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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

ध्रुपद

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नाट्यशास्र के अनुसार वर्ण, अलंकार, गान- क्रिया, यति, वाणी, लय आदि जहाँ ध्रुव रूप में परस्पर संबद्ध रहें, उन गीतों को ध्रुवा कहा गया है। जिन पदों में उक्त नियम का निर्वाह हो रहा हो, उन्हें ध्रुवपद अथवा ध्रुपद कहा जाता है। http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/brij616.htm ब्रज-संस्कृति का अविभाज्य अंग-संगीत एचटीएम टीडीआईएल 12 जनवरी 2008 dead 15 जून 2020 12 जनवरी 2008 https://web.archive.org/web/20080112042459/http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/brij616.htm शास्रीय संगीत के पद, ख़याल, ध्रुपद आदि का जन्म ब्रजभूमि में होने के कारण इन सबकी भाषा ब्रज है और ध्रुपद का विषय समग्र रूप ब्रज का रास ही है। कालांतर में मुग़लकाल में ख्याल उर्दू की शब्दावली का प्रभाव भी ध्रुपद रचनाओँ पर पड़ा। वृंदावन के निधिवन निकुंज निवासी स्वामी श्री हरिदास ने इनके वर्गीकरण और शास्त्रीयकरण का सबसे पहले प्रयास किया। स्वामी हरिदास की रचनाओं में गायन, वादन और नृत्य संबंधी अनेक पारिभाषिक शब्द, वाद्ययंत्रों के बोल एवं नाम तथा नृत्य की तालों व मुद्राओं के स्पष्ट संकेत प्राप्त होते हैं। सूरदास द्वारा रचित ध्रुवपद अपूर्व नाद- सौंदर्य, गमक एवं विलक्षण शब्द- योजना से ओतप्रोत दिखाई देते हैं। सन्दर्भ श्रेणी:संगीत