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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

नागार्जुन (रसायनशास्त्री)

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नागार्जुन भारत के धातुकर्मी एवं रसशास्त्री (alchemist) थे। चीनी और तिब्बती साहित्य के अनुसार वे 'वैदेह देश' (विदर्भ) में जन्मे थे और पास के सतवाहन वंश द्वारा शासित क्षेत्र में चले गये थे। इसके अलावा इतिहास में महायान सम्प्रदाय के दार्शनिक नागार्जुन तथा रसशास्त्री नागार्जुन में भी भ्रम की स्थिति बनी रहती है। महाराष्ट्र के नागलवाडी ग्राम में उनकी प्रयोगशाला होने के प्रमाण मिले हैं। कुछ प्रमाणों के अनुसार वे 'अमरता' की प्राप्ति की खोज करने में लगे हुए थे और उन्हें पारा तथा लोहा के निष्कर्षण का ज्ञान था। द्वितीयक साहित्य में भी रसशास्त्री नागार्जुन के बारे में बहुत ही भ्रम की स्थिति है। पहले माना जाता था कि रसरत्नाकर नामक प्रसिद्ध रसशास्त्रीय ग्रन्थ उनकी ही रचना है किन्तु १९८४ के एक अध्ययन में पता चला कि रसरत्नाकर की पाण्डुलिपि में एक अन्य रचनाकार (नित्यानन्द सिद्ध) का नाम आया है।Wujastyk, Dominik (18 July 2013). "An Alchemical Ghost: The Rasaratnâkara by Nâgârjuna". Ambix. pp. 70–83. doi:10.1179/amb.1984.31.2.70. परिचय नागार्जुन का जन्म सन् ९३१ में गुजरात में सोमनाथ के निकट दैहक नामक किले में हुआ था। वह रसायनज्ञ आर्थत कीमियागर थे। लोग उनके बारे में ढ़ेर सारी कहानियां कहते थे। उससे उन्हें कभी व्याकुलता या परेशानी नहीं हुई थी। इस लोक-विश्वास को कि वह भगवान के संदेशवाहक हैं, रसरत्नाकर नामक पुस्तक लिख कर पुष्ट कर दिया। यह पुस्तक उनके और देवताओं के बीच बातचीत की शैली में लिखी गई थी। रसरत्नाकर में रस (पारे के यौगिक) बनाने के प्रयोग दिए गये हैं। इसमें देश में धातुकर्म और कीमियागरी के स्तर का सर्वेक्षण भी दिया गया था। इस पुस्तक में चांदी, सोना, टिन और तांबे की कच्ची धातु निकालने और उसे शुद्ध करने के तरीके भी बताये गए हैं। पारे से संजीवनी और अन्य पदार्थ बनाने के लिए नागार्जुन ने पशुओं और वनस्पति तत्वों और अम्ल और खनिजों का भी इस्तेमाल किया। हीरे, धातु और मोती घोलने के लिए उन्होंने वनस्पति से बने तेजाबों का सुझाव दिया। उसमें खट्टा दलिया, पौधे और फलों के रस थे। उन्होंने और पहले के कीमियागरों ने जिन उपकरणों का इस्तेमाल किया था उसकी सूची भी पुस्तक में दी गई है। आसवन (डिस्टीलेशन), द्रवण (लिक्वीफेक्शन), उर्ध्वपातन (सबलीमेशन) और भूनने के बारे में भी पुस्तक मे वर्णन है। पुस्तक में विस्तारपूर्ण दिया गया है कि अन्य धातुएं सोने में कैसे बदल सकती हैं। यदि सोना न भी बने रसागम विशमन द्वारा ऐसी धातुएं बनाई जा सकती हैं जिनकी पीली चमक सोने जैसी ही होती थी। हिंगुल और टिन जैसे केलमाइन से पारे जैसी वस्तु बनाने का तरीका दिया गया है। नागार्जुन ने सुश्रुत संहिता के पूरक के रूप में 'उत्तर तन्त्र' नामक पुस्तक भी लिखी। इसमें दवाइयां बनाने के तरीके दिये गये हैं। आयुर्वेद की एक पुस्तक `आरोग्यमञ्जरी' भी लिखी। उनकी अन्य पुस्तकें है- कक्षपूत तन्त्र, योगसर और योगाष्टक। कृतियाँ निम्नलिखित पाण्डुलिपियाँ किसी 'नागार्जुन' द्वारा रचित होना बतायी जाती हैं- जीवसूत्रMeulenbeld, Gerrit Jan (1999). A history of Indian medical literature https://web.archive.org/web/20180917105155/http://www.worldcat.org/title/history-of-indian-medical-literature/oclc/42207455%26referer%3Dbrief_results 17 सितंबर 2018 . IIA. Groningen: E. Forsten. p. 135. ISBN 9069801248. रसवैशेषिकसूत्रMeulenbeld, Gerrit Jan (1999). A history of Indian medical literature https://web.archive.org/web/20180917105155/http://www.worldcat.org/title/history-of-indian-medical-literature/oclc/42207455%26referer%3Dbrief_results 17 सितंबर 2018 . IIA. Groningen: E. Forsten. p. 136. ISBN 9069801248. योगशतकMeulenbeld, Gerrit Jan (1999). A history of Indian medical literature https://web.archive.org/web/20180917105155/http://www.worldcat.org/title/history-of-indian-medical-literature/oclc/42207455%26referer%3Dbrief_results 17 सितंबर 2018 . IIA. Groningen: E. Forsten. p. 1395. ISBN 9069801248. कक्षपुटMeulenbeld, Gerrit Jan (1999). A history of Indian medical literature https://web.archive.org/web/20180917105155/http://www.worldcat.org/title/history-of-indian-medical-literature/oclc/42207455%26referer%3Dbrief_results 17 सितंबर 2018 . IIA. Groningen: E. Forsten. p. 192. ISBN 9069801248. योगरत्नमालाMeulenbeld, Gerrit Jan (1999). A history of Indian medical literature https://web.archive.org/web/20180917105155/http://www.worldcat.org/title/history-of-indian-medical-literature/oclc/42207455%26referer%3Dbrief_results 17 सितंबर 2018 . IIA. Groningen: E. Forsten. p. 193. ISBN 9069801248. यद्यपि 'रसरत्नाकर' नामक ग्रन्थ का रचयिता रसायनशास्त्री नागार्जुन को ही माना जाता रहा है किन्तु १९८४ में पाण्डुलिपियों एवं प्रिन्ट सामग्री के अध्ययन से यह बात सामने आयी कि रसरत्नाकर की पाण्डुलिपि में किसी नित्यनाथ सिद्ध का नाम बार-बार उसके रचनाकार के रूप में आया है। Wujastyk, Dominik (18 July 2013). "An Alchemical Ghost: The Rasaratnâkara by Nâgârjuna". Ambix. pp. 70–83. doi:10.1179/amb.1984.31.2.70. सन्दर्भ इन्हें भी देखें नागार्जुन (प्राचीन दार्शनिक) नागार्जुन (हिन्दी कवि) रसविद्या बाहरी कड़ियाँ महान वैज्ञानिक नागार्जुन भारत और वैदिक विज्ञानः कहानी, धातु को सोने में बदलने वाले प्राचीन भारतीय रसायन शास्त्री नागार्जुन की श्रेणी:किमियागार श्रेणी:महासिद्ध श्रेणी:बौद्ध योगी