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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

क्याप

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एक ही बात कई बार लिखी है। सितंबर 2025 सितंबर 2025 क्याप क्याप मनोहर श्याम जोशी हिन्दी भारत साहित्य उपन्यास साहित्य अकादमी पुरस्कार, 2005 क्याप हिन्दी के विख्यात साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी द्वारा रचित एक उपन्यास है जिसके लिये उन्हें सन् 2005 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।http://sahitya-akademi.gov.in/sahitya-akademi/awards/akademi%20samman_suchi_h.jsp अकादमी पुरस्कार साहित्य अकादमी 11 सितंबर 2016 https://web.archive.org/web/20160915135020/http://sahitya-akademi.gov.in/sahitya-akademi/awards/akademi%20samman_suchi_h.jsp 15 सितंबर 2016 dead क्याप कुमाउँनी भाषा का शब्द है, जिसका मतलब होता है- कुछ अजीब-सा, जो समझा न गया हो या अनबूझा सा; उल्लेखनीय है कि मनोहर श्याम जोशी मूल रूप से कुमायूँ से थे। यह उपन्यास २००६ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हुआ। उपन्यास के अन्त में कथा-प्रवाह की विचित्रता देखी जाती है। और शायद इसी कारण स्वयं जोशी इस उपन्यास की अन्तिम पंक्ति के रूप में लिखते हैं- आप कहेंगे कि यह कथा तो क्याप-जैसी हुई ! धैर्य-धन्य पाठकों, यही तो रोना है।क्याप उपन्यास हिंदी साहित्य के मूर्धन्य लेखक मनोहर श्याम जोशी की एक कालजयी रचना है, जो अपने अनूठे शिल्प और गहन सामाजिक दृष्टि के कारण विशिष्ट स्थान रखती है। पुस्तक का शीर्षक 'क्याप' स्वयं में कुछ अजीब, अनगढ़, अनदेखा सा और अप्रत्याशित है। यह शब्द जोशी जी के लेखन के सार को दर्शाता है, जहाँ लेखक अपने विलक्षण गद्य में एक 'फसक' (गप या वृत्तांत) सुनाते हैं। यह 'फसक' उन अनदेखे सत्यों को अप्रत्याशित ढंग से उजागर करती है, जिन्हें समाज देखते-देखते उनका मतलब पूछना और बूझना भूल गया है। 'क्याप' मूलतः एक प्रेम कहानी है, जो समाज की आधी-अधूरी आधुनिकता और बौद्धिकों की अधकचरी उत्तर-आधुनिकता से घातक रूप से टकराती है। यह उपन्यास बदलाव के दौर में सपनों की दारुण परिणति को कुछ इस ढंग से पाठक तक पहुँचाता है कि पढ़ते-पढ़ते मुस्कुराने वाला पाठक एकाएक खुद से सवाल पूछ बैठता है कि उसकी पलकें क्यों भीग गईं। यह रचना सतही यथार्थ चित्रण से दूर, पाठक को गहरे आत्ममंथन, सघन समग्रता बोध और अपूर्व बतरस से सराबोर कर देती है। उपन्यास की कथा का आधार तथाकथित 'रहस्यमय ढिणमिणाण भैरव काण्ड' है, जो मीडिया में भी छाया रहा था। यह घटना नए मध्य हिमालयवर्ती जिले वाल्मीकि नगर (पूर्व में कस्तूरीकोट) में ढिणमिणाण भैरव के मंदिर के पास घटित होती है। इस काण्ड में पुलिस डी.आई.जी. मेधातिथि जोशी और माफिया सरगना हरध्यानु बाटलागी की लाशें एक साथ पड़ी मिलती हैं। दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे और उनकी एक साथ, रहस्यमय परिस्थितियों में हुई मौत कई सवाल खड़े करती है: वे दोनों उस वीरान जगह पर क्या कर रहे थे? उनकी मृत्यु कैसे हुई? (चीर-फाड़ में विष या अस्वाभाविक मृत्यु के संकेत नहीं मिले)। दो जानी दुश्मन एक साथ कैसे मर गए? मीडिया और कुछ लेखकों द्वारा इस घटना को 'दैवीय हस्तक्षेप' या 'रहस्यमय तीसरे' की करतूत बताने पर, कथा का सूत्रधार (जो स्वयं लेखक नहीं है) इसे भ्रामक मानता है। वह नैतिक ज़िम्मेदारी महसूस करता है कि इस दोहरी मौत की भौगोलिक, सामाजिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि स्पष्ट करे। सूत्रधार कस्तूरीकोट/वाल्मीकि नगर क्षेत्र की कठोर सामाजिक संरचना का चित्रण करता है। यह वह क्षेत्र है जहाँ बाहर से आए विजेताओं ने स्थानीय लोगों को 'डूम' (अछूत), 'खसिया' और 'सवर्ण' जैसी श्रेणियों में बाँट रखा था, जहाँ डूम को सवर्ण की छाया छूने की भी मनाही थी। 'क्याप' अपने समय की डरावनी सच्चाइयों को बेहद आत्मीय और प्रमाणिक ढंग से पाठक के प्रेमानुभाव में एकतान होते सुनने का अवसर देती है। यह उपन्यास प्रवचन या रिपोर्ट की बजाय सर्जनात्मक स्वर सुनने को उत्सुक पाठक के लिए एक अद्भुत 'फसक' है, जिस पर हिंदी समाज निश्चय ही गर्व कर सकता है। सन्दर्भ श्रेणी:साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी भाषा की पुस्तकें श्रेणी:२१वीं सदी का साहित्य श्रेणी:हिन्दी उपन्यास