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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

रामसेतु की महिमा

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रामसेतु की महिमा भारत के दक्षिण में रामेश्वरम नामक स्थान से श्री लंका तक समुद्र की एक उथली भूभाग की छोटे छोटे द्वीपों की रेखा चली गयी है, पुराने जमाने से ही लोगों की मान्यता रही है कि किसी भी विज्ञान को याद करने के लिये उसकी कहानी बनायी जाती थी, लेकिन कहानी का हकीती जीवन में जो मूल्य होता है, वह स्थान व्यक्ति या समुदाय से कोई अपना आस्तित्व नही रखता है, जिस प्रकार से जीवन में कर्म के तीन अर्थ माने गये है, मनसा, वाचा और कर्मणा, मन का सोचा जाना है, वाचा से कहा जाना है, लेकिन वाचा एक ही प्रकार की नही होती है, जीभ से बोलकर बात की जाती है, गले से आवाज निकालकर आवाज दी जाती है, नाक से गुनगुनाकर बात की जाती है, आंखों से इशारे से बात के जाती है, शरीर से हाथ का इशारा दिया जाता है, पैर से भी लात दिखाकर बात की जाती है, पेट को हिलाकर और पीठ को दिखाकर भे बात की जाती है, कन्धों को मटकाकर, बाजुओं को लहराकर, और चाल को थिरकर चेहरे से हाव भाव बनाकर भी बात की जाती है, यह कल्पना अधिकतर नृत्य आदि मे देखी जा सकता है, उसी प्रकार से कर्म करने के लिये शरीर से काम किया जाता है, पूरे शरीर से काम करने के लिये मन, बुद्धि और ज्ञान का सहारा लिया जाता है, यह बात समझने के लिये संसार के अन्दर जितने भी सहायक कारण है उनका भी प्रयोग किया जाता है, घर परिवार, दोस्त, और समाजिकता से जितने भी लोग जुडे होते है, किसी न किसी प्रकार से सहायता करते है, उसी तरह से जो कहानी वेदों में लिखी गयी है, उनका उद्देश्य केवल शरीर और शरीर से जुडे कार्यों का विवेचन करना ही मान जा सकता है, बाकी सब मानसिक कल्पना से बनायी गई तस्वीरों से अधिक और कुछ नही होता है, हिन्दी के जितने भी अक्षर है, उनको अगर सजाकर और संवारकर अगर लिखा जावे तो जो भी देवता है, सबके रूप सामने आ आजाते है, अक्षर ’अ’ को ही देख लीजिये, उसको अगर सजाया जाये तो हाथ में धनुष लिये हुए ’राम’का रूप बन जाता है, अक्षर ’शं’ को अगर संवारा जाये तो श्रीकृष्ण का रूप बन जाता है, अक्षर ’श्र’को लिखा सजाया जाये तो लक्षमी का रूप बन जाता है, उसी प्रकार से अक्षर ’श’ के ऊपर अगर छोटी ’इ’ की मात्रा लगाये जावे तो अक्षर ’शि’ का रूप बन जाता है, जिसे अक्सर भगवान ’शिव’ के लिये प्रयोग किया जाता है, जिसमे कल्पना की जाती है कि उनके सिर से गंगा की धारा निकलती है, और शब्द ’शव’ जो कि एक मुर्दे के रूप मे है उसके ऊपर चोटी ’इ’ की मात्रा लगाते ही शब्द ’शिव’ बनजाता है, जिसमे छोटी ’इ’ को शक्ति का रूप दिया गया है, इसी लिये अक्षर इ और ई को शक्ति का कारक कहा जाता है, शब्द ’जव’जो कि छिलका चढा हुआ, एक अनाज है और उसे अगर भूमि के अन्दर डालकर प्राक्रुतिक कारकों को समावेशित किया जाये, तो बडी ई की मात्रा लगाते ही वह शब्द ’जव’ शब्द ’जीव’ बन जाता है। छोटी ’इ’ और छोटा ’अ’ हर शब्द के अन्दर जो भी पुल्लिन्ग या स्त्रीलिन्ग है, और जीव से आच्छादित है, अपनी उपस्थिति प्रस्तुत करते है, और जो भी शब्द नपुसिन्गलिन्ग है, वे अपना इशारा भी इसी प्रकार से प्रस्तुत करते है, बडा ’आ’ और बडी ’ई’अपनी शक्ति की पूर्णता प्रदान करती है, बडे ’आ’ और बडी ’ई’ की मात्रा किसी भी शब्द को जोडने का काम करते है, शब्द ’रम’का अर्थ होता है, समाया हुआ, और बडे ’आ’ की मात्रा ही अक्षर ’र’और ’म’ को जोडकर शब्द ’राम’ का निर्माण करता है, जो कारक ’रम’ से ’राम’ को बनाने में सहायक हुआ है, वही ’रामसेतु’ कहलाता है। राम ही विश्व का धरातल है विश्व का नक्शा सामने फ़ैलाकर अगर हिन्दी के शब्द ’राम’ को देखा जाये तो बडी आसानी से विश्व का सम्पूर्ण धरातल शब्द "राम’ की शक्ल का दिखाई देगा, उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका को अक्षर ’र’ से देखा जाये सम्पूर्ण अफ़्रीका को ’र’ के ऊपर लगी बडे आ की मात्रा को देखा जाये, तथा भारत और चीन आदि को अक्षर ’म’ के रूप मे देखा जाये, तथा आस्ट्रेलिया को ’राम’ के नीचे लगी बिन्दु बाली अभिव्यक्ति से देखा जाये तो सम्पूर्ण विश्व ही ’राम’ नाम के रूप में चित्रित किया जा सकता है। तो विश्व का अक्षर ’र’ और अक्षर ’म’ को जोडने का काम अफ़्रीका का ही भूभाग है न कि श्रीलंका और भारत को जोडने का ’रामसेतु’. श्रेणी:वेद