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पृथ्वी सूक्त
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अथर्ववेद के बारहवें काण्ड का प्रथम सूक्त पृथ्वी सूक्त है जिसके कुल६३ मन्त्र हैं। इस सूक्त को पृथिवी सूक्त, भूमि सूक्त तथा मातृ सूक्त भी कहा जाता है। इस सूक्त में पृथ्वी के समस्त चर-अचर के प्रति ऋषि की चिन्तना मुखरित हुई है। पृथ्वी सूक्त में प्रकृति और पर्यावरण के सम्बंध में अद्वितीय ज्ञान है। पृथ्वी के पर्यावरण, जीव जगत, चर अचर के संबंधों की जो वैज्ञानिकता इन मंत्रों में मुखरित हुई है वो आज अपने रचनाकाल के समय से ज्यादा प्रासंगिक प्रतीत होती है।
पृथ्वी सूक्त राष्ट्रिय अवधारणा तथा वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को विकसित, पोषित एवं फलित करने के लिए अत्यन्त उपयोगी सूक्त है। इन मन्त्रों के माध्यम से ऋषि ने पृथ्वी के आदिभौतिक और आदिदैविक दोनों रूपों का स्तवन किया है। यहाँ सम्पूर्ण पृथ्वी ही माता के रूप में ऋषि को दृष्टिगोचर हुई है, अतः माता की इस महामहिमा को हृदयांगम करके उससे उत्तम वर के लिए प्रार्थना की है। यह सूक्त अथर्ववेद में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है, इस सूक्त में पृथ्वी के स्वरूप एवं उसकी उपयोगिता, मातृभूमि के प्रति प्रगाढ़ भक्ति पर विशद् विवेचन किया गया है। पृथ्वी सूक्त के मन्त्रदृष्टा ऋषि अथर्वा हैं। (गोपथ ब्राह्मण के अनुसार अथर्वन् का शाब्दिक अर्थ गतिहीन या स्थिर है।)
"पृथ्वी हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं" (माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः) । भूमि के प्रति पग पग पर कृतज्ञता व्यक्त की गयी है। पृथ्वी सूक्त में कहा गया है,
देवता जिस भूमि की रक्षा उपासना करते हैं वह मातृभूमि हमें मधु सम्पन्न करे। इस पृथ्वी का हृदय परम आकाश के अमृत से सम्बंधित रहता है। वह भूमि हमारे राष्ट्र में तेज बल बढ़ाये।
सूर्य और चन्द्र से इस पृथिवी का मानो मापन हो रहा है। मापन से यहां यह अभिप्राय है कि पूर्व से पश्चिम की ओर जाते हुए सूर्य व चन्द्र मानो पृथिवी को माप ही रहे हैं। इन सूर्य-चन्द्र के द्वारा सर्वव्यापक प्रभु पृथिवी पर विविध वनस्पतियों को जन्म दे रहे हैं। यह पृथिवी शक्ति व प्रज्ञान के स्वामी जितेन्द्रिय पुरूष की मित्र है। यह भूमि हम पुत्रों के लिए आप्यायन के साधनभूत दुग्ध आदि पदार्थों को दे ।
पृथ्वी सूक्त के 12.1.7 व 8 श्लोक कहते हैं,
"हे पृथ्वी माता आपके हिम आच्छादित पर्वत और वन शत्रुरहित हों। आपके शरीर के पोषक तत्व हमें प्रतिष्ठा दें। यह पृथ्वी हमारी माता है और हम इसके पुत्र।
"हे माता! सूर्य किरणें हमारे लिए वाणी लायें। आप हमें मधु रस दें, आप दो पैरों, चार पैरों वाले सहित सभी प्राणियों का पोषण करती हैं।"
यहां पृथ्वी के सभी गुणों का वर्णन है लेकिन अपनी ओर से क्षमायाचना भी है-
"हे माता हम दायें-बाएं पैर से चलते, बैठे या खड़े होने की स्थिति में दुखी न हों। सोते हुए, दायें-बाएं करवट लेते हुए, आपकी ओर पांव पसारते हुए शयन करते हैं- आप दुखी न हों। हम औषधि, बीज बोने या निकालने के लिए आपको खोदें तो आपका परिवार, घासफूस, वनस्पति फिर से तीव्र गति से उगे-बढ़े। आपके मर्म को चोट न पहुंचे।"
मन्त्र १
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवी धारयन्ति सा नो भूतस्य भव्यस्य पल्युमरू लोक प्रथिवी नः कृनोती
अर्थात - महान् सत्य, कठोर नैतिक आचरण, शुभ कार्य करने का दृढ़ संकल्प, तपस्या, वैदिक स्वाध्याय अथवा ब्रह्मज्ञान और सर्वलोकहित के लिये समर्पित जीवन पृथ्वी को धारण करते हैं। इस पृथ्वी ने भूत काल में जीवों का पालन किया था और भविष्य काल में भी जीवों का पालन करेगी। इस प्रकार की पृथ्वी हमें निवास के लिए विशाल स्थान प्रदान करे।
मन्त्र २
असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्या उद्यतः प्रवतः समं बहु नानावीर्या औशाधीर्या विभर्ति पृथिवी नः प्रचतम राध्याताम नः
अर्थात - जिस भूमि पर ऊंचे नीचे समतल स्थान हैं तथा जो अनेक प्रकार की सामर्थ्य वाली जड़ी बूटियों को धारण करती है। वह भूमि हमें सभी प्रकार से और पूर्ण रूप से प्राप्त हो और हमारी सभी कामनाओं को पूर्ण करे।
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
पृथ्वी सूक्त (हिन्दी अर्थ सहित)
वेदों में सांसारिक यथार्थवाद
पृथ्वी सूक्त और वेदों से जानिए पर्यावरण संरक्षण का महत्व
श्रेणी:वेद