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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

प्राण

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प्राण (Sanskrit: प्राण, IAST: prāṇa) का अर्थ हैhttp://dictionary.reference.com/browse/prana Prana | Define Prana at Dictionary.com Dictionary.reference.com 2015-04-22 https://web.archive.org/web/20160305014743/http://dictionary.reference.com/browse/prana 5 मार्च 2016 live हिन्दू दर्शनों, जैसे योगदर्शन और आयुर्वेद इत्यादि में इसे जीवन शक्ति या जीवनी शक्ति कहा गया है। कुछ प्रसंगों में इसे सूर्य से उत्पन्न और पूरे ब्रह्माण्ड में व्याप्त शक्ति के रूप में भी वर्णित किया गया है। हिन्दू, योग और आयुर्वेदिक परंपरा में प्राण को शरीर में प्रवाहित होने वाली ऊर्जा या सांस का प्रमुख स्रोत माना जाता है। इसे श्वास (साँस लेने) के साथ जोड़ा जाता है और यह जीवन की मूलभूत क्रियाओं के लिए आवश्यक माना जाता है।http://www.yogamag.net/archives/1982/emay82/prana582.shtml Prana: the Universal Life Force Swami Satyananda Saraswati Bihar School of Yoga Yogamag.net September 1981 31 July 2015 https://web.archive.org/web/20150527063027/http://www.yogamag.net/archives/1982/emay82/prana582.shtml 27 मई 2015 dead परिभाषा शास्त्रों में प्राण को जीव, शरीर और चेतना के बीच का पुल बताया गया है। आयुर्वेद में प्राण को पाँच प्रमुख शक्तियों (प्राण, अपान, व्यान, उदान और सामान) में से एक माना जाता है, जो शरीर के विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करती हैं। सांस्कृतिक और दार्शनिक संदर्भ योग में प्राण का महत्व विशेष है और प्राणायाम जैसी अभ्यास तकनीकें इसे नियंत्रित करने और विकसित करने के लिए की जाती हैं। हिंदू धर्म और संस्कृत साहित्य में प्राण को जीवन की आत्मा और अस्तित्व का आधार माना गया है। आयुर्वेद, तन्त्र इत्यादि में पाँच प्रकार के प्राण बताये गये हैं: प्राण अपान उदान समान व्यान वेदों में प्राण वेदों में प्राणतत्व की महिमा का गान करते हुए उसे विश्व की सर्वोपरि शक्ति माना है। प्राणों विराट प्राणो देष्ट्री प्राणं सर्व उपासते। प्राणो ह सूर्यश्चन्द्रमाः प्राण माहुः प्रजापतिम्॥ -अथर्ववेद अर्थात्- प्राण विराट है, सबका प्रेरक है। इसी से सब उसकी उपासना करते हैं। प्राण ही सूर्य, चन्द्र और प्रजापति है। प्राणाय नमो यस्य सर्व मिदं वशे। यो भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मिन् सर्व प्रतिष्ठम्। -अथर्ववेद अर्थात्- जिसके अधीन यह सारा जगत है, उस प्राण को नमस्कार है। वही सबका स्वामी है, उसी में सारा जगत प्रतिष्ठित है। ब्राह्मण ग्रंथों और आरण्यकों में ब्राह्मण ग्रंथों और आरण्यकों में भी प्राण की महत्ता का गान एक स्वर से किया गया है- उसे ही विश्व का आदि निर्माण, सबमें व्यापक और पोषक माना है। जो कुछ भी हलचल इस जगत में दृष्टिगोचर होती है उसका मूल हेतु प्राण ही है। कतम एको देव इति। प्राण इति स ब्रह्म नद्रित्याचक्षते। -बृहदारण्यक अर्थात्- वह एकदेव कौन सा है? वह प्राण है। ऐसा कौषितकी ऋषि से व्यक्त किया है। ‘प्राणों ब्रह्म’ इति स्माहपैदृश्य। अर्थात्- पैज्य ऋषि ने कहा है कि प्राण ही ब्रह्मा है। प्राण एव प्रज्ञात्मा। इदं शरीरं परिगृह्यं उत्थापयति। यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः। -शाखायन आरण्यक 5।3 अर्थात्- इस समस्त संसार में तथा इस शरीर में जो कुछ प्रज्ञा है, वह प्राण ही है। जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है। सोऽयमाकाशः प्राणेन वृहत्याविष्टव्धः तद्यथा यमाकाशः प्राणेन वृहत्या विष्टब्ध एवं सर्वाणि भूतानि आपि पीलिकाभ्यः प्राणेन वृहत्या विष्टव्धानी त्येवं विद्यात्। -एतरेय 2।1।6 अर्थात्- प्राण ही इस विश्व को धारण करने वाला है। प्राण की शक्ति से ही यह ब्रह्मांड अपने स्थान पर टिका हुआ है। चींटी से लेकर हाथी तक सब प्राणी इस प्राण के ही आश्रित हैं। यदि प्राण न होता तो जो कुछ हम देखते हैं कुछ भी न दीखता। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि :-- प्राणेहि प्रजापतिः 4।5।5।13 प्राण उ वै प्रजापतिः 8।4।1।4 प्राणः प्रजापति 6।3।1।9 अर्थात्-प्राण ही प्रजापति परमेश्वर है। सर्व ह्रीदं प्राणनावृतम्। -एतरेय अर्थात्- यह सारा जगत प्राण से आदृत है। उपनिषदों में उपनिषदकार का कथन है- प्राणोवा ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च। - छान्दोग्य अर्थात्- प्राण ही बड़ा है। प्राण ही श्रेष्ठ है। प्रश्नोपनिषद में प्राणतत्व का अधिक विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है- स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नाद्धीर्य तपोमंत्राः कर्मलोकालोकेषु च नाम च। -प्रश्नोपनिषद् 6।4 अर्थात्- परमात्मा ने सबसे प्रथम प्राण की रचना की। इसके बाद श्रद्धा उत्पन्न की। तब आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी यह पाँच तत्व बनाये। इसके उपरान्त क्रमशः मन, इन्द्रिय, समूह, अन्न, वीर्य, तप, मंत्र, और कर्मों का निर्माण हुआ। तदन्तर विभिन्न लोक बने। भृगुतंत्र में प्राण शक्ति ने भाण्डागार वाले स्वरूप को जान लेने पर ऋषियों ने कहा है कि कुछ भी जानना शेष नहीं रहता है। भृगुतंत्र में कहा गया है- उत्पत्ति मायाति स्थानं विभुत्वं चैव पंचधा। अध्यात्म चैब प्राणस्य विज्ञाया मृत्यश्नुते॥ अर्थात्- प्राण कहाँ से उत्पन्न होता है? कहाँ से शरीर में आता है? कहाँ रहता है? किस प्रकार व्यापक होता है? उसका अध्यात्म क्या है? जो इन पाँच बातों को जान लेता है वह अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है। सन्दर्भ श्रेणी:चेतना-पदार्थ द्वैतवाद