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संन्यासी विद्रोह
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अट्ठारहवीँ सदी के अन्तिम वर्षों 1763-1800ई में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध तत्कालीन भारत के कुछ भागों में संन्यासियों (केना सरकार , दीजी नारायण) ने उग्र आन्दोलन किये थे जिसे इतिहास में संन्यासी विद्रोह या नाथ साधु विद्रोह कहा जाता है। Ghosh Jamini Mohan 1930 Sannyasi and Yogis( Nath) raiders in Bengal https://archive.org/details/dli.granth.88815 Bengal Secretariat Book Depot 47 500497978 Lorenzen David N. David Lorenzen 2006 Who Invented Hinduism: Essays on Religion in History https://books.google.com.sg/books?id=SO-YmMWpcVEC&pg=PA61 Yoda Press 61 9788190227261 14 जुलाई 2020 https://web.archive.org/web/20200702053649/https://books.google.com.sg/books?id=SO-YmMWpcVEC&pg=PA61 2 जुलाई 2020 live यह आन्दोलन अधिकांशतः उस समय ब्रिटिश भारत के बंगाल और बिहार प्रान्त में हुआ था। 18 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी के पत्र व्यवहार में कई बार फकीरों और संन्यासियों के छापे का जिक्र हुआ है। यह छापा उत्तरी बंगाल में पड़ते थे। 1770 ईस्वी में पड़े बंगाल में भीषण अकाल के कारण हिंदू और मुस्लिम यहां वहां घूम कर अमीरों तथा सरकारी अधिकारियों के घरों एवं अन्न भंडार को लूट लिया करते थे। ये संन्यासी धार्मिक भिक्षुक थे पर मूलतः वह किसान थे, जिसकी जमीन छीन ली गई थी। किसानों की बढ़ती दिक्कतें, बढ़ती भू राजस्व, 1770 ईस्वी में पड़े अकाल के कारण छोटे-छोटे जमींदार, कर्मचारी, सेवानिवृत्त सैनिक और गांव के गरीब लोग इन संन्यासी दल में शामिल हो गए। यह बंगाल और बिहार में पांच से सात हजार लोगों का दल बनाकर घूमा करते थे और आक्रमण के लिए गोरिल्ला तकनीक अपनाते थे। आरंभ में यह लोग अमीर व्यक्तियों के अन्न भंडार को लूटा करते थे। बाद में सरकारी पदाधिकारियों को लूटने लगे और सरकारी खजाने को भी लूटा करते थे। कभी-कभी ये लुटे हुए पैसे को गरीबों में बांट देते थे। समकालीन सरकारी रिकॉर्ड में इस विद्रोह का उल्लेख इस प्रकार है:-
सन्यासी और फकीर के नाम से जाने जाने वाले डकैतो का एक दल है जो इन इलाकों में अव्यवस्था फैलाए हुए हैं और तीर्थ यात्रियों के रूप में बंगाल के कुछ हिस्सों में भिक्षा और लूटपाट मचाने का काम करते हैं क्योंकि यह उन लोगों के लिए आसान काम है। अकाल के बाद इनकी संख्या में अपार वृद्धि हुई। भूखे किसान इनके दल में शामिल हो गए, जिनके पास खेती करने के लिए न ही बीज था और न ही साधन। 1772 की ठंड में बंगाल के निचले भूमि की खेती पर इन लोगों ने काफी लूटपाट मचाई थी। 50 से लेकर 1000 तक का दल बनाकर इन लोगों ने लूटने, खसोटने और जलाने का काम किया।http://egyankosh.ac.in/bitstream/123456789/19944/1/Unit-29.pdf संग्रहीत प्रति 13 जुलाई 2020 https://web.archive.org/web/20181222213234/http://egyankosh.ac.in/bitstream/123456789/19944/1/Unit-29.pdf 22 दिसंबर 2018 dead
यह बंगाल के योगी,नाथ,गिरि,गोस्वामी, सम्प्रदाय के संन्यासियों द्वारा शुरू किया गया था जिसमें जमींदार, कृषक तथा शिल्पकारों ने भी भाग लिया। इन सबने मिलकर कम्पनी की कोठियों और कोषों पर आक्रमण किये। ये लोग कम्पनी के सैनिकों से बहुत वीरता से लड़े।
इस संघर्ष की खासियत यह थी कि इसमें हिंदू और मुसलमान ने कंधे से कंधा मिलाकर भाग लिया। इन विद्रोह के प्रमुख नेताओं में केना सरकार, दिर्जिनारायण, मंजर शाह, देवी चौधुरानी, मूसा शाह, भवानी पाठक उल्लेखनीय हैं। 1880 ईस्वी तक बंगाल और बिहार में अंग्रेजो के साथ संन्यासी और फकीरों का विद्रोह होता रहा। इन विद्रोह का दमन करने के लिए अंग्रेजों ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी।
विद्रोह के समर्थक शंकराचार्य के अनुन्यायी थे।
बांग्ला भाषा के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय का सन १८८२ में रचित उपन्यास आनन्द मठ इसी विद्रोह की घटना पर आधारित है।निहालचन्द्र वर्मा द्वारा सम्पादित बंकिम समग्र 1989 हिन्दी प्रचारक संस्थान वाराणसी पृष्ठ ९९१
संन्यासी विद्रोहियों ने बोग्रा और मैमनसिंह में अपनी स्वतंत्र सरकार स्थापित किया । इनकी आक्रमण पद्धति गोरिल्ला युद्ध पर आधारित थी।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
भवानी चरण पाठक
बंगाल का भीषण अकाल (१७७०)
संथाल विद्रोह
कोल विद्रोह
चुआड़ विद्रोह
खेरवार आंदोलन
बाहरी कड़ियाँ
अंग्रेजों से जूझे थे संन्यासी
संन्यासी विद्रोह और उसके सबक
श्रेणी:भारतीय स्वतन्त्रता के क्रान्तिकारी आन्दोलन
श्रेणी:बंगाल का इतिहास