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411 समाचार
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क़िस्सा-ए-संजान

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thumb|संजान में एक आधुनिक शिलालेख क़िस्सा-ए-संजान (फ़ारसी: قصه سنجان, गुजराती: કિસે સનજાન/કિસ્સા-એ-સંજાણ, अंग्रेज़ी: Qissa-i-Sanjan) भारत में पारसी शरणार्थियों के आरम्भिक काल का एक समकालीन ऐतिहासिक वर्णान है। इसकी घटनाएँ आज से हज़ार वर्ष से भी पहले गुज़री थी। क़िस्से का नाम गुजरात राज्य के वलसाड ज़िले के संजान शहर के नाम पर पड़ा था जो भारत में पारसियों के पहले आश्रयों में प्रमुख था। आधुनिक काल के कई पारसी इस काव्य को अपने पूर्वजों की गाथा मानते हैं।Boyce, Mary; Kotwal, Firoze M. (2003), "Irānshāh", Encyclopaedia Iranica, sup. 4, Costa Mesa: Mazda, archived from the original on 2008-02-08Bulsara, P. P. (1963), Highlights of Parsi History, BombayHodivala, Shahpurshah Hormasji (1920), "Kissah-i-Sanjan", Studies in Parsi History, Bombay क़िस्सा प्राचीन ख़ुरासान में शुरु होता है और यहाँ से प्रवसियों की गुजरात की यात्रा का बखान करता है। काव्य का पहला अध्याय सबसे लम्बा है और संजान में आतिश बेहराम (पारसी अग्निमंदिर) की स्थापना के साथ समाप्त होता है। बाद के अध्यायों में ईरान पर मुस्लिम आक्रमकों के शुरुआती हमलों को सफलतापूर्वक वापस धकेल देने और फिर बाद में रक्षा करने में असफलता और फिर भारत की ओर प्रवास का ब्योरा है। इस प्रस्थान से पहले ईरान के बूशहर में 15 वर्षों तक के ठहरने का भी उल्लेख है। अंत में ईरान से पवित्र अग्नि को संजान लाने और वहाँ स्थापित करने का वर्णन है। ब्योरे की समाप्ति पर बहमान काइकोबाद नामक पारसी पुजारी के हस्ताक्षर हैं।Modi, Jivanji J. (1905), A few events in the early history of the Parsis and their dates, BombayVimadalal, Jal Rustamji (1979), What a Parsee Should Know, BombayKotwal, Firoze M. (1974), "Some Observation on the History of the Parsi Dar-i Mihrs", Bulletin of the School of Oriental and African Studies, 37 (3): 664–669, doi:10.1017/S0041977X00127557 इन्हें भी देखें संजान पारसी धर्म प्राचीन ख़ुरासान सन्दर्भ श्रेणी:पारसी धर्म का इतिहास श्रेणी:पारसी काव्य श्रेणी:भारत में शरणार्थी