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411 समाचार
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द्विजदेव (कवि )

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द्विजदेव (कवि ) (१८३० -१८७१ ):रीति कालीन स्वच्छन्द मुक्तक काव्य परम्परा के अंतिम कवि हैं। ये अयोध्या के महाराज मान सिंह माने जाते हैं जो द्विजदेव के नाम से कविता करते थे। ये जाति से ब्राह्मण थे। अंत समय में सब कुछ त्याग कर वृन्दावन चले गए। https://plus.google.com/107807291734419802285/posts/YGUNzazWC7Lhttp://bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5_%28%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9%29 संग्रहीत प्रति 15 जून 2020 https://web.archive.org/web/20190404171549/http://www.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5_(%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9) 4 अप्रैल 2019 dead साहित्य सृजन इन्होंने प्रणय भावनाओं की अभिव्यक्ति सहज स्वाभाविक रूप से की है। निम्न पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं : तू जो कही ,सखि ! लोनो सरूप ,सो मो अँखियान कों लोनी गई लगि। + + + + एहो ब्रजराज ! मेरो प्रेमधन लूटिबे को , बीरा खाय आये कितै आप के अनोखे नैन ! + + + + हाय इन कुंजन तें पलटि पधारे श्याम ,देखन न पाई वह मूरति सुधामई। आवन समै में दुखदाइनि भई री लाज ,चलन समै में चल पवन ने दगा दई।। ऋतु -वर्णन ऋतू -वर्णन के क्षेत्र में इन्होंने मुक्तक काव्य परम्परा के अन्य कवियों की अपेक्षा अधिक उची दिखाई है। इसकी सार्थकता निम्नांकित उद्धरणों में देखि जा सकती है : मिलि माधवी आदिक फूल के व्याज विनोद -लवा बरसायो करै। रवि नाच लता गन तान वितान सबै विधि चित्त चुरायो करै। द्विजदेव जु देखि अनोखी प्रभा अलि -चारन कीरति गया करै। चिरजीवो ,बसन्त ! सदा द्विजदेव प्रसूनन की झरि लायो करै।। घहरि घहरि घन सघन चहूँधा घेरि , छहरि छहरि विष -बूँद बरसावै ना। द्विजदेव की सौं अब चूकै मत दाँव ,ए रे पातकी पपीहा !तू पिया की धुनि गावै ना।। + + + हौं तौ बिन प्राण ,प्रान चाहत तजोई अब ,कत नभ चंद तू अकास चढ़ि धावै ना।। प्रकाशित ग्रन्थ शृंगार -बत्तीसी शृंगार -लतिका सन्दर्भ श्रेणी:कवि श्रेणी:महाकवि श्रेणी:रीतिकालीन कवि श्रेणी:भारत