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वन्दे मातरम्
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right | thumb |150px| वन्दे मातरम् के रचयिता बंकिमचन्द्र चटर्जी
thumb|वन्दे मातरम् , पण्डित विश्व मोहन भट्ट जी की मोहन वीणा पर
thumb|right|200px|अवनीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा बनाया गया भारतमाता का चित्र
वन्दे मातरम् (बाँग्ला: বন্দে মাতরম)http://india.gov.in/knowindia/national_song.php National Symbols of India publisher 29 अप्रैल 2008 https://web.archive.org/web/20080323163528/http://india.gov.in/knowindia/national_song.php 23 मार्च 2008 live बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा संस्कृत और बाँग्ला मिश्रित भाषा में रचित एक गीत है जिसका प्रकाशन सन् १८८२ में उनके उपन्यास आनन्द मठ में अन्तर्निहित गीत के रूप में हुआ था।http://www.mustrad.org.uk/articles/mataram.htm Vande Mataram 8 अप्रैल 2009 https://web.archive.org/web/20060829065309/http://www.mustrad.org.uk/articles/mataram.htm 29 अगस्त 2006 dead इस गीत से सदियों से सुप्त भारत देश जग उठा और आधी शताब्दी तक यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरक बना रहा।
इस उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम के संन्यासी द्वारा गाया गया है। इसकी धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने बनायी थी। इस गीत को गाने में ६५ सेकेंड (१ मिनट और ५ सेकेंड) का समय लगता है।
सन् २००३ में, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अन्तरराष्ट्रीय सर्वेक्षण में, जिसमें उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों का चयन करने के लिये दुनिया भर से लगभग ७,००० गीतों को चुना गया था और बी०बी०सी० के अनुसार १५५ देशों/द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था उसमें वन्दे मातरम् शीर्ष के १० गीतों में दूसरे स्थान पर था।The Worlds Top Ten https://web.archive.org/web/20060821022652/http://www.bbc.co.uk/worldservice/us/features/topten/profiles/index.shtml 21 अगस्त 2006 — BBC World Service
वन्दे मातरम् गीत
भारतीय संविधान के पृष्ठ १६७ पर व्यौहार राममनोहर सिंह द्वारा चित्रित वन्दे–मातरम् (सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलाम् मातरम्) लिखा गया था। यदि बाँग्ला भाषा को ध्यान में रखा जाय तो इसका शीर्षक "बन्दे मातरम्" होना चाहिये "वन्दे मातरम्" नहीं। चूँकि हिन्दी व संस्कृत भाषा में 'वन्दे' शब्द ही सही है, लेकिन यह गीत मूलरूप में बाँग्ला लिपि में लिखा गया था और चूँकि बाँग्ला लिपि में व अक्षर है ही नहीं अत: बन्दे मातरम् शीर्षक से ही बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने इसे लिखा था। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शीर्षक 'बन्दे मातरम्' होना चाहिये था। परन्तु संस्कृत में 'बन्दे मातरम्' का कोई शब्दार्थ नहीं है तथा "वन्दे मातरम्" उच्चारण करने से "माता की वन्दना करता हूँ" ऐसा अर्थ निकलता है, अतः देवनागरी लिपि में इसे वन्दे मातरम् ही लिखना व पढ़ना समीचीन होगा।
बांग्ला लिपिदेवनागरी लिपि भावार्थbn বন্দে মাতরম্৷
সুজলাং সুফলাং
মলয়জশীতলাম্
শস্যশ্যামলাং
মাতরম্!
শুভ্র-জ্যোত্স্না-পুলকিত-যামিনীম্
ফুল্লকুসুমিত-দ্রুমদলশোভিনীম্,
সুহাসিনীং সুমধুরভাষিণীম্
সুখদাং বরদাং মাতরম্৷৷
সপ্তকোটীকন্ঠ-কল-কল-নিনাদকরালে,
দ্বিসপ্তকোটীভুজৈধৃতখরকরবালে,
অবলা কেন মা এত বলে!
বহুবলধারিণীং
নমামি তরিণীং
রিপুদলবারিণীং
মাতরম্৷
তুমি বিদ্যা তুমি ধর্ম্ম
তুমি হৃদি তুমি মর্ম্ম
ত্বং হি প্রাণাঃ শরীরে৷
বাহুতে তুমি মা শক্তি,
হৃদয়ে তুমি মা ভক্তি,
তোমারই প্রতিমা গড়ি মন্দিরে মন্দিরে৷
ত্বং হি দুর্গা দশপ্রহরণধারিণী
কমলা কমল-দলবিহারিণী
বাণী বিদ্যাদায়িণী
নমামি ত্বাং
নমামি কমলাম্
অমলাং অতুলাম্,
সুজলাং সুফলাং
মাতরম্
বন্দে মাতরম্
শ্যামলাং সরলাং
সুস্মিতাং ভূষিতাম্
ধরণীং ভরণীম্
মাতরম্৷वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलाम्
मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलाम्
मातरम्।
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्॥१॥
सप्तकोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
द्विसप्तकोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले।
बहुबलधारिणीं
नमामि तारिणीं
रिपुदलवारिणीं
मातरम् ॥२॥
तुमि विद्या, तुमि धर्म
तुमि हृदि, तुमि मर्म
त्वम् हि प्राणा: शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गडी मन्दिरे-मन्दिरे ॥३॥
त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायिनी,
नमामि त्वाम्
नमामि कमलाम्
अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलाम्
मातरम् ॥४॥
वन्दे मातरम्
श्यामलाम् सरलाम्
सुस्मिताम् भूषिताम्
धरणीं भरणीं
मातरम् ॥५॥हे माते, मैं तुम्हें वन्दन करता हूँ ।वन्दे मातरम्…मई 2026 InternetArchiveBot
जलसमृद्ध तथा धनधान्य से समृद्ध दक्षिण के मलय पर्वत के ऊपर से आने वाली वायु की लहरों से शीतल होने वाली तथा विपुल खेती के कारण श्यामलवर्ण बनी हुई, हे माता !
चमकती चांदनियों के कारण यहां पर रातें उत्साह भरी होती हैं, फूलों से भरे हुए पौधों के कारण यह भूमि वस्त्र परिधान किए समान शोभनीय प्रतीत होती है । हे माता, आप निरंतर प्रसन्न रहने वाली तथा मधुर बोलने वाली, वरदायिनी, सुखप्रदायिनी हैं !१!
तीस करोड़ मुखों से निकल रही भयानक गर्जनाएं तथा साठ करोड़ चमकदार तलवारें से युक्त हाथों से युक्त, हे माते आपको अबला कहने की धृष्टता कौन करेगा ? वास्तव में माते, आपमें सामर्थ्य है। शत्रु की सेना के आक्रमणों का मुंह-तोड़ जवाब देकर हम संतानों का रक्षण करनेवाली हे माता, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।२।
आपसे ही हमारा ज्ञान, चरित्र तथा धर्म है । आप ही हमारा हृदय तथा चैतन्य हैं । हमारे प्राणों में भी आप ही हैं । हमारी कलाईयों में (मुठ्ठी में) शक्ति तथा अंतःकरण में काली माता भी आप ही हैं । मंदिरों में हम जिन मूर्तियों की प्रतिष्ठापना करते हैं, वे सभी आपके ही रूप हैं ।३।
अपने दस हाथों में दस शस्त्र धारण करनेवाली शत्रुसंहारिणी दुर्गा भी आप तथा कमलपुष्पों से भरे सरोवर में विहार करने वाली कमलकोमल लक्ष्मी भी आप ही हैं । विद्यादायिनी सरस्वती भी आपही हैं । आपको हमारा प्रणाम है । माते, मैं आपको वंदन करता हूँ। ऐश्वर्यदायिनी, पुण्यप्रद तथा पावन, पवित्र जलप्रवाहों से तथा अमृतमय फलों से समृद्ध माता आपकी महानता अतुलनीय है, उकी कोई सीमा ही नहीं हैं । हे माते, हे जननी हमारा तुम्हें प्रणाम है ।४।
माते, आपका वर्ण श्यामल है । आपका चरित्र पावन है । आपका मुख सुंदर हंसी से विलसित है । सर्वाभरणभूषित होने के कारण आप कितनी सुंदर लगती हैं ! सच में, हमें धारण करनेवाली तथा हमें संभालने वाली भी आप ही हैं । हे माते, हमारा आपके चरणों में पुनश्च प्रणिपात ।५।
हिन्दी अनुवाद
आनन्दमठ के हिन्दी, मराठी, तमिल, तेलुगु, कन्नड आदि अनेक भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेजी-अनुवाद भी प्रकाशित हुए। डॉ॰ नरेशचन्द्र सेनगुप्त ने सन् १९०६ में Abbey of Bliss के नाम से इसका अंग्रेजी-अनुवाद प्रकाशित किया। अरविन्द घोष ने 'आनन्दमठ' में वर्णित गीत 'वन्दे मातरम्' का अंग्रेजी गद्य और पद्य में अनुवाद किया। महर्षि अरविन्द द्वारा किए गये अंग्रेजी गद्य-अनुवाद का हिन्दी-अनुवाद इस प्रकार है:
मैं आपके सामने नतमस्तक होता हूँ। ओ माता!
पानी से सींची, फलों से भरी,
दक्षिण की वायु के साथ शान्त,
कटाई की फसलों के साथ गहरी,
माता!
उसकी रातें चाँदनी की गरिमा में प्रफुल्लित हो रही हैं,
उसकी जमीन खिलते फूलों वाले वृक्षों से बहुत सुन्दर ढकी हुई है,
हँसी की मिठास, वाणी की मिठास,
माता! वरदान देने वाली, आनन्द देने वाली।
रचना की पृष्ठभूमि
सन् १८७०-८० के दशक में ब्रिटिश शासकों ने सरकारी समारोहों में ‘गॉड! सेव द क्वीन’ गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेजों के इस आदेश से बंकिमचन्द्र चटर्जी को, जो उन दिनों एक सरकारी अधिकारी (डिप्टी कलेक्टर) थे, बहुत ठेस पहुँची और उन्होंने सम्भवत: १८७६ में इसके विकल्प के तौर पर संस्कृत और बाँग्ला के मिश्रण से एक नये गीत की रचना की और उसका शीर्षक दिया - ‘वन्दे मातरम्’। शुरुआत में इसके केवल दो ही पद रचे गये थे जो संस्कृत में थे।
इन दोनों पदों में केवल मातृभूमि की वन्दना थी। उन्होंने १८८२ में जब आनन्द मठ नामक बाँग्ला उपन्यास लिखा तब मातृभूमि के प्रेम से ओतप्रोत इस गीत को भी उसमें शामिल कर लिया। यह उपन्यास अंग्रेजी शासन, जमींदारों के शोषण व प्राकृतिक प्रकोप (अकाल) में मर रही जनता को जागृत करने
हेतु अचानक उठ खड़े हुए संन्यासी विद्रोह पर आधारित था। इस तथ्यात्मक इतिहास का उल्लेख बंकिम बाबू ने 'आनन्द मठ' के तीसरे संस्करण में स्वयं ही कर दिया था। और मजे की बात यह है कि सारे तथ्य भी उन्होंने अंग्रेजी विद्वानों-ग्लेग व हण्टर बंकिम समग्र हिन्दी प्रचारक संस्थान वाराणसी पृष्ठ ९९१ की पुस्तकों से दिये थे। उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम का एक संन्यासी विद्रोही गाता है। गीत का मुखड़ा विशुद्ध संस्कृत में इस प्रकार है: "वन्दे मातरम् ! सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्, शस्य श्यामलाम् मातरम्।" मुखड़े के बाद वाला पद भी संस्कृत में ही है: "शुभ्र ज्योत्स्नां पुलकित यमिनीम्, फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम् ; सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्, सुखदां वरदां मातरम्।" किन्तु उपन्यास में इस गीत के आगे जो पद लिखे गये थे वे उपन्यास की मूल भाषा अर्थात् बाँग्ला में ही थे। बाद वाले इन सभी पदों में मातृभूमि की दुर्गा के रूप में स्तुति की गई है। यह गीत रविवार, कार्तिक सुदी नवमी, शके १७९७ (७ नवम्बर १८७५) को पूरा हुआ।कहा जाता है कि यह गीत उन्होंने सियालदह से नैहाटी आते वक्त ट्रेन में ही लिखी थी।
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भूमिका
right|thumb|300px|सन् १९०७ में भीखाजी कामा द्वारा फहराया गया ध्वज
right|thumb|250px|१९०९ में प्रकाशित 'विजया' नामक तमिल पत्रिका का मुखपृष्ठ
thumb|right|200px|पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' कृत क्रान्ति गीतांजलिक्रान्ति गीतांजलि पृष्ठ 11 में वन्दे मातरम् का मूल पाठ मातृ-वन्दना|कड़ी=Special:FilePath/Kranti_Geetanjali_2793.JPG
१८८६ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के द्वितीय वर्ष में ही कोलकाता अधिवेशन के मंच से कविवर हेमचन्द्र द्वारा वन्दे मातरम के कुछ अंश मंच से गाये गए थे। १८९६ में कांग्रेस के १२वें अधिवेशन में रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने इसे गाया था। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक को वन्दे मातरम् में इतनी श्रद्धा थी कि शिवाजी की समाधि के तोरण पर उन्होंने इसे उत्कीर्ण करवाया था। सन् १९०१ में कलकत्ता में हुए एक अन्य अधिवेशन में श्री चरणदास ने यह गीत पुनः गाया। १९०१ के बाद से कांग्रेस के प्रत्येक अधिवेशन में वन्दे मातरम् गाया जाने लगा। सन् १९०५ के बनारस अधिवेशन में इस गीत को सरला देवी चौधरानी ने स्वर दिया। ६ अगस्त १९०५ को बंग भंग के विरोध में टाउन हॉल की सभा में करीब तीस हज़ार भारतीयों ने इस गीत को एक साथ गाया। यहाँ तक की बंग भंग के बाद 'वन्दे मातरम संप्रदाय' की स्थापना भी हो गई थी।
ब्रिटिश सरकार इसकी लोकप्रियता से भयाक्रान्त हो उठी और उसने इस पर प्रतिबन्ध लगाने पर विचार करना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, इस गीत के विरुद्ध अंग्रेज सरकार दुष्प्रचार करने लगी और तरह-तरह से भ्रम फैलाने लगी। पिअरसन ने तो यहाँ तक लिख दिया की मातृभूमि की कल्पना ही हिन्दू विचारधारा के प्रतिकूल हैं और बंकिम महोदय ने इसे यूरोपियन संस्कृति से प्राप्त किया है। जबकि सच्चाई यह है कि भारत के लोग अनादि काल से धरती को माता कहते आये हैं (माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः / भूमि मेरी माता हैं और मैं उसका पुत्र हूँ। – अथर्ववेद १२-१-१५)। ईसाई मिशनरियों ने तो यहाँ तक कह डाला की वन्दे मातरम् राजनैतिक डकैतों का गीत है। १४ अप्रैल १९०६ के दिन बरिशाल में कांग्रेस के जुलुस में वन्दे मातरम का नारा लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। शांतिपूर्वक निकल रहे जुलुस पर पुलिस ने निर्दयतापूर्वक लाठीचार्ज किया।
कांग्रेस-अधिवेशनों के अलावा आजादी के आन्दोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफी उदाहरण मौजूद हैं। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस 'जर्नल' का प्रकाशन शुरू किया था उसका नाम वन्दे मातरम् रखा। अंग्रेजों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़नेवाली आजादी की दीवानी मातंगिनी हाजरा की जिह्वा पर आखिरी शब्द "वन्दे मातरम्" ही थे। सन् १९०७ में मैडम भीखाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया तो उसके मध्य में "वन्दे मातरम्" ही लिखा हुआ था। आर्य प्रिन्टिंग प्रेस, लाहौर तथा भारतीय प्रेस, देहरादून से सन् १९२९ में प्रकाशित काकोरी के शहीद पं० राम प्रसाद 'बिस्मिल' की प्रतिबन्धित पुस्तक "क्रान्ति गीतांजलि" में पहला गीत "मातृ-वन्दना" वन्दे मातरम् ही था जिसमें उन्होंने केवल इस गीत के दो ही पद दिये थे और उसके बाद इस गीत की प्रशस्ति में वन्दे मातरम् शीर्षक से एक स्वरचित उर्दू गजल दी थी जो उस कालखण्ड के असंख्य अनाम हुतात्माओं की आवाज को अभिव्यक्ति देती है। ब्रिटिश काल में प्रतिबन्धित यह पुस्तक अब सुसम्पादित होकर पुस्तकालयों में उपलब्ध है।
राजनीतिक नारे के तौर पर वंदे मातरम का सबसे पहले इस्तेमाल 7 अगस्त 1905 को हुआ था, जब सभी समुदाय के हजारों छात्रों ने कलकता (कोलकाता) में टाउन हॉल की तरफ जुलूस निकालते हुए वंदे मातरम और दूसरे नारों से आसमान गूंजा दिया था । वहां एक बड़ी ऐतिहासिक सभा में, विदेशी सामानों के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने के प्रसिद्ध प्रस्ताव को पास किया गया, जिसने बंगाल के बंटवारे के खिलाफ आंदोलन का संकेत दिया। इसके बाद बंगाल में जो घटनाएं हुईं, उन्होंने पूरे देश में जोश भर दिया।अब क्यों राजनीति के केंद्र में आया वंदे मातरम् ; क्या है विवाद
अक्तूबर 1905 में, उत्तरी कलकत्ता में मातृभूमि को एक मिशन और धार्मिक जुनून के तौर पर बढ़ावा देने के लिए एक 'बंदे मातरम संप्रदाय' की स्थापना की गई थी। इस संप्रदाय के सदस्य हर रविवार को वंदे मातरम गाते हुए प्रभात फेरियां निकालते थे और मातृभूमि के समर्थन में लोगों से स्वैच्छिक दान भी लेते थे। इस संप्रदाय की प्रभात फेरियों में कभी-कभी रवींद्रनाथ टैगोर भी शामिल होते थे।
नवंबर 1905 में, बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के 200 छात्रों में से हर एक पर 5-5 रुपये का जुर्माना लगाया गया, क्योंकि वे वंदे मातरम गाने के दोषी थे। रंगपुर में, बंटवारे का विरोध करने वाले जाने-माने नेताओं को स्पेशल कांस्टेबल के तौर पर काम करने और वंदे मातरम गाने से रोकने का निर्देश दिया गया।
अप्रैल 1906 में, नए बने पूर्वी बंगाल प्रांत के बारीसाल में बंगाल प्रांतीय सम्मेलन के दौरान, ब्रिटिश हुक्मरानों ने वंदे मातरम के सार्वजनिक नारे लगाने पर रोक लगा दी और आखिरकार सम्मेलन पर ही रोक लगा दी। आदेश की अवहेलना करते हुए, प्रतिनिधियों ने नारा लगाना जारी रखा और उन्हें पुलिस के भारी दमन का सामना करना पड़ा।
20 मई 1906 को, बारीसाल (जो अब बांग्लादेश में है) में एक अभूतपूर्व वंदे मातरम जुलूस निकाला गया, जिसमें 10 हजार से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। हिंदू और मुसलमान दोनों ही शहर की मुख्य सड़कों पर वंदे मातरम के झंडे लेकर मार्च कर रहे थे।
मई 1907 में, लाहौर में, युवा प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने औपनिवेशिक आदेशों की अवहेलना करते हुए जुलूस निकाला और रावलपिंडी में स्वदेशी नेताओं की गिरफ्तारी की निंदा करने के लिए वंदे मातरम का नारा लगाया। इस प्रदर्शन को पुलिस के क्रूर दमन का सामना करना पड़ा, फिर भी युवाओं द्वारा निडरता से नारे लगाना देश भर में फैल रही प्रतिरोध की बढ़ती भावना को दर्शाता है।
27 फरवरी 1908 को, तूतीकोरिन (तमिलनाडु) में कोरल मिल्स के लगभग हजार मजदूर स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी के साथ एकजुटता दिखाते हुए और अधिकारियों की दमनकारी कार्रवाइयों के खिलाफ हड़ताल पर चले गए। वे देर रात तक सड़कों पर मार्च करते रहे, विरोध और देशभक्ति के प्रतीक के तौर पर वंदे मातरम के नारे लगाते रहे।
जून 1908 में लोकमान्य तिलक के मुकदमे की सुनवाई के दौरान हजारों लोग बॉम्बे पुलिस कोर्ट के बाहर जमा हुए और वंदे मातरम का गान करते हुए एकजुटता प्रदर्शित की। बाद में 21 जून 1914 को तिलक के रिहा होने पर पुणे में उनका जोरदार स्वागत हुआ, और उनके स्थान ग्रहन करने के काफी देर बाद तक भीड़ वंदे मातरम के नारे लगाती रही।
1908 में, बेलगाम (कर्नाटक) में जिस दिन लोकमान्य तिलक को बर्मा के मांडले भेजा जा रहा था, वंदे मातरम गाने के खिलाफ एक मौखिक आदेश के बावजूद ऐसा करने के लिए पुलिस ने कई लड़कों को पीटा और कई लोगों को गिरफ्तार किया।
विदेशों में भारतीय क्रांतिकारियों पर प्रभावभारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगाँठ
वर्ष 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने बर्लिन के स्टटगार्ट में भारत के बाहर पहली बार तिरंगा झंडा फहराया। इस झंडे पर वंदे मातरम् लिखा था। अगस्त 1909 में जब मदन लाल ढींगरा को इंग्लैंड में फाँसी दी गई, तो फाँसी पर चढ़ने से पहले उनके आखिरी शब्द थे "बंदे मातरम्।" वर्ष 1909 में पेरिस में रहने वाले भारतीय देशभक्तों ने जिनेवा से 'बंदे मातरम्' नामक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। अक्तूबर 1912 में गोपाल कृष्ण गोखले का केप टाउन में “वंदे मातरम्” के नारे के साथ एक भव्य जुलूस के साथ स्वागत किया गया।
15 अगस्त, 1947 को जब भारत स्वतन्त्र हुआ, तब प्रसिद्ध गायक पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने आकाशवाणी से ‘वंदे मातरम्’ गया था।
८ अगस्त २०२५ को वन्दे मातरम् की १५०वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में भारत के संसद में वन्दे मातरम् पर दस घंटे की एक विशेष चर्चा हुई।
राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकृति
स्वाधीनता संग्राम में इस गीत की निर्णायक भागीदारी के बावजूद जब राष्ट्रगान के चयन की बात आयी तो वन्दे मातरम् के स्थान पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखे व गाये गये गीत जन गण मन को वरीयता दी गयी। इसकी वजह यही थी कि कुछ मुसलमानों को "वन्दे मातरम्" गाने पर आपत्ति थी, क्योंकि इस गीत में देवी दुर्गा को राष्ट्र के रूप में देखा गया है। इसके अलावा उनका यह भी मानना था कि यह गीत जिस आनन्द मठ उपन्यास से लिया गया है वह मुसलमानों के खिलाफ लिखा गया है। इन आपत्तियों के मद्देनजर सन् १९३७ में कांग्रेस ने इस विवाद पर गहरा चिन्तन किया। जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित समिति जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे, ने पाया कि इस गीत के शुरूआती दो पद तो मातृभूमि की प्रशंसा में कहे गये हैं, लेकिन बाद के पदों में हिन्दू देवी-देवताओं का जिक्र होने लगता है; इसलिये यह निर्णय लिया गया कि इस गीत के शुरुआती दो पदों को ही राष्ट्र-गीत के रूप में प्रयुक्त किया जायेगा। इस तरह गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर के जन-गण-मन अधिनायक जय हे को यथावत राष्ट्रगान ही रहने दिया गया और मोहम्मद इकबाल के कौमी तराने सारे जहाँ से अच्छा के साथ बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित प्रारम्भिक दो पदों का गीत वन्दे मातरम् राष्ट्रगीत स्वीकृत हुआ।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में २४ जनवरी १९५० में 'वन्दे मातरम्' को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने सम्बन्धी वक्तव्य पढ़ा जिसे स्वीकार कर लिया गया।
डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद का संविधान सभा को दिया गया वक्तव्य इस प्रकार है) http://www.teluguone.com/managurinchi/myindia/index.jsp?filename=vandematharam.htm My India My People 17 मई 2007 एचटीएम तेलुगूवनडॉट कॉम अंग्रेज़ी https://web.archive.org/web/20070927100653/http://www.teluguone.com/managurinchi/myindia/index.jsp?filename=vandematharam.htm 27 सितंबर 2007 dead :
शब्दों व संगीत की वह रचना जिसे जन गण मन से सम्बोधित किया जाता है, भारत का राष्ट्रगान है; बदलाव के ऐसे विषय, अवसर आने पर सरकार अधिकृत करे और वन्दे मातरम् गान, जिसने कि भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभायी है; को जन गण मन के समकक्ष सम्मान व पद मिले। (हर्षध्वनि)। मैं आशा करता हूँ कि यह सदस्यों को सन्तुष्ट करेगा। (भारतीय संविधान परिषद, द्वादश खण्ड, २४-१-१९५०)
विवाद
आनन्द मठ उपन्यास को लेकर भी कुछ विवाद हैं। 1930 के दशक में जब मोहम्मद अली जिन्ना की मजहब आधारित राजनीति उभार पर थी, तब वंदे मातरम् का विरोध शुरू हो गया। कुछ लोग, मुख्यतः विभाजनकारी राजनीति से प्रेरित लोग, इसे मुस्लिम विरोधी मानते हैं। उनका कहना है कि इसमें मुसलमानों को विदेशी और देशद्रोही बताया गया है।http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2006/09/060904_spl_vande_sunil.shtml संग्रहीत प्रति 4 जनवरी 2007 https://web.archive.org/web/20090704123652/http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2006/09/060904_spl_vande_sunil.shtml 4 जुलाई 2009 live वन्दे मातरम् गाने पर भी विवाद किया जा रहा है। लोगों का कहना है कि-
इस्लाम किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करने को मना करता है और इस गीत में भारत की माँ के रूप में वन्दना की गयी है;
यह ऐसे उपन्यास से लिया गया है जो कि मुस्लिम विरोधी है।
वन्दे मातरम् की १५०वीं जयन्ती
26 अक्टूबर को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘वंदेमातरम्’ गीत के इतिहास की देशवासियों को फिर से याद दिलाई और राष्ट्रीय गीत ‘वंदेमातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 7 नवंबर से भारत सरकार की ओर से अगले एक वर्ष तक अलग-अलग कार्यक्रमों का आयोजन करने का निर्णय लिया। इन आयोजनों के माध्यम से देश भर में ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण गान होगा, जिससे देश की युवा पीढ़ी ‘सांस्कृतिकराष्ट्रवाद’ के विचार को आत्मसात कर पाए।वंदे मातरम के 150 साल
८ दिसम्बर को भारत की संसद में वन्दे मातरम् पर १० घंटे की एक चर्चा हुई जिसमें प्रधानमन्त्री एवं अन्य सदस्यों ने भाग लिया। ९ दिसम्बर को राज्यसभा में इसी पर चर्चा होगी।
विविध
क्या किसी को कोई गीत गाने के लिये मजबूर किया जा सकता है अथवा नहीं? यह प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बिजोय एम्मानुएल वर्सेस केरल राज्य के एक वाद में उठाया गया। इस वाद में कुछ विद्यार्थियों को स्कूल से इसलिये निकाल दिया गया था क्योंकि उन्होने राष्ट्र-गान जन गण मन को गाने से मना कर दिया था। यह विद्यार्थी स्कूल में राष्ट्रगान के समय इसके सम्मान में खड़े होते थे तथा इसका सम्मान करते थे पर गीत को गाते नहीं थे। गाने के लिये उन्होंने मना कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली और स्कूल को उन्हें वापस लेने को कहा। सर्वोच्च न्यायालय का कहना था कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का सम्मान तो करता है पर उसे गाता नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इसका अपमान कर रहा है। अतः इसे न गाने के लिये उस व्यक्ति को दण्डित या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता।
चित्रावली
950px|center|thumb|सन १९२३ में वन्दे मातरम् का सचित्र प्रकाशन हुआ जो अत्यन्त दुर्लभ है।
इन्हें भी देखें
वन्दे मातरम् का इतिहास
भारत माता
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय
आनन्द मठ
जन गण मन
शुभ सुख चैन
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
वन्दे मातरम् (बहुविकल्पी)
बाहरी कड़ियाँ
वन्दे मातरम्
भारत सरकार की आधिकारिक साइट से राष्ट्रगीत का डाउनलोड
गीत गंगा पर वन्दे मातरम् - टैक्स्ट, पॉडकास्ट तथा ऑडियो डाउनलोड: १ २
यू ट्यूब पर लता मंगेशकर द्वारा गाया गया वन्दे मातरम् गीत (फिल्म - आनन्द मठ, १९५२)
Vande Mataram on Mohan Veena.ogg वन्दे मातरम् , पण्डित विश्व मोहन भट्ट जी की मोहन वीणा से, भोपाल, भारत फरवरी 2017
वंदे मातरम् के १५० वर्ष
'जन गण मन' से पहले बजेगा 'वन्दे मातरम्': स्कूलों में राष्ट्रगीत के सभी 6 अनुच्छेद अनिवार्य
सन्दर्भ
निहालचन्द्र वर्मा द्वारा सम्पादित बंकिम समग्र 1989 हिन्दी प्रचारक संस्थान वाराणसी।
श्रेणी:राष्ट्रीय गान
श्रेणी:देशभक्ति के गीत
श्रेणी:भारत के राष्ट्रीय प्रतीक
श्रेणी:भारत के नारे