फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ छायाकार पुरस्कार - कमल बोस फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ ध्वनि निर्देशन पुरस्कार - डी. बिलिमोरिया फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ कहानी पुरस्कार - जरासन्ध राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार श्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म बाहरी कड़ियाँ 0056850 बन्दिनी श्रेणी:1963 में बनी हिन्दी फ़िल्म श्रेणी:फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार विजेता श्रेणी:हिन्दी फ़िल्में श्रेणी:एस॰ डी॰ बर्मन द्वारा संगीतबद्ध फिल्में