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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

मामा बालेश्वर दयाल

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मामा बालेश्वर दयाल' (10 मार्च 1905 - 26 दिसंबर 1998) एक सामाजिक कार्यकर्ता और भारतीय राजनेता थे। उन्हें राजस्थान और मध्य प्रदेश में भील जनजातियों के बीच उनके काम के लिए याद किया जाता है, उन्होंने उन्हें जल, जंगल और ज़मीन के अधिकारों के लिए लड़ने के लिए संगठित किया था।मामा बालेश्वर दयाल आदिवासियों के मसीहा कहे जाते हैं तथा इन्होंने आदिवासियों के जल जंगल जमीन बचाने के लिए अनेक आंदोलन किये तथा इन आंदोलनों में कई बार जेल भी गए व आदिवासियों के अधिकारों को दिलाने के लिए हमेशा आगे रहे।उनकी पुण्यतिथि 26 दिसंबर 1998 को श्रद्धांजलि के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इनकी श्रद्धांजलि के अवसर पर राजस्थान गुजरात मध्य प्रदेश एवं कई राज्यों के आदिवासी श्रद्धालु व उनके बताए गए मार्ग पर चलने वाले सभी भक्तगण 25 दिसंबर बामनिया आश्रम पहुंच कर जागरण करते हैं। 26 दिसंबर को उनकी श्रद्धांजलि दिवस के रूप में मनाते हैं। उनके बताए गए मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। इतिहास के प्रत्येक कालखंड में हमारी मातृभूमि में ऐसे वीर बेटे- बेटियों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने विलक्षण योगदान के बल पर भारत की भावना को भी व्यक्ति दी है । कुछ विभूतियों ने सप्त ऋषि मंडल के नक्षत्र की तरह हमारा मार्गदर्शन किया है मामा बालेश्वर दयाल हमारे नक्षत्र मंडल के सबसे चमकते सितारों में से एक थे जिनका प्रकाश राष्ट्र के मार्ग में आलोकित करता रहा है। आज जब देश ने अपने आधुनिक इतिहास के इस महान व्यक्तित्व की आज 26 दिसंबर को मामा बालेश्वर दयाल की 26 वीं पुण्यतिथि मना रहे है उनकी पुण्यतिथि का मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात के हर भील  को इंतजार रहता है क्योंकि वह भीलों के भगवान/भीलों के मसीहा के नाम से जाने जाते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर  उनके लाखों अनुयाई आज ‌कर्मभूमि और समाधि स्थल बामनिया, झाबुआ, मध्यप्रदेश में श्रद्धांजलि दे रहे है। हम उनकी पुण्य स्मृति को कृतज्ञता पूर्वक नमन करता हूं । प्रारम्भिक जीवन : जन्म : 10 मार्च 1905, निवाड़ी कलां, जिला इटावा, उत्तर प्रदेश पिता :पंडित शिवशंकर दीक्षित, माता: रामदुलारी देवी, पत्नी : सावित्री बाई मृत्यु : 26 दिसंबर,1998, भील आश्रम बामनिया, जिला झाबुआ, मध्यप्रदेश। शिक्षा और क्रांतिकारी संघर्ष :  उनका जन्म सनाढ्य ब्राह्मण परिवार में हुआ और 20 वीं शताब्दी के आरंभिक काल में हुआ, जहां सम्पूर्ण भारत वर्ष ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य की गुलामी में हुआ था। पिताजी पेशे से हेडमास्टर थें। उनकी प्राथमिक शिक्षा से इंटर कॉलेज तक शिक्षा इटावा से प्राप्त की। इंटर कॉलेज के विधार्थी जीवन में ही साथियों ने मिलकर गांधी जी के इटावा रेलवे स्टेशन पर सभा का आयोजन कराया। क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गये, जिससे पिताजी नाराज हुए तो अपनी जन्मभूमि का त्याग कर समकालीन प्रमुख क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के गांव "भाभरा" झाबुआ में आकर शरण ली।1930के नमक सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लिया और पहली बार 13 माह की कारावास की सजा मिली। फिर वे अपने मामा माधव प्रसाद दुबे खाचरोद में कॉपरेटिव इंस्पेक्टर थे, वहां कुछ समय बिताया और, मध्य भारत में भीषण अकाल पड़ा, उसकी अखबारों के माध्यम से जानकारी मिली कि भीलों की दीनता और दरिद्रता का अनुचित लाभ उठाकर, ब्रिटिश सरकार और ईसाई मिशनरियों न ऐसा षड्यंत्र रचा कि ऐसी देशीय जनशक्ति को पैदा करें,जो जन्म जन्मांतर विदेशी शासन के प्रति निष्ठावान रहे और भारतीय राष्ट्र के लिए कंटक बने। साथ ही भील अपने लड़के - लड़कियों को 50/- रुपयों में सिपाहियों और ईसाई मिशनरियों को बेचा जा रहा था , और भोले-भाले भीलों का धर्मांतरण किया जा रहा था।उस समय उन्हें इस घटनाक्रम ने अत्यधिक उत्साही, साहसिक और उत्कट सेवा व्रती बना दिया। मामा बालेश्वर दयाल ने आदिवासियों को जनजागृत करते हुए उन्होंने "जल जंगल जमीन" का आंदोलन चलाया था। आदिवासी दशरथ निनामा (खजूरिया खेड़ा) प्रतापगढ़ राज. पवन कुमार,बांसवाडा, शोधार्थी, जनजातीय विश्वविद्यालय मुकेश चंद्र निनामा, वरिष्ठ अध्यापक (पदम नाथ का गड़ा पोस्ट तेजपुर बांसवाड़ा श्रेणी:1905 में जन्मे लोग श्रेणी:१९९८ में निधन श्रेणी:राजस्थान के राजनीतिज्ञ