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आयुर्विज्ञान सूक्ष्मजैविकी
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दाएँ|अंगूठाकार|एक सूक्ष्मजीवविज्ञानी विच्छेदन सूक्ष्मदर्शी से की जाँच करते हुये।
आयुर्विज्ञान सूक्ष्मजैविकी (medical microbiology) आयुर्विज्ञान में अनुप्रयुक्त होने वाली सूक्ष्मजैविकी की एक शाखा है। इस शाखा में संक्रामक रोगों की रोकथाम, निदान और उपचार से सम्बंधित चिकित्सा विज्ञान का अध्ययन किया जाता है। इसके अतिरिक्त विज्ञान का यह क्षेत्र स्वास्थ्य के सुधार के लिए सूक्ष्मजीवों के विभिन्न नैदानिक अनुप्रयोगों का भी इसमें अध्ययन किया जाता है। संक्रामक रोग मुख्यतः चार प्रकार के सूक्ष्मजीवों जीवाणु, फफूंद, परजीवी और विषाणु से होते हैं इसके अलावा प्रोसंक नामक एक संक्रामक प्रोटीन भी है।
एक आयुर्विज्ञान सूक्ष्मजीवविज्ञानी के अध्ययन में रोगजनक विशेषतायें, उनके संचरण के तरिके, संक्रमण और वृद्धि तंत्र शामिल है। एक अस्पताल या चिकित्सा अनुसंधान केंद्र में एक नैदानिक/आयुर्विज्ञान सूक्ष्मजीवविज्ञानी के रूप में शैक्षणिक योग्यता के लिए आम तौर पर स्नातक की डिग्री की आवश्यकता होती है, जबकि कुछ देशों में सूक्ष्मजीवविज्ञान में मास्टर्स डिग्री के साथ-साथ किसी भी जैव विज्ञान (जैवरसायन, माइक्रो, बायोटेक, जेनेटिक्स, आदि) में पीएचडी की आवश्यकता होती है।Thomson R. B. Wilson M. L. Weinstein M. P. 2010 The Clinical Microbiology Laboratory Director in the United States Hospital Setting https://archive.org/details/sim_journal-of-clinical-microbiology_2010-10_48_10/page/3465 Journal of Clinical Microbiology 48 10 3465–3469 10.1128/JCM.01575-10 2953135 20739497 आयुर्विज्ञान सूक्ष्मजीवविज्ञानी अक्सर चिकित्सकों के लिए सलाहकार के रूप में काम करते हैं, रोगजनकों की पहचान करते हैं और उपचार के विकल्प सुझाते हैं। इस जानकारी का उपयोग करके, एक उपचार तैयार किया जा सकता है। अन्य कार्यों में समुदाय के लिए संभावित स्वास्थ्य जोखिमों की पहचान या सूक्ष्मजीवों के संभावित रूप से विषैले या प्रतिरोधी उपभेदों के विकास की निगरानी, समुदाय को शिक्षित करना और स्वास्थ्य प्रथाओं के डिजाइन में सहायता करना शामिल हो सकता है। वो महामारी और बीमारी के प्रकोप को रोकने या नियंत्रित करने में भी सहायता कर सकते हैं। सभी आयुर्विज्ञान सूक्ष्मजीवविज्ञानी माइक्रोबियल पैथोलॉजी का अध्ययन नहीं करते हैं; कुछ सामान्य, गैर-रोगजनक प्रजातियों का अध्ययन करते हैं ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि उनके गुणों का उपयोग प्रतिजैविक या अन्य उपचार विधियों को विकसित करने के लिए किया जा सकता है।
महामारी विज्ञान में जनसंख्या में स्वास्थ्य और रोगों की स्थिति के पैटर्न, कारणों और प्रभावों का अध्ययन, चिकित्सा सूक्ष्म जीव विज्ञान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, हालांकि इस क्षेत्र का नैदानिक पहलू मुख्य रूप से व्यक्तियों में सूक्ष्मजीव संक्रमण की उपस्थिति और वृद्धि, मानव शरीर पर उनके प्रभाव और उन संक्रमणों के इलाज के तरीकों पर केंद्रित है। इस संबंध में एक अनुप्रयुक्त विज्ञान के रूप में पूरे क्षेत्र को वैचारिक रूप से अकादमिक और नैदानिक उप-विशेषताओं में विभाजित किया जा सकता है, हालांकि वास्तव में सार्वजनिक स्वास्थ्य सूक्ष्म जीवविज्ञान और नैदानिक सूक्ष्म जीव विज्ञान के बीच एक तरल सातत्य है जैसे कि नैदानिक प्रयोगशालाओं में अत्याधुनिकता अकादमिक चिकित्सा और अनुसंधान प्रयोगशालाओं में निरंतर सुधार पर निर्भर करती है।
इतिहास
सन् 1676 में, एंटोनी वॉन ल्यूवेनहुक ने अपने स्वयं के तैयार एक लेंस वाले सूक्ष्मदर्शी से सूक्ष्मजीव और जीवाणु प्रेक्षित किया।Frank N. Egerton 2006 A History of the Ecological Sciences, Part 19: Leeuwenhoek's Microscopic Natural History Bulletin of the Ecological Society of America 87 47–58 10.1890/0012-9623(2006)87[47:AHOTES]2.0.CO;2
सन् 1796 में, एडवार्ड जेनर ने काउपोक्स के उपयोग से एक बच्चे को चेचक रोग प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने में सफलता प्राप्त की। वर्तमान में इसी सिद्धान्त से टीका विकसित किया जाता है।Riedel Stefan 2005 Edward Jenner and the history of smallpox and vaccination Proceedings (Baylor University. Medical Center) 18 1 21–25 10.1080/08998280.2005.11928028 0899-8280 1200696 16200144
सन्दर्भ
श्रेणी:आयुर्विज्ञान की शाखाएँ
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