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जुपिटर
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Roman जुपिटर 0 Jupiter - Louvre MR 254 - Louvre-Lens (2).JPG देवताओं के राजाआकाश और गरज के देवता स्वर्ग गुरुवार बृहस्पतिThe History and Practice of Ancient Astronomy James Evans Oxford University Press 1998 296–7 https://books.google.com/books?id=nS51_7qbEWsC&pg=PA17 4 February 2008 978-0-19-509539-5 वज्र, महाश्येन, बाँज जूनो सैटर्न और ऑप्सSaturni filius, frg. 2 in the edition of Baehrens.https://books.google.com/books?id=bN8Fdp9kuTkC&q=ops+saturn&pg=PT420 Google Books Selected Poems: Keats: Keats John Keats 26 April 2007 Penguin UK 9780141936918 वेस्टा, सिरीस, जूनो, प्लूटो, नेप्च्यून मार्स, वलकन, बेलोना, ऐंजेलोस, लुसीना, जुवेंटस, मिनर्वा, हर्क्यूलीस जोव ज़्यूसWest, M.L. (1966) Hesiod Theogony: 18–31; Kirk, G.S. (1970) Myth: Its meaning and function in ancient and other cultures: 214–220 Berkeley and Los Angeles; with Zeus being the Greek equivalent of Jupiter. टीनिया द्यौष्पितृWest M. L. Indo-European Poetry and Myth https://archive.org/details/indoeuropeanpoet0000west Oxford University Press 2007 978-0-19-928-075-9 171 जुपिटर की एक संगमरमर की प्रतिमा, लूव्र संग्रहालय रोमन शाही पंथप्राचीन रोमन धर्म प्राचीन त्रय, कैपिटोलाइन त्रय एवं डी कोंसेंटस द्येउसजुपिटर (la Iuppiter no) प्राचीन रोमन धर्म में आकाश एवं गरज के देवता तथा देवताओं के राजा हैं। वह इस धर्म के मुख्य देवता थें। रोमन पौराणिक कथाओं में, वह रोमन धर्म को स्थापित करने के लिए रोम के दूसरे राजा नूमा पॉम्पिलियस से मोलतोल करते हैं।
माना जाता है, कि जुपिटर पहले एक आकाश देवता होते थें। उनका चिह्न वज्र और पशु महाश्येन है,Dumézil 1974 September 2023 citing Pliny Naturalis Historia X 16. A. Alföldi Zu den römischen Reiterscheiben in Germania 30 1952 p. 188 and n. 11.Dumézil 1977 215 n. 58 जिसे प्रमुख पक्षी मानी जाती थीServius Ad Aeneidem II 374. और रोमन सेना का एक चिह्न भी बना। रोमन और यूनानी सिक्कों पर जुपिटर का रूप एक महाश्येन है, जिसके पंजे में एक वज्र है।Dictionary of Roman Coins, see e.g. reverse of "Consecratio" coin of Emperor Commodus & coin of Ptolemy V Epiphanes minted 204–180 BC. वह शपथ मानते थें, जिसपर न्याय और सरकार आधारित थें। उनका मंदिर कैपिटोलाइन पहाड़ी पर है, जहाँ उनकी पूजा जूनो और मिनर्वा के साथ की जाती थी। जुपिटर का वृक्ष बाँज था।
परिचय
संपूर्ण इटली में पहाड़ी की चोटियों पर जूपितर की पूजा होती है। रोम के दक्षिण में अल्बान की पहाड़ी पर जूपितर की पूजा का सर्वाधिक प्राचीन केंद्र है। यह तीस लातीनी नगरों के उस संघ का केंद्रीय पूजास्थल था जिसका रोम भी सामान्य सदस्य था। स्वयं रोम में कैपीलोलिन की पहाड़ी पर जूपितर के प्राचीनतम मंदिर के अवशेष मिले हैं।
वास्तव में जूपितर न केवल जातियों के संरक्षक के रूप में पूजा जाता है, अपितु उसे एक मात्र महान नैतिक शक्ति रूप में भी मान्यता प्राप्त है, जिसका संबंध शपथ, संगठनों और संधियों से है। रोम के अनेक प्राचीन पवित्र विवाह-संस्कार जूपितर के पुजारियों की ही उपस्थिति में संपन्न हुए।
लेकिन समय के अनुसार जूपितर संबंधी धारणाओं और मान्यताओं में परिवर्तन तथा विकास होता रहा। रोमन राजतंत्र के अंतिम दिनों में जूपितर के नए मंदिरों का निर्माण हुआ और एक नवीन संस्कार के द्वारा उसे सर्वशक्तिमान् 'जूपितर आप्तिमस मैक्सिमस' की संज्ञा दी गई। यह संस्कार समारोह प्रति वर्ष १३ सितंबर को मनाया जाता था जिसमें कांसुल, सीनेट-सदस्य, न्यायाधीश और पुरोहित सम्मिलित होते और अतीत में की गई शपथों को पूरा होने की प्रार्थना करते थे। उस अवसर पर इस महान देवता को पशुबलि दी जाती और अतीत में साम्राज्य की रक्षा के लिये उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती थी तथा भविष्य के लिये नई शपथ ग्रहण की जाती थी। बाद में यह दिन खेल कूद के समारोह का दिन बन गया, जो शत्रुओं पर विजय की खुशी में मनाया जाता था। शत्रुओं पर विजय के पश्चात् खुशी के जलूस निकाले जाते और जूपितर के मंदिर पर जाकर उसके प्रति कृतज्ञता स्वरूप उसकी पूजा की जाती थी।
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