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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

विवेकचूडामणि

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विवेकचूडामणि वेदो का सार भारत, नेपाल आदि शंकराचार्य बाद में हुए सभी शंकराचार्य ५ ८१ ईस्वीसन 795 के आसपास सनातन धर्म के नीतिमूल्यो के पतन समय पुन: धर्म की स्थापना Raja Ravi Varma - Sankaracharya.jpg 300 विवेकचूडामणि के रचयिता आदि शंकराचार्य का चित्र। विवेकचूडामणि आदि शंकराचार्य द्वारा संस्कृत भाषा में विरचित प्रसिद्ध ग्रन्थ है जिसमें अद्वैत वेदान्त का निर्वचन किया गया है। इसमें ब्रह्मनिष्ठा का महत्त्व, ज्ञानोपलब्धि का उपाय, प्रश्न-निरूपण, आत्मज्ञान का महत्त्व, पंचप्राण, आत्म-निरूपण, मुक्ति कैसे होगी, आत्मज्ञान का फल आदि तत्त्वज्ञान के विभिन्न विषयों का अत्यन्त सुन्दर निरूपण किया गया है। माना जाता हैं कि इस ग्रन्थ में सभी वेदों का सार समाहित है। शंकराचार्य ने अपने बाल्यकाल में ही इस ग्रन्थ की रचना की थी। भूमिका माना जाता है कि ईस्वी सन ७८८ के पूर्व के समय में आर्यावर्त में सनातन धर्म के नीति-मूल्यों का पतन होने लगा था और वैदिक ज्ञान के साथ पाख़ण्ड भी फ़ैल रहा था। वेद के विरुद्ध प्रचार होने से बहुत से सनातन धर्मी लोग पूजन आदि कर्मो से तथा पितृकर्मो से विरत होकर दूसरों को भी धर्म से विमुक्त कर रहे थे। जब सनातन धर्म की दुर्दशा बढ़ती गई तब उक्त काल में भारत के वर्तमान में केरल नाम से प्रसिद्ध प्रदेश में आदि शंकराचार्य का प्रदुर्भाव हुआ। ये बालक जन्म से ही विलक्षण था और अपनी ३२ वर्ष की अल्पआयु में ही संस्कृत भाषा में बहुत से ग्रन्थों की रचना की, भारत भ्रमण करके अलग-अलग चार जगहों पर शंकराचार्य मठों की स्थापना की। विवेकचूडामणि और अन्य ग्रन्थों के द्वारा वेदो के नीतिमूल्यों को पुन: स्थापित किया। शंकराचार्य ने इस ग्रन्थ के द्वारा अद्वैत (ईश्वर एक ही है) मत का स्थापन किया। सनातन धर्म का ज्ञान चार वेदो में हैं जो मूल आधार माने जाते हैं किन्तु शंकराचार्य को लगा कि सभी लोगों की भूमिका एसी नहीं है कि इसे समझ सके और आत्म-अनात्म पदार्थो का भेद पहचान सकें। कोई एसा ग्रन्थ होना चाहिए जिसमें चारों वेदो का सार हो, थोड़े अक्षरोमें सम्पूर्ण आध्यात्म विद्या का सिद्धांत लिखा जाय जिसको पढ़ने से जनसाधारण को भी आत्म-अनात्म का विवेक सुगम साध्य हो। इस उद्देश के साथ शंकराचार्य ने इस ग्रन्थ की रचना की थी। जिन लोगों को वैदिक संस्कृत समझ नहीं आता था उनके लिए भी ये ग्रन्थ उपयोगी बना।चंद्रशेखर शर्मा विवेक चूड़ामणी विवेक चूड़ामणी लक्ष्मीर्वैंकटेश्वर मुद्रणालय, मूंबई संस्कृत शंकराचार्य की जीवनी के अनुसार उनके जो भी ग्रन्थ मिलते हैं उन्हे प्राय: काशी और बद्रिकाश्रम में लिखा गया था। परिचय आदि शंकराचार्य ने अपने ११-१२ वर्ष की आयु में ही संस्कृत भाषा में २५० से ज्यादा ग्रन्थों की रचना की थी। ब्रह्मसूत्रभाष्य, उपनिषद् (ईशोपनिषद, केनोपनिषद, कठोपनिषद, प्रश्नोपनिषद, मुण्डकोपनिषद, माण्डुक्यपनिषद, एतरेय, तैतरीय, छन्दोग्य, बृहदार्ण्यक, नृसिहपूर्वतापनिय, श्वेताश्वर इत्यादि) भाष्य, गीताभाष्य, विष्णुसहस्त्रनामभाष्य, सनत्सुजातीयभाष्य, हस्तामलकभाष्य, ललितात्रिशतीभाष्य, विविकचूडामणि, प्रबोधसुधाकर, उपदेशसाहस्त्री, अपरोक्षानुभूति, शतश्लोकी, दशश्लोकी, सर्ववेदान्तसिद्धांतसारसंग्रह, वाक्सुधा, पंचीकरण, प्रपंचसारतन्त्र, आत्मबोध, मनिषपंचक, आनन्दलहरीस्त्रोत्र इत्यादि उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं जिसमें से एक विवेकचूडामणि है। आरम्भ विवेकचूडामणि ग्रंथ का आरम्भ निम्न श्लोक के साथ होता है:- “ मायाकल्पिततुच्छसंसृतिलसत्प्रज्ञैरवेद्यं जगत्सृष्टिस्थित्यवसानतोप्यनुमितं सर्वाश्रयं सर्वगम्। इन्दोपेन्द्रमरुद्रणप्रमृतिमिर्नित्यं त्द्ददब्जेर्चितं वन्देशेष फलप्रदं श्रुतिशिरोवाक्यैकवेद्यं शिवम्।। „ इस मंगलाचरण के बाद शंकराचार्य जी अपने गुरु को प्रणाम करते हैं और आगे मनुष्य जन्म मिलना ही कितना दुर्लभ है, उसमें भी ब्राह्मणत्व की प्राप्ति और वैदिक धर्मपरायण होना कितना कठिन, उसमें भी इसमें विद्वान होना कितना कठिन है और अन्त में सबकुछ होते हुए भी ब्रह्म को जानना और मोक्ष की प्राप्ति करना कितना दुर्लभ कार्य है, इस बात का निरुपण किया गया है। सुप्रसिद्ध श्लोक वाक्य ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः (ब्रह्म सत्य है, जीवन मिथ्या है, जीव और ब्रह्म में कोई अन्तर नहीं है) इस ग्रन्थ का ही एक भाग है। विषय निरुपण विवेकचूडामणि का आरम्भ ब्रह्मनिष्ठ के महत्त्व से हुई है और अंतिम भाग में अनुबन्ध चतुष्टय के साथ ग्रन्थ की समाप्ति होती है। मध्य के अन्य अनुभागों में मुख्यतः ज्ञानोपलब्धि का उपाय, ब्रह्मज्ञान के अधिकारी व्यक्ति का निरुपण, गुरु, उपदेश, प्रश्न निरुपण, शिष्य, स्वप्रयत्न का महत्त्व (आत्मज्ञान की प्राप्ति हेतु), आत्मज्ञान का महत्व, स्थूल शरीर, दस इन्द्रियाँ, अंतःकरण, पंचप्राण, सूक्ष्म शरीर, अहंकार, प्रेम, माया, त्रिगुण, आत्म और अनात्म का भेद, अन्नमय, प्राणमय, ज्ञानमय आदि कोश, मुक्ति कैसे होगी?, आत्मा के स्वरुप के विषय में प्रश्नोत्तरी, ब्रह्म, वासना, योगविद्या, आत्मज्ञान का फल, जीवन्मुक्त के लक्षण आदि आध्यात्मविद्या के गुह्य विषयों पर विवरण लिखा गया हैं। इसे वेदान्त भी कहा जाता हैविवेक चूड़ामणि http://pustak.org/books/bookdetails/8977 पुस्तक ओआरजी रणधीर प्रकाशन 25 फरवरी 2017 https://web.archive.org/web/20170226045809/http://pustak.org/books/bookdetails/8977 26 फ़रवरी 2017 dead। सन्दर्भ इन्हें भी देखें मनीषा पंचकम बाहरी कड़ियाँ विवेक चूडामणि (संस्कृत विकिस्रोत) विवेकचूडामणि - स्वामी माधवानन्द कृत अनुवाद श्रेणी:भारतीय दर्शन श्रेणी:संस्कृत श्रेणी:ग्रन्थ