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भट्टोत्पल
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उत्पल या भट्टोत्पल, भारत के १०वीं शताब्दी के खगोलविद थे। उन्होने वराह मिहिर द्वारा रचित बृहत्संहिता की टीका लिखी है।Varahamihira’s Pandiagonal Magic Square of the Order Four (TAKAO HAYASHI ; 1987)
कृतियाँ
भट्टोत्पल की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
शिष्यहिता - वराहमिहिर के लघुजातक की टीका Bill M. Mak 2019 42A.M. Shastri 1991 205
जगच्चन्द्रिका या चिन्तामणि -- वराहमिहिर के बृहज्जातक की टीका Bill M. Mak 2019 42A.M. Shastri 1991 206
संहितावृत्ति, वराहमिहिर के बृहत्संहिता की टीका Bill M. Mak 2019 42 । संहितावृत्ति मे वराहमिहिर के "समास-संहिता" के सार-अंश भी सम्मिलित हैं।A.M. Shastri 1991 62
भास्कर ने इस टीका की "उत्पल-परिमल" नामक एक एक संक्षिप्त टीका लिखी है। भास्कर वर्षगण कुल के 'कुमार' के पुत्र थे।A.M. Shastri 1991 207
चिन्तामणि, ब्रह्मगुप्त की खण्डखाद्यक की टीका Bill M. Mak 2019 42
यज्ञाश्वमेधिका, वराहमिहिर के "बृहद्-यात्रा" की टीकाBill M. Mak 2019 42
वराहमिहिर के "योग-यात्रा" की टीकाBill M. Mak 2019 42
चिन्तामणि, वराहमिहिर के "विवाहपटल" की टीका Bill M. Mak 2019 42
वराहमिहिर के पुत्र पृथुयासस् की "षट्पञ्चाशिका" की टीका Bill M. Mak 2019 42
चिन्तामणि, बादरायण द्वारा रचित "प्रश्न-विद्या" की टीकाBill M. Mak 2019 42
प्रश्नचूडामणि, ज्योतिष पर प्रश्नोत्तर रूप में ७० श्लोकों वाला एक ग्रन्थ Bill M. Mak 2019 41-42
यह उत्पल द्वारा रचित एकमात्र मूल ग्रन्थ है जो प्राप्य है।A.M. Shastri 1991 205
प्रश्नचूडामणि को अनेक अन्य नामों से भी जाना जाता है, जैसे- "आर्यासप्तति" (क्योंकि इसमें आर्या छन्द में ७० पद्य हैं।), "भुवनदीपिका", "ज्ञान-माल", "प्रश्नज्ञान", "प्रश्नार्य", "प्रश्नार्य-सप्तति", और "प्रश्न-ग्रन्थ"A.M. Shastri 1991 205Bill M. Mak 2019 42
उत्पल ने इसके आरम्भिक और अन्तिम आर्याओं में इस ग्रन्थ को "प्रश्न-ज्ञान" कहा है। इससे लगता है कि इस ग्रन्थ का मूल नाम "प्रश्न-ज्ञान" ही था। A.M. Shastri 1991 205
कुछ पांडुलिपियों के कोलोफॉन से पता चलता है कि यह ज्ञान-माला नामक एक बड़े ग्रन्थ का भाग था।A.M. Shastri 1991 205
युद्ध-जयार्णव-तन्त्र -- युद्ध में विजय पर रचित ग्रन्थA.M. Shastri 1991 205
इसके कोलोफोन में इसे भट्टोत्पल द्वारा रचित बताया गया है।
इसके बारे में नेवारी लिपि की एक पाण्डुलिपि से पता चला जो सर्वबल नामक दैवज्ञ द्वारा १२७० ई० में लिखी गयी है।
यह ग्रन्थ शिव-पार्वती संवाद के रूप में है। शिव, पार्वती के प्रश्नों का उत्तर दे रहे हैं। रघु-नन्दन ने अपने "ज्योतिष-तत्त्व" नामक ग्रन्थ में इसे उद्धृत किया है।
अल-बरुनी ने "संहिता-वृत्ति" और "प्रश्न-चूडामणि" के अलावा निम्नलिखित ग्रन्थों को भी भट्टोत्पल द्वारा रचित बतया है। किन्तु ये अब प्राप्य नहीं हैं।Bill M. Mak 2019 41-42A.M. Shastri 1991 205
ज्योतिष का एक करण ग्रन्थ जिसका नाम भ्रष्ट हो गया है (रा.ह.त.रकरण ??)
एदवर्द सचौ (Eduard Sachau) ने इसका नाम ठीक करने का प्रयन्त किया है और इसका सम्भवित सही नाम राहुन्द्रा-करण" बताया है। अजय मित्र शास्त्री का कहना है कि शायद यह सही नाम नहीं है, और सही नाम राहु-निराकरण सुझाया है। डेविड पिंग्री ने इसका नाम आर्धरात्रिका-करण सुझाया है।
करणाघात (या करण-पात) -- ज्योतिष का एक करण-ग्रन्थ
मुञ्जाल द्वारा रचित "बृहन्मानस" का टीका-ग्रन्थ
S.rū.dh.w'', ज्योतिष का एक अन्य ग्रन्थ जिसका नाम ठीक-ठीक नहीं पढ़ा जा सका है।
इसका मूल नाम क्या था, यह अनिश्चित है। एदवर्द सचौ ने इसका नाम "श्रूधव" सुझाया है जबकि डेविड पिंग्री ने इसका नाम "सूत्रधार" सुझाया है।
अल-अबरुनी ने इस ग्रन्थ में वर्णित मापन सम्बन्धी ज्ञान की प्रशंसा की है और कहा है कि इसकी विधियों को एक अन्य भारतीय खगोलशास्त्री (नाम -"ŚMY") ने भी अंगीकार किया है।
जगच्चन्द्रिका में उत्पल ने 'वास्तुविद्या' (architecture) पर लिखे अपने ग्रन्थ से कुछ श्लोक उद्धृत किये हैं। यह ग्रन्थ सम्प्रति अप्राप्य है।A.M. Shastri 1991 205
कल्याण वर्मन कृत सारावली की कुछ पाण्डुलिपियों के अन्त में एक श्लोक मिलता है जिसमें यह कहा गया है कि मूल ग्रन्थ तीन सौ वर्ष से भी अधिक समय तक अपूर्ण ही बना रहा, जिसे भट्टोत्पल ने पूर्ण किया। A.M. Shastri 1991 207
सम्भव है कि भट्टोत्पल के प्राप्त ग्रन्थों में इनकी प्रतिलिपि बनाने वालों के द्वारा कुछ छोड़ दिया गया हो, या कुछ जोड़ दिया गया हो, या परिवर्तित कर दिया गया हो। उदाहरण के लिये, अलबरुनी ने लिखा है कि मुल्तान के मूल नाम के बारे में संहिता-वृत्ति में बताया गया है ; किन्तु वर्तमान में प्राप्त पाण्डुलिपियों में मुल्तान के बारे में यह कथन नहीं मिलता। अलबरुनी ने लिखा है कि संहितावॄति में लिखा है कि मुल्तान को पहले 'यवनपुर' कहते थे, उसके बाद इसका नाम 'हंसपुर' पड़ा, फिर 'बाग-पुर', फिर 'शम्बपुर' और फिर 'मूल-स्थान' । A.M. Shastri 1991 207
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
बृहज्जातकम् (भट्टोत्पल द्वारा संस्कृत टीका एवं केदार जोशी द्वारा हिन्दी व्याख्या सहित)
श्रेणी:भारतीय खगोलविद