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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

पत्रहीन नग्न गाछ

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150px मुखपृष्ठ नागार्जुन मैथिली भारत साहित्य साहित्यसेवियों-कलाप्रेमियों के बीच प्यार से 'बाबा' नाम से पुकारे जाने वाले नागार्जुन के अनेक रूप हैं ।... वे अपनी मातृभाषा मैथिलो में 'यात्री' नाम से रचना करते रहे हैं। हिन्दी में भी 'यात्री' नाम से उनकी अनेक रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी हुई हैं। ठेठ भाषाशैली में सहजभाव से प्रगतिशील विचार रख देने में अन्यतम 'यात्री' आधुनिक प्रगतिशील मैथिली काव्य एवं उपन्यास के जनक है। मूल मैथिली से हिन्दी अनुवाद करते समय ध्यान रखा गया है कि अर्थ के साथ-साथ लय का रूपान्तर भी यथावत हो सके। 'पत्रहीन नग्न गाछ' को द्वितीय खंड में 'बाबा' के आठ गीत हैं, जिनमें प्रथम छः तो श्रृंगार गीत हैं। ये नागार्जुन-साहित्य में अद्वितीय हैं। इनके भी हिन्दी रूपान्तर भर दे देना हिन्दी की 'अपनी' परम्परा के प्रतिकूल लगा। हिन्दी की भगिनी भाषाओं के विद्यापति, सूर, तुलसी, कबीर, मीरा आदि के पद मूल रूप में हिन्दी टिप्पणी के साथ कब पराये लगे? राष्ट्रभाषा सही रूप में और समृद्ध हो, और समर्थ हो, और अधिक व्यापक हो- इसके लिये क्या अपेक्षित नहीं कि ढोल पीटने की जगह भगिनी भाषाओं के मूलसाहित्य एवं लोकसाहित्य में हिन्दी की अन्तरात्मा का अनुसंधान किया जाए ? इसी की पहली कड़ी के रूप में हिन्दी की 'अपनी' परम्परा को पुनर्जीवित करते हुए नागार्जुन के मैथिली गीत मूल रूप में ही हिन्दी टिप्पणी के साथ प्रस्तुत किए जा रहे हैं। 'चित्रा' (मैथिली काव्य संकलन) बत्तीस वर्ष पूर्व (1949 ई०) प्रकाशित हुई थी । तत्पश्चात् यह संकलन निकला- पत्रहीन नग्न गाछ। इसमें अधिकाधिक ताजा और 'निरामिष' रचनाएँ संचित की गई थीं। तिक्त-कटु-प्रखर रचनाओं को इस संकलन में नहीं लिया गया। रचनाओं का सेलेक्शन डॉ० सुधाकान्त मिश्र Ph. D. ने किया था। पहली बार यह संकलन 'तीरमुक्ति एकेडेमी' (इलाहाबाद) द्वारा प्रकाशित था... कविता. पृष्ठ क्रम नन्हे नन्हे फूल / 11 सुबह सुबह / 15 बांस की छाँव / 17 सूखा मरियल एक बॅग / 19 हे निरभ्र आकाश ! / 21 पसीने का गुण-धर्म / 25 आश्चर्य में पड़ा हूँ / 27 कंकाल ही कंकाल / 29 नव नचारी / 33 जगतारन ! / 37 पका है यह कटहल ! / 39 बीच सड़क पर / 45 माघ / 47 आधा फागुन बोता / 49 चैत / 51 आषाढ़ / 53 सावन / 55 थोड़ा-थोड़ा मध्यान्तर देकर / 61 अन्त धावण का यह मेष / 65 फुनगी पर नाचती रहे / 67 पत्रहीन नग्न गाछ / 69 नवयुवक ही आगे आयें... / 71 प्लास्टिक की लता / 73 हीटर की आंच में / 75 मनुपुत्र दिगम्बर / 77 एक फाँक आँख, एफ फाँक नाक / 79 राधिका / 81 गोल कर ही डाला / 83 न आए रातभर मेल ट्रेन / 85 एक सामान्य जंक्शन / 87 अरी बबुनी ! / 89 चें चेंचें चेंचें / 91 उहुँक... उहुँक... / 95 पिता-पुत्र संवाद / 99 सिहवाहिनी दशभुजा चंडी / 103 ओना मासी थं / 105 क्या लाल ! क्या लाल ! / 107 दुहाई हे इन्द्र महाराज / 109 ????/113 तृप्यंताम् तृप्यंताम् ... / 115 जोड़ा मन्दिर / 119 टूट गई है नींद / 127 अंधी जिन्दगी / 129 आज के महाकारुणिक बुद्ध / 131 गोत गगनक कोन कोन के झाँपल / 137 अनसोहाँत ई कदमक फूल / 138 पुलिनक सेज पड़लि छथि सरिता / 139 श्याम घटा, सित बीजुरि रेह / 140 घन घमंड गरजए चहुँ ओर / 141 सुजन नयन मनि / 142 जय भारत जननी ! /143 जय भारत माता ! / 144 पत्त्रहीन नग्न गाछ पत्रहीन नग्न गाछ लगता है काला केवल काला, ठूंठ आकृति घप अंधेरी रात में स्पंदनहीन, रूक्ष, तक्षक शिशर ऊपर ऊपर फैला है सर्वत्र किन्तु नीचे, तलवेतले दूव के मुलायम अंकुर रोमांचक ताजा प्रसाद बांट रहे हैं संपूर्ण तन को मन करता है, गाऊँ अँधेरी रात में भी वसन्त की आगमनी आओ हे ऋतुराज, व्यर्थ ही छुपे हो काल की कोख में ! दो निश्छल आशीर्वाद तेरी ही बाट जोह रही हैं घास की कोपलें आओ हे ऋतुराज !