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411 समाचार
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नियोगी आयोग की रपट

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इसाई मिशनरियों की गतिविधियों पर नियोगी आयोग की रपट मध्य प्रदेश सरकार ने सन् १९५६ में प्रकाशित की। यह रपट तीन-तीन भागों वाले दो वॉलुम में है। इस आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति भवानीशंकर नियोगी थे जो नागपुर उच्च न्यायालय के सेवानिवृत मुख्य न्यायधीश थे। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में चर्च के सुनियोजित भारत विरोधी कार्यों के प्रति ना केवल आगाह किया था बल्कि ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों की काली करतूतों का कच्चा चिट्ठा प्रस्तुत किया था। आयोग ने धर्मान्तरण पर कानूनी रूप से रोक लगाने की सिफारिस की थी जिसे लागू नहीं किया गया। नियोगी आयोग का का गठन मध्य प्रदेश से ईसाई मिशनरियों द्वारा वनवासी जनों के बड़े पैमाने पर ईसाई बनाये जाने की जानकारी सामने आने के बाद वस्तुस्थिति का आकलन करने के लिए मध्य प्रदेश की राज्य सरकार द्वारा न्यायमूर्ति भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में किया गया। इसे ‘ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों के लिए जांच समिति’ कहा गया। इस समिति को मध्य प्रदेश सरकार ने 14 अप्रैल, 1954 को एक प्रस्ताव पारित कर स्थापित किया। इस समिति ने वस्तुस्थिति जानने के लिए 14 जिलों का दौरा किया था। समिति ने 77 केंद्रों पर प्रवास किया व 11,360 लोगों से संपर्क किया। 1956 में दो खंडों में अपनी रिपोर्ट दी। == रिपोर्ट का सार == साम, दाम, दंड, भेद द्वारा ईसाई मिशनरियाँ वनवासियों का बड़े पैमाने पर कन्वर्जन कर रही हैं। चर्च एक अन्तरराट्रीय षडयन्त्र का हिस्सा है। चर्च के कार्यक्रम का मूल उद्देश्य कन्वर्जन के माध्यम से राष्ट्रांतरण है। चर्च के कार्य का मूल उद्देश्य धर्मांतरण के माध्यम से राष्ट्रांतरण है। राष्ट्रांतरण से देश की एकता व अखंडता खतरे में पड़ जाती है। चर्च, हिन्दुओं को इसाई बनाने के लिये छल, झूठ, प्रलोभन तथा भय का सहारा लेती है। == अनुशंशाएँ == समिति ने अपनी रिपोर्ट में कुछ अनुशंसाएं भी की थीं। इनमें मुख्य थीं- जिन मिशनरियों का मुख्य उद्देश्य केवल कन्वर्जन है, उन्हें वापस जाने के लिए कहा जाए। मत प्रचार के लिए जो भी साहित्य हो, वह बिना सरकार की अनुमति लिए वितरित नहीं किया जाना चाहिए। देश के भीतर विदेशी मिशनरियों का बड़ी संख्या में आना अवांछनीय है और इसकी रोकथाम होनी चाहिए। समिति ने अपनी दूसरी सिफारिश में कहा कि भारतीय चर्च एक संयुक्त ईसाई चर्च की स्थापना करे, जो विदेश से आने वाली सहायता पर निर्भर न रहे। ऐसी चिकित्सा संबंधी सेवाओं तथा व अन्य सेवाओं को, जो धर्म परिवर्तन के कार्य के लिए काम में लायी जाती हों, उन्हें कानून द्वारा वर्जित कर दिया जाना चाहिए। इसके अलावा दबाव, छल-कपट, भय, आर्थिक या दूसरे प्रकार की किसी भी सहायता का आश्वासन देकर, मानसिक दुर्बलता तथा भोलेपन का लाभ उठाकर कन्वर्जन के प्रयास पर पूर्ण प्रतिबंध हो। सरकार का यह प्रथम कर्तब्य है कि वह अनाथालयों का स्वयं संचालन करे क्योंकि जिन नाबालिगों के माता पिता या संरक्षक नहीं हैं उनकी वैधानिक संरक्षक सरकार ही है। कमेटी की रिपोर्ट में जो अनुशंसाएं की गई हैं उससे चर्च के खतरनाक इरादों के बारे में पता चलता है। == सन्दर्भ == == इन्हें भी देखें == कोठारी आयोग मंडल आयोग सचर समिति लिबराहन आयोग == बाहरी कड़ियाँ == आज भी प्रासंगिक हैं नियोगी आयोग की अनुशंसाएं - समन्वय नंद Lurid drama of proselytism after 1947 Conversion