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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

घासीराम व्यास

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घासीराम व्यास (सम्वत् 1903 -- 1942) भारत के स्वतन्त्रता सेनानी एवं हिन्दी कवि थे।http://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/13018 बुन्देलखण्ड की राष्ट्रीय चेतना में राष्ट्रीय कवि पंडित घासीराम व्यास का योगदान 10 अप्रैल 2019 https://web.archive.org/web/20190410145205/http://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/13018 10 अप्रैल 2019 live इन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने में बढ़ चढ़कर भाग लिया। इन्होने प्रत्येक विषय पर रचनाएँ की हैं जिनमें प्रकृतिपरक, शृंगारिक तथा राष्ट्रीय विचारधारा से युक्त महत्वपूर्ण हैं। कवि दंगलों में उन्होनें न जाने कितने नये कवियों को प्रोत्साहित किया तथा प्रेरणा प्रदान की। बुन्देलखण्ड में इनके प्रभाव से अनेक कवियों ने दुर्लभ साहित्य का सृजन कर अपना स्थान बनाया। वे मैथिलीशरण गुप्त के मित्र थे। घासीराम व्यास का जन्म उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के मऊरानीपुर कस्बे के सम्वत् 1903 की अनन्त चतुर्दशी को हुआ था।बुन्देलखण्ड की छन्दबद्ध काव्यपरम्परामई 2022 InternetArchiveBot इनके पिताजी का नाम पं. मदन मोहन व्यास तथा माताजी का नाम श्रीमती राधारानी था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा मऊरानीपुर में ही हुई। हिन्दी मिडिल उत्तीर्ण करने के पश्चात् संस्कृत का अध्ययन उन्होंनें गणपति प्रसाद चतुर्वेदी की पाठशाला में किया। इनकी माँ भी देशभक्त स्वतंत्रता सेनानी थीं, उनका सीधा प्रभाव घासीराम जी के जीवन पर पड़ा। इन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने में बढ़ चढ़कर हिस्सेदारी की। इन्होंनें कई बार जेल यात्रायें की। 1921 से उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेना प्रारम्भ किया और आजीवन राष्ट्र की सेवा हेतु प्रस्तुत रहे। आपने जिला नमक सत्याग्रह 1930 में, किसान कांफ्रेंस 1932 में, अग्रवाल महासभा अधिवेशन 1933 में तथा विदेशी वस्त्र बहिष्कार आन्दोलन 1935 में सक्रिय भागीदारी की। सन् 1941 में जेलयात्रा की। जेल में ही उन्होंने ‘रुक्मणी मंगल’ तथा ‘श्याम संदेश’ पुस्तकें लिखीं। जेल से निकलने पर बीमार हो गए और फिर स्वस्थ नहीं हुए। कठोर कारावास, पारिवारिक निर्धनता आदि ने उनके शरीर को तोड़ दिया। इस स्थिति ने अनेक रोगों को जन्म दिया और ऐसी ही स्थिति परिस्थिति का सामना करते हुये वे सन् 1942 मे सदा-सदा के लिये चले गये। साहित्य-साधना व्यास जी तत्कालीन क्रांति एवं राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रभावित रहे हैं और उनकी रचनायें भी राष्ट्रीय आन्दोलन तथा सम-सामयिक मानवीय समस्याओं से प्रेरित रही हैं। उन्होनें हिन्दी साहित्य के इतिहास का पूरी तरह अध्ययन किया था। वे रीतिकाल, भक्तिकाल एवं क्रांतिकारी साहित्य से प्रभावित हुये बिना नही रहे। उन्होंने एक ओर रीति विषयक अचार्यत्व का निर्वाह किया तो दूसरी ओर गांधीवाद, राष्ट्रीयता तथा क्रांतिकारी भावना से प्रभावित होकर तत्सम्बन्धित काव्य रचनायें भी की । लोक साहित्य का सृजन कर लोक कवियों को प्रेरित और प्रभावित भी किया। उनके प्रयत्नों से 'बुन्देलखण्ड कवि मण्डली' की स्थापना हुई, तत्कालीन साहित्य सेवी इस प्रतिद्वन्दिता से न केवल प्रोत्साहित हुये वरन् सम-सामयिक एवं छन्दबद्ध रचनायें करने में पारंगत भी हुए। इस प्रकार से इस क्षेत्र में कवि-दंगलों की भरमार आ गई और साहित्यसेवी अपनी-अपनी रचनाओं से जनसमुदाय को प्रभावित करने लगे। जन-कवि के रूप में व्यास जी की ख्याति बुन्देलखण्ड के ग्राम-ग्राम में फैल गयी, हजारों-लाखों व्यक्तियों ने इन काव्य दंगलो से प्रेरणा ग्रहण की तथा अनेक कवियों का आविर्भाव भी इसी माध्यम से हुआ । व्यास जी अपनी शैली के कुशल एवं पारंगत कवि रहे। तत्कालीन राष्ट्रीय आन्दोलनों में उनका सक्रिय योगदान रहा। उन्होंने जेल यात्रायें भी की, अंग्रेज सरकार के दमन को भी सहा, 39 वर्ष की अल्प अवस्था में उन्होनें आश्चर्यजनक राष्ट्रीय कार्य किए। जेल जीवन में भी उन्होनें अपनी अमूल्य रचनायें लिखीं। राष्ट्रीय नेताओं के निरन्तर सम्पर्क में रहे, स्वतंत्रता आन्दोलन, अछूत आन्दोलन, किसान आन्दोलन, सत्याग्रह आन्दोलन तथा अन्यान्य राष्ट्रीय आन्दोलनों में भाग लेकर अपना एक राष्ट्रीय इतिहास निर्मित किया। महात्मा गाँधी जी के सत्य, अहिंसा और न्याय के सिद्धान्त से भी वे प्रभावित रहे। उनके अनुयायी होने का उन्हें गर्व था। अहिंसात्मक सत्याग्रहों में ही उन्हें विशेष रूचि थी, इसके लिये उन्होनें अपना सर्वस्व न्यौछावार कर दिया। उनकी एक कविता का नमूना प्रस्तुत है- एक समय काहू सुजान सौं, ब्रज कौ सुन्यो सँदेसौ। भई दशा विह्नल मोहन की, देखत लगै अँदेशौ॥ नंद से दीन, दुखी यशुदा से, जके बलबीर से धावत दौरैं। श्याम सखान से ठाँड़े ठगे, गिरमान कबौं बछरान से तौरैं॥ ‘व्यास’ कहैं रहैं भीगी सनेह सौं, गोपिन सी अखियाँन की कोरैं। होत कदंब से अंग छनै छन, हीय उठें यमुना सी हिलोरैं॥ राधिका, राधिका टेरैं हँसैं, कबौं मौन रहें कबौं आँसू बहाबैं। ‘व्यास’ कहैं इमि दीन दयालु की, ऊधव देखि दशा दुख पावैं॥ बात कह्यो चित चाहै कछू, पर बैन नहीं मुखतें कहि आवैं। बुद्धि विवेक बढ़ावैं अयान से, सोचैं सुनें सकुचैं रहिजावैं॥ सन्दर्भ श्रेणी:हिन्दी कवि