Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

दादाबाड़ी

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

अंगूठाकार|दादाबाड़ी, बद्रीदास मन्दिर मार्ग, कोलकाता दादाबाड़ी एक प्रकार का देवालय है, जो सामान्यतः जैन मन्दिर के समीप स्थित होता है तथा खरतरगच्छ के अन्तर्गत पूज्य चार दादा गुरुओं में से किसी एक को समर्पित होता है। प्रमुख दादाबाड़ियाँ अजमेर, मालपुरा और महरौली में स्थित हैं।The Jains, by Paul Dundas. London; New York : Routledge (2002), pg. 142. 0-415-26605-X चार दादा गुरु इस प्रकार हैं— जिनदत्त सूरि (१६०२–१६८१ वीर संवत्; १०७५–११५४ ईस्वी, विक्रम संवत् ११३२–१२११, शाक संवत् ९९७–१०७६, कलियुग ४१७६–४२५५) जिनचन्द्र सूरि मणिधारी (१६६७–१६९३ वीर संवत्; ११४०–११६६ ईस्वी, विक्रम संवत् ११९७–१२२३, शाक संवत् १०६२–१०८८, कलियुग ४२४१–४२६७) जिनकुशल सूरि (१८०७–१८५९ वीर संवत्; १२८०–१३३२ ईस्वी, विक्रम संवत् १३३७–१३८९, शाक संवत् १२०२–१२५४, कलियुग ४३८१–४४३३) जिनचन्द्र सूरि द्वितीय (२०६८–२१४० वीर संवत्; १५४१–१६१३ ईस्वी, विक्रम संवत् १५९८–१६७०, शाक संवत् १४६३–१५३५, कलियुग ४६४२–४७१४) विवरण एवं आख्यान अजमेर अजमेर प्रथम दादा गुरु जिनदत्त सूरि का समाधि-स्थल है।The Jains, by Paul Dundas. London; New York : Routledge (2002), pg. 142. 0-415-26605-X यहाँ दो प्रतिमाएँ स्थित हैं— एक पार्श्वनाथ, तेईसवें तीर्थंकर की, जो सप्तधातु से निर्मित है तथा जिनके चरणचिह्न भी यहाँ प्रतिष्ठित माने जाते हैं। दूसरी विमलनाथ, तेरहवें तीर्थंकर की। यह स्थल एक तीर्थक्षेत्र है, जिसकी स्थापना द्वादश शताब्दी में हुई थी। मालपुरा मालपुरा की दादाबाड़ी सर्वाधिक तीर्थयात्रियों द्वारा दर्शनार्थ गृहीत होती है। यह दादा गुरु जिनकुशल सूरि को समर्पित है, जिन्होंने देवरौर (वर्तमान पाकिस्तान) में समाधि प्राप्त की। उससे पूर्व वे मालपुरा में रहकर शिष्यों का संकलन करते रहे। जनश्रुति है कि समाधि के पश्चात् वे अपने एक शिष्य को प्रकट हुए और उसे ज्ञान एवं उपदेश प्रदान किया। जिस शिला पर वे खड़े थे, उस पर आज भी उनके चरणचिह्न विद्यमान हैं। महरौली दिल्ली के महरौली में स्थित दादाबाड़ी वह स्थल है जहाँ द्वितीय दादा गुरु मणिधारी जिनचन्द्र सूरि का दाह संस्कार किया गया।Wiley Kristi L. The A to Z of Jainism cIhCCwAAQBAJ 148 yes 38 107 2009 The Scarecrow Press 978-0-8108-6337-8https://www.apnnews.com/coffee-table-book-on-jainism-was-presented-to-bharat-ratna-pranab-mukherjee-former-president-of-india-by-well-known-photographer-varun-joshi/ Coffee Table Book on Jainism Was Presented To Bharat Ratna Pranab Mukherjee Former President of India By Well-Known Photographer Varun Joshi 3 April 2019 APN news कथा के अनुसार, मृत्युशय्या पर उन्होंने अपने शिष्यों को निर्देश दिया कि उनके मस्तक में स्थित मणि (रत्न) मृत्यु के पश्चात् बाहर निकलकर दुग्धपात्र में स्थापित की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि अन्त्येष्टि की तैयारी के समय उनका शरीर कहीं भी न रखा जाए। किन्तु शिष्यों के शोकाकुल होने के कारण वे यह निर्देश भूल गए और शरीर को भूमि पर रख दिया। पुनः उठाने का प्रयास किया गया, किन्तु शरीर हिलाया न जा सका। यहाँ तक कि गजों का प्रयोग भी किया गया, परन्तु निष्फल रहा। अन्ततः वहीं पर अन्त्येष्टि सम्पन्न करनी पड़ी और उसी स्थल पर आज दादाबाड़ी विद्यमान है। सम्बन्धित विषय जैन मन्दिरों एवं तीर्थों की सूची सन्दर्भ आगे पढ़ें जिनदत्त सूरि के तीन अपभ्रंश ग्रन्थ, टीकाओं सहित। प्रारम्भिक टिप्पणियों एवं परिशिष्टों सहित सम्पादित – लालचन्द्र भगवन्दास गान्धी। वडोदरा, ओरिएण्टल संस्था (२४९४ वीर संवत; १९६७ ईस्वी, विक्रम संवत् २०२४, शाक संवत् १८८९, कलियुग ५०६८) बाहरी कड़ियाँ Jainteerth.com : भारत में जैन तीर्थों का मार्गदर्शक। (अंग्रेज़ी) ३ जनवरी २०१३ ईस्वी; विक्रम संवत् २०६९, शाक संवत् १९३४, कलियुग ५११४ को ‘वेबैक मशीन’ में संग्रहीत। https://web.archive.org/web/20130103064052/http://www.jainteerth.com/ 3 जनवरी 2013 श्रेणी:राजस्थान में जैन मंदिर