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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

पंचकोश

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योग की धारणा के अनुसार मानव का अस्तित्व पाँच भागों में बंटा है जिन्हें पंचकोश कहते हैं। ये कोश एक साथ विद्यमान अस्तित्व के विभिन्न तल समान होते हैं। विभिन्न कोशों में चेतन, अवचेतन तथा अचेतन मन की अनुभूति होती है। प्रत्येक कोश का एक दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। वे एक दूसरे को प्रभावित करती और होती हैं। ये पाँच कोश हैं - अन्नमय कोश - अन्न तथा भोजन से निर्मित। शरीर और मस्तिष्क। सम्पूर्ण दृश्यमान जगत, ग्रह-नक्षत्र, तारे और हमारी यह पृथ्वी, आत्मा की प्रथम अभिव्यक्ति है। यह दिखाई देने वाला जड़ जगत जिसमें हमारा शरीर भी शामिल है यही अन्न से बना शरीर अन्नरसमय कहलाता हैं। इसीलिए वैदिक ऋषियों ने अन्न को ब्रह्म कहा है। यह प्रथम कोश है जहाँ आत्मा स्वयं को अभिव्यक्त करती रहती है। शरीर कहने का मतलब सिर्फ मनुष्य ही नहीं सभी वृक्ष, लताओं और प्राणियों का शरीर।‍ जो आत्मा इस शरीर को ही सब कुछ मानकर भोग-विलास में निरंतर रहती है वही तमोगुणी कहलाती है। इस शरीर से बढ़कर भी कुछ है। इस जड़-प्रकृति जगत से बढ़कर भी कुछ है। जड़ का अस्तित्व मानव से पहिले का है। प्राणियों से पहिले का है। वृक्ष और समुद्री लताओं से पहिले का है। पहिले पाँच तत्वों (अग्नि, जल, वायु, पृथवि, आकाश) की सत्ता ही विद्यमान थी। इस जड़ को ही शक्ति कहते हैं- अन्न रसमय कहते हैं। यही आत्मा की पूर्ण सुप्तावस्था है। यह आत्मा की अधोगति है। फिर जड़ में प्राण, मन और बुद्धि आदि सुप्त है। इस शरीर को पुष्‍ट और शुद्ध करने के लिए यम, नियम और आसन का प्रवधान है। प्राणमय कोश - प्राणों से बना। स्वास लेने से हमारे अन्नमय कोश से जो स्पंदन बाहर तरफ़ जाता है उससे हमारे चारों तरफ़ तरंगों का क्रम बन जाता है, यही हमारा प्राणमय कोश होता है, मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ मनुष्य पूर्ण साँस लेता है तो उसका प्राणमय कोश उत्तम अवस्था में रहता है, प्राणायाम के सतत प्रयोग से प्राणमय कोश को स्वस्थ रखा जा सकता है। मनोमय कोश - मन से बना। हम जो देखते, सुनते हैं अर्थात हमारी इन्द्रियों द्वारा जब कोई सन्देश हमारे मस्तिष्क में जाता है तो उसके अनुसार वहाँ सूचना एकत्रित हो जाती है, और मस्तिष्क से हमारी भावनाओं के अनुसार रसायनों का श्राव होता है जिससे हमारे विचार बनते हैं, जैसे विचार होंते हैं उसी तरह से हमारा मन स्पंदन करने लगता है और इस प्रकार प्राणमय कोश के बाहर एक आवरण बन जाता है यही हमारा मनोमय कोश होता है l विज्ञानमय कोश - अन्तर्ज्ञान या सहज ज्ञान से बना कोश विज्ञानमय कोश कहलाता है। आनंदमय कोश - आनन्दानुभूति से बना। योग मान्यताओं के अनुसार चेतन और अवचेतन मन का संपर्क प्राणमय कोश के द्वारा होता है स्वर योग सत्यानंद सरस्वती 28 । स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा लिखित स्वर योग के तहत कोशों के मनोवैज्ञानिक आयाम, शारीरिक दशा और अनुभूति के प्रकार का उल्लेख किया गया। सन्दर्भ इन्हें भी देखें कोश (डिक्शनरी) राजकोष बाहरी कड़ियाँ पाँच कोश और उनका अनावरण (स्पीकिंग ट्री) आत्मा का अन्नमय कोश-1 (वेबदुनिया) श्रेणी:योग