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लाला सीताराम की अनुवाद दृष्टि
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लाला सीताराम की अनुवाद दृष्टि
परिचय
लाला सीताराम हिन्दी साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व रहे हैं। इन महान व्यक्तित्व का जन्म सन् 1861 ई. में अयोध्या में हुआ था। इनको उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, संस्कृत एवं हिन्दी का अच्छा-खासा ज्ञान था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा फैजाबाद में एवं उच्च शिक्षा लखनऊ में संपन्न हुई। लखनऊ में अध्ययन के समय ही इन्होंने अवध पंच एवं अवध अखबार में लेखन कार्य आरंभ कर दिया था।भारतीय साहित्य के निर्माता ,लाला सीताराम भूप चतुर्वेदी हेरम्ब SAHITYA AKADEMI 2017 9789386771520
लाला सीताराम को भारतीय साहित्य के निर्माता के रूप में स्वीकारने पर तनिक भी संशय नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह एक ऐसे व्यक्ति थे, जिसके चलते हिन्दी को पहली बार सन् 1916 ई. में, कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर स्तर पर विषय के रूप में स्वीकृति मिली। लाला सीताराम के इस कृत्य से उनकी हिन्दी भाषा के प्रति सहानुभूति का अनुमान लगाया जा सकता है।लाला सीताराम के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव सन् 1883 ई. में था, जब वे अध्यापन कार्य के लिए बनारस के क्वीन्स कॉलेज में गए। यह, वह काल था जब उनकी हिन्दी भाषा के प्रति निष्ठा चरम उत्कर्ष पर थी। हिन्दी भाषा के प्रति लगाव या हिन्दी भाषा की सेवा का व्रत उनके परम मित्र बालेश्वर प्रसाद जी ने दिलवाया। सन् 1883 ई. में उनके मित्र बालेश्वर जी ने काशी पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया, जिसके चलते बाबू हरिश्चन्द्र एवं लाला सीताराम संपर्क में आए। भारतेन्दु ने, लाला सीताराम के लेखों की प्रशंसा की जिससे उनको और अधिक प्रोत्साहन और बल मिला। लालाजी जब फैजाबाद में प्रधानाचार्य के पद पर आसीन थे, तब संयुक्त प्रान्त के सबसे बड़े शिक्षाधिकारी "जे. सी. नेस्ट-फील्ड" ने कहा था। उनकी वार्षिक रिपोर्ट में लिखा था कि - "लाला सीताराम तत्कालीन भारत के सर्वाधिक शिक्षित व्यक्ति है"।Travel through History LALA SITARAM BHOOP: HINDI-SEWI EVAM ATHAK SENANI 2021-09-16 https://www.youtube.com/watch?v=hST3JocGQfo 2026-04-13
लालाजी का जन्म प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दो वर्ष पश्चात हुआ था , जाहिर है वह माहौल जब भारतवर्ष में प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन बस प्रारंभ हुआ था। Lala Sitaram 'Bhoop' (Makers of Indian Literature) Chaturvedi Heramb SAHITYA AKADEMI 2017 9789386771520 इनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति आयोध्या का इतिहास है जो पहली बार 1932 में प्रकाशित हुआ था। इनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति आयोध्या का इतिहास है जो पहली बार 1932 में प्रकाशित हुई थी । तत्पश्चात् सन् 1857 ई. में ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय विद्रोह किया गया था । हिन्दी नवजागरण तथा सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के उपरान्त भारत में आए राजनीतिक, सामाजिक एवं साँस्कृतिक जागरण से है। हिन्दी नवजागरण की सबसे प्रमुख विशेषता हिन्दी प्रदेश की जनता में स्वातंत्र चेतना का जागृत होना है।यही वह काल था, जब प्रत्येक साहित्यकार देश और समाज के हित की भावना से भावित मन में ब्रिटिश शासन व्यवस्था के प्रति आक्रोश धारण किए हुए थे, वे जनता को अपने हकों के प्रति जाग्रत करना चाहते थे। नवजागरण के लिए सभी को साथ मिलाकर एक ही उद्देश्य के लिए एक ही दिशा में सोचना आवश्यक था। फलस्वरूप सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ी।
अनुवाद दृष्टि
हिन्दी नवजागरण भारतीय समाज के सांस्कृतिक , सामाजिक और साहित्यिक पुनर्जागरण का युग था, जिसमें अनुवाद ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिन्दी साहित्य लेखन की परंपरा में समाज में व्याप्त विभिन्न समस्याओं और विषयों को केन्द्र में रखकर रचनाएँ हुईं , जिनमें से कई अनुवाद के माध्यम से संभव हो सकी। नवजागरण अनुवाद के माध्यम से रचनात्मक ऊर्जा उत्पन्न कर सका। अनुवाद में संप्रेषणीयता को महत्त्वपूर्ण मानते हुए डॉ. विशोरीलाल कलावर ने लिखा है कि -, एक भाषा का दूसरी भाषा में अनुवाद करते समय उसमें निहित भावों और विचारों की व्याख्या का सम्प्रेषण महत्त्वपूर्ण हो जाता है|https://www.apnimaati.com/2024/09/blog-post_24.html हिन्दी नवजागरण के विकास में अनुवाद की भूमिका कुमारी कमलेश
हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने और लेखन को नई दिशा देने में अनुवाद ने महती भूमिका निभाई है। नवजागरण के समय में अनुवाद के माध्यम से ही एक स्वर पूरे भारत में गुंजायमान हो पाया। इसी समय में लाला सीताराम ने लॉर्ड बायरन के "द प्रिसनर ऑफ सिलान" का अनुवाद "सिलोन का कैदी" नाम से किया।https://www.apnimaati.com/2024/09/blog-post_24.htmlhttps://www.apnimaati.com/2024/09/blog-post_24.html हिन्दी नवजागरण के विकास में अनुवाद की भूमिका कुमारी कमलेशअगस्त 2026 InternetArchiveBot
लाला सीताराम ने आधुनिक हिन्दी को बनाने और आगे बढ़ाने के लिए हिन्दी में व्यापक अनुवाद कर इसकी मूलभूत नीव रखी। उन्होंने शेक्सपियर के अनेक अंग्रेजी नाटकों एवं संस्कृत के प्रसिद्ध नाटकों जैसे- रघुवंश, मृच्छकटिकम, मालविकाग्निमित्र के सरल हिन्दी अनुवाद किए। अनुवाद में योगदान के साथ ही उन्होंने इतिहास lलेखन में भी अपना योगदान दिया। अयोध्या का इतिहास, अवध की झाँकी, चित्रकूट की झाँकी उनके इतिहास लेखन के उत्कृष्ट नमूने हैं। जैसा कि हमें ज्ञात है, कि लाला सीताराम उर्दू के भी ज्ञाता थे इसलिए उन्होंने सबसे पहले शेक्सपियर के नाटको का अनुवाद उर्दू में किया था। तदुपरान्त बनारस प्रवास में वे संस्कृत नाटकों की ओर घूम गए थे। सेवानिवृत्ति के उपरान्त अपने खाली समय का सदुपयोग उन्होंने पुनः शेक्सपियर के नाटकों का अनुवाद करके किया।Lala Sitaram 'Bhoop' (Makers of Indian Literature) chaturvedi heramb बस अंतर इतना ही था कि अब अनुवाद हिन्दी भाषा में हो रहा था ।
लाला सीताराम ने शेक्सपियर के नाटकों का अनुवाद इसलिए किया, क्योंकि शेक्सपियर के नाटको में मानव जीवन की जटिलताओं, भावनाओं ,नीतियों और समाज के सभी पहलुओं का अत्यंत कलात्मक चित्रण था । साथ ही, उनके नाटकों का सबसे बड़ा गुण यह था कि वे सांस्कृतिक या भाषायी सीमाओं से परे जाकर मानवीय अनुभवों को व्यक्त करते है। जैसा कि लाला सीताराम ने अपनी भूमिका में लिखा है कि - " मन के आनंद इस प्रकार के हो कि वे हमारी सक्रियता और कार्यकुशलता को प्रेरित करें , तो वे हमारे विचारों को स्वस्थ रखने वाले होने चाहिए, भावनाओं को अति परिष्कृत न करने वाले, हृदय और कल्पना के साथ व्यावहारिक समझ को भी सक्रिय करने वाले और संकल्पों में इच्छाशक्ति को मजबूत करने वाले होने चाहिए।"https://epustakalay.com/book/28593-shakespeare-bhasha-apani-apani-ruchi-by-lala-sitaram/ शेक्सपियरभाषा सीताराम लाला
अत: यह समस्त गुण शेक्सपियर के नाटकों में विद्यमान है।
लाला सीताराम द्वारा शेक्सपियर के नाटकों का अनुवाद चुनने का कारण यह भी एक हो सकता है कि उस समय ब्रिटिश शासन था और ब्रिटिश शासन में अंग्रेजी साहित्य को श्रेष्ठ बताया जाता था । लाला सीताराम ने शेक्सपियर के नाटकों का अनुवाद इस दृष्टि से किया कि "हम भी अंग्रेजी साहित्य को अपने ढंग से पढ़ और समझ सकते हैं।" यह एक तरह का साँस्कृतिक स्वाभिमान और अपनी भाषा में विश्व साहित्य को आत्मसात करने का प्रयास था ।https://epustakalay.com/book/28593-shakespeare-bhasha-apani-apani-ruchi-by-lala-sitaram/ शेक्सपियर भाषा सीताराम लाला
लाला सीताराम अनुवाद करते समय केवल शब्दों का रूपांतरण नहीं किया बल्कि मूल कृति की भावना और उद्देश्य को हिंदी में पुनःसृजित किया। आज हम कह सकते हैं कि उन्होंने अनुवाद में भावानुवाद की प्रक्रिया अपनायी। जैसा कि उन्होंने भूमिका में लिखा है "मैं इसी सिद्धांत का पालन करूंगा कि लेखक के भाव को ध्यान में रखते हुए, उसे सरलतम भाषा में व्यक्त करते हुए और भाव - भंगिमाओं के अरुचिकर स्वरूप से बचते हुए अनुवाद करूंगा ।"https://epustakalay.com/book/28593-shakespeare-bhasha-apani-apani-ruchi-by-lala-sitaram/ लाला सीताराम
लाला सीताराम ने कालिदास के प्रसिद्ध नाटक "मालविकाग्निमित्र " का अनुवाद किया । मालविकाग्निमित्र को एकमात्र प्राचीन संस्कृत नाटक होने का श्रेय प्राप्त है, जिसकी कथा का ऐतिहासिक आधार पाया गया है। उनके इस नाटक के अनुवाद का उद्देश्य भारतीय जनता को भारत के इतिहास से परिचित कराना था। उन्होंने लिखा भी है-"यह हमें भारतीय इतिहास के सर्वाधिक समृद्ध काल के देशी दरबार का एक विशद चित्रण प्रस्तुत करता है और मुसलमानों के आक्रमण से पूर्व के हिन्दू समाज का सच्चा वर्णन है।"https://dn790002.ca.archive.org/0/items/in.ernet.dli.2015.482014/2015.482014.Malvikaginmitra-bhasha.pdf मालविकागनिमित्र भाषा सीताराम लाला
लाला सीताराम 'भूप' द्वारा संस्कृत के नाटकों का अनुवाद इस अवधारणा के साथ भी किया गया कि भारतीय नाट्य कला जो कालांतर में उपेक्षित हो गयी थी, उसको पुनर्जीवित किया जाए । यह दिखाना चाहते थे कि प्राचीन भारतीय नाटक , यूनानी नाटकों से किसी भी दृष्टि में कम नहीं है।
लाला सीताराम द्वारा कालिदास की प्रसिद्ध कृति "रघुवंश" का अनुवाद भी किया गया। इस कृति का अधिकांश यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इसका एकमात्र हिन्दी अनुवाद "राजा लक्ष्मण सिंह" द्वारा किया गया है लेकिन यह मूलतः गद्य में एक भावानुवाद हैऔर प्रत्येक श्लोक का अनुवाद मूल संस्कृत के विपरीत मुद्रित किया गया है, इसलिए स्पष्टतः इसका उद्देश्य केवल संस्कृत सीखने का प्रयास कर रहे छात्रों की सहायता करना है । इस कृति का लक्ष्मण सिंह द्वारा हिन्दी अनुवाद होने पर भी लाला सीताराम ने इसका पुन: वर्तमान हिन्दी में अनुवाद किया। वर्तमान हिन्दी से तात्पर्य फोर्ट विलियम कॉलेज के दौर में हिन्दी भाषा को परिनिष्ठित स्वरूप देने का निरन्तर प्रयास किया जा रहा था। और फोर्ट विलियम कॉलेज ने हिनी गद्य को व्यवस्थित रुप एवं हिन्दी के खड़ी बोली रूप को मानक बनाने और साहित्यिक रूप प्रदान किया। तो लाला सीताराम ने रघुवंश का हिन्दी अनुवाद इसी दायरे के अंतर्गत किया है उन्होंने रघुवंश की भूमिका में भी लिखा है कि -"मैंने इस कृति को उसके वर्तमान रूप में प्रकाशित करने का साहस किया है।"https://epustakalay.com/book/14706-raghuvansh-bhasha-by-lala-sitaram/ रघुवंशभाषा सीताराम लाला
निष्कर्ष
अतः लाला सीताराम की अनुवाद दृष्टि भारतीय अनुवाद परम्परा और पाश्चात्य साहित्यिक प्रभाव दोनों का संतुलित संगम है।उन्होंने अपने अनुवाद में शब्दश: अनुवाद न करके भावानुवाद को प्रमुखता दी है। उनका मानना था कि अनुवाद करते समय कृति के मूल भाव नहीं बदलना चाहिए। उन्होंने अपने अनुवादों में मूल रचना की आत्मा को यथावत रखते हुए, उसे लक्ष्य भाषा के अनुरूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
लाला सीताराम द्वारा शेक्सपियर और संस्कृत साहित्य के उनके अनुवादो के करने का उद्देश्य स्पष्ट झलकता है कि वे भारतीय पाठको को विश्व साहित्य से परिचित कराना एवं भारतीय भाषाओं की अभिव्यक्ति क्षमता को सिद्ध करना चाहते थे। अत : लाला सीताराम ने अपने अनुवादों के माध्यम से प्राचीन भारतीय गौरव , समृद्ध भारतीय संस्कृति एवं भारतीय सभ्यता को दिखाने का प्रयास किया।