Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

योग की सोपान परंपरा

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

योग की सोपान परंपरा का उपदेश योगी विशुद्धानन्द परमहंस जी ने दिया था। इसमें विभिन्न प्रचलित योग मार्ग को सोपान क्रम में निरूपित किया गया है। 400px|भारत, मिरजापुर, छानबे ब्लाक, थानीपट्टी गांव, प्राइमरी स्कूल, दीवार पर योग के सोपान परंपरा, पेंटिंग कर्म ही मन्थन है, उसी से ज्ञान होता है। चैतन्यरूप ज्ञान से भक्ति, भक्ति से प्रेम और प्रेम से साक्षात्कार। यही अध्यात्मसाधना की योगियों द्वारा अनुभूत परिपाटी है। सबके मूल में है कर्म - वह योग साधना का प्रथम सोपान है, मूलाधार है। प्रेम की प्राप्ति योगमार्ग से ही हो सकती है। साधारण प्रेम मनोविकार मात्र है। योगी ही सच्चा प्रेमी है। भगवतीप्रसाद सिंह मनीषी की लोकयात्रा 2001 विश्वविद्यालय प्रकाशन वाराणसी 37 सप्तम https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=291 व्यष्टि अहं इन्द्रियों की सहायता से इस बाह्य जगत का परिचय पाता है। व्यष्टि के कारण वह इस जगत को कल्पना जाल के रूप में समझ नहीं पाता। यह जगत उसे घनीभूत और सत्य ही जान पड़ता है। इस बोध के ऊपर ही प्रतिष्ठित होकर उसका व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन सहस्रों जन्मों के बीच प्रवाहित होता हुआ चला आ रहा है। पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, लोक-लोकान्तर सभी इस बोध के साथ अनुस्यूत है। जब तक स्थूल देह में "मैं-पन" का बोध होता है, तब तक यह नहीं हो सकता कि यह स्थूल बाह्य जगत सत्यवत प्रतीत न हो। श्री भूपेद्रनाथ सान्याल श्रीमद्भगवद्गीता 2005 गुरूधाम प्रकाशन समिति भागलपुर बिहार प्रथम https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=1948 भाग-१,भूमिका-ग कर्म स्थूल-देह में आत्मभाव (देहाभिमान) की निवृत्ति करके सूक्ष्म-जगत में प्रवेश प्राप्त होता है। प्रो. लक्ष्मीनारायण तिवारी कविराज प्रतिभा 2016 सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी द्वितीय https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=2643 १४१ इसके लिए प्राणायाम, मंत्र जप आदि नाना प्रकार की साधनाएँ की जाती हैं। ज्ञान ज्ञान की अवस्था को योग की सात भूमियाँ नाम से भी समझा जाता है। भक्ति जीव कर्म कर सकता है, परंतु भाव को प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि वह स्वरूपतः भावमय नहीं है। भावभक्ति का उदय कृपा से ही होता है। यह कृपा साक्षात भगवान की भी हो सकती है अथवा सिद्ध भगवद्भक्त की भी। भक्ति ह्लादिनी शक्ति की एक विशेष वृत्ति है। प्रो. लक्ष्मीनारायण तिवारी कविराज प्रतिभा 2016 सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी द्वितीय https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=2643 ७० प्रेम भक्ति का विकास ही प्रेम है। भावसाधना करते-करते स्वभावतः ही प्रेम का आविर्भाव हो जाता है। प्रो. लक्ष्मीनारायण तिवारी कविराज प्रतिभा 2016 सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी द्वितीय https://www.vvpbooks.com/bookDetail.php?bid=2643 ७२ सन्दर्भ श्रेणी:हिन्दू धर्म श्रेणी:हिन्दू आधार