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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

उदात्त

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वैदिक स्वर-चिह्न 'उदात्त' , अनुदात्त आदि के लिये वैदिक स्वराघात पर जाँय। thumb | right | <small>(1817) हैंबरगर कुंस्थाले में कैस्पर डेविड फ्रेडरिक का,""भटकैया कोहरे के सागर से ऊपर"" १९वीं ​​सदी का रोमांटिक कलाकार उदात्त की अभिव्यक्ति के रूप में प्रकृति की भव्यता का उपयोग करता है उदात्त (Sublime) काव्याभिव्यंजना के वैशिष्ट्य एवं उत्कर्ष का कारणतत्व है जिसका प्रतिपादन लोंगिनुस (लांजाइनस) ने अपनी कृति "पेरिइप्सुस" (काव्य में उदात्त तत्व) में किया है। इसके अनुसार उदात्त तत्त्व शैली की वह महत्वपूर्ण एंव महत्तम विशेषता है जो विभिन्न व्यंजनाओं के माध्यम से किसी घटना अथवा व्यक्तित्व के रोमांटिक, आवेशपूर्ण तथा भयंकर पक्ष की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त होती है। सच्चे औदात्य के स्पर्श मात्र से मानवात्मा सहज ही उत्कर्ष को प्राप्त हो जाती है, सामान्य धरातल से ऊपर उठकर आनंद और उल्लास से आप्लावित होने लगती है और श्रोता अथवा पाठक को महसूस होने लगता है कि जो कुछ उसने श्रवण किया या पढ़ा है, वह स्वयं उसका अपना भोगा हुआ है। इसके विपरीत किसी कृति को बार-बार पढ़ने या सुनने के बाद भी यदि व्यक्ति की आत्मा उन्नत विचारों की ओर प्रवृत्त नहीं होती तो स्पष्ट ही उक्त कृति में प्रतीयमान अर्थ से अधिक विचारोत्तेजक सामग्री का अभाव रहता है और उसे उदात्त-तत्व-समन्वित नहीं माना जा सकता। उदात्त-गुण-युक्त कृति न केवल सभी को सर्वदा आनंदित करती है, अपितु विसंवादी तत्वों के संयोग से एक ऐसे वातावरण का निर्माण भी करती है कि उसके प्रति पाठक अथवा श्रोता की आस्था और भी गहरी एवं अमिट हो जाती है। परिचय पाश्चात्य साहित्यशास्त्र में उदात्त (हिंदी में अंग्रेजी शब्द "सब्लाइम' का रूपांतर) पर एक लंबे समय से विचार होता चला आ रहा है। लोंगिनुस से पूर्व अरस्तू ने अपने "विरेचन सिद्धांत' की व्याख्या में उदात्त का विरेचन प्रक्रिया के सर्वाधिक सहायक तत्त्व के रूप में उल्लेख किया है। इसके पश्चात्‌ रोबोरतेलो, ब्वायलो, हीगेल, कांट, ब्रैडले, कैरेट, ब्रुक, वाल्टर पेटर, सांतायना, बर्क, बोसाँके, जुंग आदि पाश्चात्य कलासमीक्षकों ने इस विषय का विस्तृत विवेचन किया है। लोंगिनुस के अनुसार उदात्त आलंबन के गुण हैं : जीवन्त आवेग, प्रचुरता, तत्परता, जहाँ उपयुक्त हो वहाँ गति तथा ऐसी शक्ति एवं वेग जिसकी समता संभव न हो। उदात्त की अनुभूति के अंतस्तत्व मन की ऊर्जा, उल्लास, अभिभूति (संपूर्ण चेतना के अभिभूत हो जाने की अनुभूति), आदर तथा विस्मयमिश्रित संभ्रम बताए गए हैं। लोंगिनुस ने उदात्त भाषा के पाँच मुख्य स्रोतों का भी उल्लेख किया है : (१) महान्‌ विचारोद्भावना की क्षमता, (२) उद्दाम और प्रेरणाप्रसूत आवेग, (३) समुचित अलंकारयोजना, (४) साधु भाषा तथा (५) गरिमामय रचनाविधान। इनमें प्रथम दो अधिकांश में नैसर्गिक अथवा अंतरंग हैं और शेष तीन को अंशत: कला से संबंधित माना गया है। वक्तृत्वशक्ति को उक्त पाँच भेदों के तल में नींव के समान बताया गया है। कांट के अनुसार भार, संकोच, स्फूर्ति, एवं अंतर्बोध उदात्त के मूल तत्त्व हैं और इनमें भी आध्यात्मिक स्तर को प्राप्त ही इसका संपूर्ण सार है, जो कलाबोध को सुखकर बनाकर न केवल तृप्ति प्रदान करती है अपितु उदात्तानुभूति के स्तर तक भी ले जाती है। परंतु कांट का मत कला के उतना निकट नहीं है जितना अध्यात्म के। कारण, कलानुभूतिजन्य उदात्त वृत्तियों को मात्र आध्यात्मिक नहीं माना जा सकता। ब्रैडले ने उदात्त के अंतर्गत भय, रोमांच, अंतश्चमत्कार तथा आंतरिक आह्लादपूर्ण वृत्तियों को प्रमुख माना है। उसके अनुसार उदात्त कलाबोध के समस्त विस्तार का द्योतक होता है। अपने कथन को सुस्पष्ट करने के लिए उन्होंने कलाबोध के पाँच स्तर माने हैं - उदात्त (सब्लाइम), भव्य (ग्रैंड), सुंदर (ब्यूटीफुल), ललित (ग्रेसफुल) तथा चारु (प्रेटी)। इनमें सुंदर को मध्यमान मानकर उन्होंने उससे उत्कृष्ट भावोद्रेकों को क्रमश: भव्य तथा उदात्त की संज्ञा दी है। और निम्नतर भावबोधों को क्रमश: ललित तथा चारु कहा है। अर्थात्‌ ब्रैडले के अनुसार कलाबोध का उच्चतम गुण उदात्त है और चारु निम्नतम। उदात्त के संबंध में जुंग का कथन भी काफी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा है, "ससीम-बंधन-ग्रस्त मानव व्यक्तित्व में असीम और अनंत तत्त्व के उदय से अनंत वेदना तथा आनंद का सामयिक अनुभव होता है। यही अनुभव उदात्त का अनुभव है। इन्हें भी देखें लोंजाइनस विरेचन (काव्यशास्त्र) (Catharsis) बाहरी कड़ियाँ लौंजाइनस का औदात्य सिद्धांत (काव्य में उदात्त तत्त्व) उदात्त के विषय में (गूगल पुस्तक ; लेखिका - निर्मला जैन) Friedrich Schiller, On the Sublime श्रेणी:विचारधाराएँ श्रेणी:सौन्दर्यशास्त्र