411 REFERENCE · Wikipedia
आवर्तनशील कृषि
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
आवर्तनशील कृषि, कृषि की एक पद्धति है जो बुन्देलखण्ड में प्रचलित है। इस पद्धति में एक बड़े जोत को इस प्रकार बाँटा जाता है कि उसमें सब्जियाँ व अनाज उगाने, पशुपालन, मछलीपालन तथा बागवानी आदि के लिये पर्याप्त स्थान मौजूद हो। कृषि की यह पद्धति सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर आधारित है। इसके अनुसार, पृथ्वी पर उपस्थित सभी पशु-पक्षी, वृक्ष, कीड़े व अन्य सूक्ष्म जीवों के जीवन का एक निश्चित क्रम है। यदि मानव इनके क्रम को नुकसान न पहुँचाए तो ये कभी नष्ट नहीं होंगे। कृषि की इस पद्धति में इन सभी जीवों का समन्वय तथा सहयोग आवश्यक है जिससे कृषि को धारणीय, वहनीय एवं प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल बनाया जा सके।
इसके अतिरिक्त इस पद्धति में एकल कृषि (Monoculture) के स्थान पर मिश्रित कृषि (Mixed Farming) तथा मिश्रित फसल (Mixed Cropping) पर बल दिया जाता है। कृषि की इस पद्धति में रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर गोबर, सब्जियों के छिलके, बचा हुआ खाना व अन्य जैव अपशिष्ट पदार्थों के प्रयोग से बनी जैविक खाद, कंपोस्ट, वर्मीकंपोस्ट व नाडेप विधि से बनी खाद का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार की कृषि में सिंचाई के लिये जल का सीमित उपयोग तथा वर्षा के जल का संरक्षण किया जाता है। आवर्तनशील कृषि में इस बात पर विशेष बल दिया जाता है कि कृषि उत्पादों को सीधे बाज़ार में बेचने की बजाय लघु स्तर पर प्रसंस्करण (Processing) किया जाए। इससे न केवल इन उत्पादों का मूल्यवर्द्धन होगा बल्कि किसानों को उनके उत्पाद की उचित कीमत भी मिलेगी। इस पद्धति के अंतर्गत उत्पादित अनाज के एक हिस्से को संरक्षित किया जाता है ताकि अगली फसल की बुआई के लिये बाज़ार से बीज खरीदने की आवश्यकता न पड़े।आवर्तनशील कृषि
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
दुनियाभर में फेमस हुआ खेती का ये खास फॉर्मुला ; अमेरिका, इजराइल और अफ्रीकी किसान भी ले रहे ट्रेनिंग
Avartansheel Kheti changing lives with periodic farming (डाउन टू अर्थ)
श्रेणी:कृषि
प्रस्तावना
आवर्तनशील खेती, मानवीय परम्परा को बरकरार रखते हुए इस धरती को संरक्षित करने की विधि है। मानव की सामान्य जरूरतें आहार, आवास एवं अलंकार (रोटी, कपड़ा और मकान) हैं। जिनका उत्पादन आवर्तनशील खेती द्वारा आसानी से हो सकता है। इस प्रकार की खेती के मूल में सह-अस्तित्ववादी विचारधारा है, जिसका सार ‘‘जीने दो और जियो’’ है। प्रचलित विचारधाराओं में यह मान्यता सुदृढ़ है कि किसी एक के पोषण के लिये दूसरों का शोषण करना पड़ता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण प्रचलित खेती की पद्धतियाँ हैं। आधुनिक खेती पद्धतियों में फसल के पोषण के लिये खेत की मिट्टी का, खेत में पाये जाने वाले जीव-जन्तुओं का, जल का, अन्य वनस्पतियों का शोषण करना एक आवश्यकता के रूप में स्वीकारा गया है। ऐसी शोषण आधारित खेती का परिणाम जो आ रहा है, वह सभी जानते हैं। मिट्टी की उर्वरकता कम होती जा रही है, जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है, जल दूषित होता जा रहा है, वनस्पतियों एवं जीव-जंतुओं की प्रजातियाँ लुप्त होती जा रही हैं। खेती के लिये परिस्थिति दिन-प्रतिदिन प्रतिकूल होती जा रही है। जिसका दीर्घकालीन परिणाम यह है कि मानव के लिये आवश्यक आहार, आवास एवं अलंकार की वस्तुओं की उपलब्धता कम होती जाएगी, जिससे मानव जाति के अस्तित्व पर ही संकट आ जाएगा। वर्तमान में यही घटित हो रहा है। इस संकट से उबरने के लिये आवर्तनशील खेती ही एक मात्र रास्ता है। आवर्तनशील खेती को अपनाने से पहले आवर्तनशील खेती के मूल में जो सह-अस्तित्ववादी विचारधारा है, उसे समझना पड़ेगा।
सह-अस्तित्ववाद के अनुसार : अस्तित्व, सह-अस्तित्व रूपी व्यवस्था है। हमारी धरती भी इसी व्यवस्था के अंगीभूत है। धरती पर यह व्यवस्था चार अवस्थाओं के रूप में प्रकट है।
पदार्थावस्था - खनिज, जल, वायु संसार
प्राणावस्था - वनस्पति संसार
जीवावस्था - जीव, जन्तु, पशु, पक्षी आदि
ज्ञानावस्था - मानव
मानव ही प्रकृति में उत्पादन कार्य करता है, प्रकृति में संतुलन ही उत्पादन का आधार है। अगर प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है तो उत्पादन संभव नहीं है। वर्तमान में जिन पद्धतियों से कृषि हो रही है, उससे ही प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। ऐसी पद्धतियों के विकसित होने से मानव परम्परा भ्रमित हुई है। भ्रमवश ही, मानव ने मानव का एवं मानव ने प्रकृति का शोषण कर सुखी होने का प्रयास किया है। सत्य यही है कि शोषण से कोई सुखी नहीं होता। शोषण से केवल सुविधाएँ एकत्रित की जा सकती है। ये सुविधाएँ सार्वभौमिक ना होने के कारण, कुछ ही लोग इन्हें प्राप्त कर पाते हैं जिससे समाज में असमानता फैलती है, असमानता से संघर्ष पैदा होता है और संघर्ष से युद्ध होता है। संघर्ष (युद्ध) मानव को स्वीकार नहीं है। आधुनिक खेती भी ऐसा ही संघर्ष, युद्ध, शोषण की मानसिकता है। प्राकृतिक व्यवस्था की सम्पूर्णता एवं अवधारणा के लिये ही आवर्तनशील खेती प्रारम्भ हुई। आवर्तनशील खेती उपयोगिता-पूरकता विधि पर आधारित है। सह-अस्तित्ववाद के अनुसार, अस्तित्व में हर वस्तु स्वयं में उपयोगी एवं सभी के लिये है। इस वास्तविकता को मानवीय प्रकृति (पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था) में भली-भांति देखा जा सकता है। परंतु वर्तमान में इस धरती में मानव जोकि ज्ञानावस्था की इकाई है, वह अभी तक उपयोगिता-पूरकता विधि को ना तो समझ पायें हैं, ना ही पहचान पाये हैं, निर्वाह कर पाना तो बहुत दूर है। उपयोगिता- पूरकता विधि को समझने और पहचानने के लिये सह-अस्तित्ववाद का विधिवत अध्ययन करना अनिवार्य है। सह-अस्तित्ववाद के अध्ययन से जिससे मानव का स्वरूप, मानव का लक्ष्य, मानवीय आकांक्षा, परिवार, समाज, परम्परा में व्यवस्था, मानवीय उत्पादन कार्य, मानवीय व्यवसाय, स्वावलंबन, समाज में समृद्धि के अर्थ में भागीदारी अध्ययनकर्ता को स्पष्ट होती है। इसके अभाव में मानव उपयोगिता-पूरकता विधि को प्रमाणित नहीं कर पाता। इस स्पष्टता के साथ मानव आवर्तनशील खेती करने के लिये सक्षम हो जाता है।
आवर्तनशील खेती में मुख्यतः बाग लगाना, पशुपालन करना, मिश्रित खेती करना, साधनों का सदुपयोग करना, खनिज, बीज, पशुवंश की आवर्तनशीलता को बनाये रखना आदि कार्य नियमित रूप से किये जाते हैं। आवर्तनशील खेती की प्रक्रिया में कृषक अपने खेत में प्राकृतिक चक्रों को पहचान कर उनके साथ तालमेल बैठाकर कृषि कार्य करता है। कृषक अपने खेत में जल चक्र, वायु चक्र, उर्वरकता चक्र, कार्बन चक्र, नाइट्रोजन चक्र को ऋतु चक्र के संतुलन में पहचान कर खेती करता है। कृषक अपने खेत में हर वस्तु के आवागमन पर ध्यान रखता है और वस्तु के आवागमन को संतुलित बनाए रखता है। इस प्रक्रिया से खेत में मिट्टी की उर्वरक शक्ति, जल की उपलब्धता एवं शुद्धता, वनस्पतिक विविधता, जीव-जंतुओं की विविधता, खेत का स्थूल एवं सूक्ष्म वातावरण सभी में वृद्धि होती है। जिससे कृषक अपने आवर्तनशील खेती पद्धति से समृद्धि को प्राप्त करता है।
आवर्तनशील खेती की अवधारणा, तकनीक, सिद्धांत एवं प्रक्रियाओं का प्रकटन इस पुस्तक में प्रकाशित है। मैं कामना करता हूँ कि यह ‘‘आवर्तनशील खेती’’ पुस्तक से मानव परम्परा को एक नई दिशा मिले।
अशोक कुमार गोपाला
अध्ययनकर्ता: मध्यस्थ दर्शन सह-अस्तित्वाद
बैमितरा, छत्तीसगढ़