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411 समाचार
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पल्लव राजवंश

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पल्लव साम्राज्य पल्लव एशिया दक्षिण पूर्व एशिया भारत प्राचीन-मध्य काल राज्य द्वितीय शताब्दी ९वीं शताब्दी ई. सातवाहन राजवंश कालभ्रस राजवंश चोल राजवंश पूर्वी चालुक्य Simha flag of Pallava Kingdom.png Pallava territories.png नरसिंहवर्मन् १ (६४५ ई.) काल के पल्लव अधीन क्षेत्र। इसमें पल्लवों द्वारा अधिकृत चालुक्य क्षेत्र भी जुड़े हैं। कांची तमिल, [पालि,] हिन्दू राजा सिंहविष्णु 555–590 ई. अपराजितवर्मन 882–897 ई. India पल्लव राजवंश प्राचीन दक्षिण भारत का राजवंश था ।चौथी शताब्दी में इसने कांचीपुरम में राज्य स्थापित किया और लगभग ६०० वर्ष तमिल और तेलुगु क्षेत्र में राज्य किया। पल्लवों की उत्पत्ति पल्लव राजवंश कुछ विद्वानों ने पल्लवों की उत्पत्ति दक्षिण से हुई है। किन्तु पल्लव और पह्लव नामों का ध्वनिसाम्य दोनों का तादात्म्य सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। दक्षिणी भारत में पह्लवों को उत्तरापथ में और पल्लवों को दक्षिणापथ में रहनेवाला कहकर दोनों में स्पष्ट अंतर दिखलाया है। पल्लव शब्द मूलतः तमिल 'तोंडेयर' और 'तोंडमान' का संस्कृत रूप था। पल्लवों की तमिल उत्पत्ति माननेवाले विद्वान् पल्लवों का तिरैयर से समीकरण बतलाते हैं| तमिल भाषा से निकला सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। मणिमेखलै के आधार पर प्रथम पल्लव नरेश को एक चोल और एक नाग राजकन्या की सतति मानने का भी सुझाव रखा गया है। पल्लव नामकरण नाग-राज-कन्या के जन्मदेश मणिपल्लवम् अथवा प्रथम पल्लव के तोंडै लता की शाखा की गेंडुरी से बँधा हुआ पाए जाने के कारण बतलाया जाता है।Green Alexandra M. F. The Architecture of the Pallava Dynasty 1969 Mount Holyoke College, 1969. Department of Art History. https://books.google.co.in/books?id=udpWswEACAAJ&dq=pallava+dynasty&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwiSmcOKwLfcAhUC6Y8KHZKABDsQ6AEIMTAC 24 जुलाई 2018 en https://web.archive.org/web/20180724154421/https://books.google.co.in/books?id=udpWswEACAAJ&dq=pallava+dynasty&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwiSmcOKwLfcAhUC6Y8KHZKABDsQ6AEIMTAC 24 जुलाई 2018 live इतिहास right|thumb|300px|कांचीपुरम के कैलाशनाथ मन्दिर का आन्तरिक दृष्य पल्लवों का प्रारंभिक इतिहास क्रमबद्ध रूप से नहीं प्रस्तुत किया जा सकता। सुविधा के लिए भाषा के आधार पर उन्हें प्राकृत ताम्रपट्टों से ज्ञात और संस्कृत ताम्रपट्टों से ज्ञात पल्लवों में विभाजित किया जाता है। इनमें से सर्वप्रथम नाम सिंहवर्मन् का है जिसका गुंटुर अभिलेख तीसरी शताब्दी के अंतिम चरण का है। शिवस्कंदवर्मन्, जिसके अभिलेख मयिडवोलु और हीरहडगल्लि से प्राप्त हुए हैं, चौथी शताब्दी के आरंभ में हुआ था और प्रारंभिक पल्लवों में सबसे अधिक प्रसिद्ध है। इस समय पल्लवों का अधिकार कृष्णा नदी से दक्षिणी पेन्नेर और बेल्लारी तक फैला हुआ था। शिवस्कंदवर्मन ने अश्वमेघ यज्ञ किया था। उसके बाद स्कंदवर्मन् का राज्य हुआ। स्कंदवर्मन् के गुंटुर से प्राप्त ताम्रपट्ट में, जो ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित है युवराज बुद्धवर्मन् और उसके पुत्र बुद्ध्यंकुर का उल्लेख है। किन्तु इसके बाद का इतिहास तिमिराच्छन्न है। समुद्रगुप्त के द्वारा पराजित कांची के नरेश का नाम विष्णुगोप था। इसके बाद संस्कृत ताम्रपट्ट के पल्लवों का राज्यकाल आता है। इन अभिलेखों से हमें कई पल्लव राजाओं के नाम ज्ञात होते हैं किंतु उन सभी का परस्पर संबंध और क्रम निश्चित करना कठिन है। कांची के राजवंश की छिन्न-भिन्न शक्ति का लाभ उठाकर पल्लव साम्राज्य के उत्तरी भाग में नेल्लोर-गुंटुर क्षेत्र में एक सामंत पल्लव वंश ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। ताम्रपट्टों से ज्ञात इस वंश के शासकों को 375 से 575 ई. के बीच रखा जा सकता है। कांची के मुख्य घराने के लिए सर्वप्रथम हम चेंडलूर ताम्रपट्ट से ज्ञात स्कंदवर्मन्, उसके पुत्र कुमारविष्णु प्रथम, पौत्र बुद्धवर्मन और प्रपौत्र कुमारविष्णु द्वितीय को रख सकते हैं। स्कंदवर्मन् संभवत: ब्रिटिश म्यूज़ियम के ताम्रपट्ट का स्कंदवर्मन् हो। इसके बाद उदयेदिरम् ताम्रपट्ट से स्कंदवर्मन् (द्वितीय), उसके पुत्र सिंहवर्मन्, पौत्र स्कंदवर्मन् तृतीय और प्रपौत्र नंदिवर्मन् (प्रथम) का ज्ञान होता है। पहले उल्लिखित पल्लवों के साथ इनका संबंध ज्ञात नहीं है। किंतु सिंहवर्मन् का राज्यकाल 436 से 458 ई. तक अवश्य रहा। सिंहवर्मन् और उसके पुत्र स्कंदवर्मन् (तृतीय) का उल्लेख उनके सामंत गंग लोगों के अभिलेखों में भी आता है। छठी शताब्दी के प्रारंभ में शांतिवर्मन् का नाम ज्ञात होता है। संभवत: यही चंडदंड के नाम से भी प्रसिद्ध था और कदंब रविवर्मन् के द्वारा मारा गया था। सिंहवर्मन् द्वितीय से पल्लवों का राज्यक्रम सुनिश्चित हो जाता है। पल्लव राजवंश के गौरव का श्रीगणेश उसके पुत्र सिंहविष्णु (575-600 ई.) के द्वारा हुआ। सिंहविष्णु ने कलभ्रों द्वारा तमिल प्रदेश में उत्पन्न राजनीतिक अव्यवस्था का अंत किया और चोल मंडलम् पर पल्लवों का अधिकार स्थापित किया। यह विष्णु का उपासक था। अवनिसिंह उसका विरोधी था। उसने संस्कृत के प्रसिद्ध कवि भारवि को प्रश्रय दिया था। महाबलिपुरम की वराह गुहा में उसकी और उसकी दो रानियों की मूर्तियाँ प्रस्तर पर उभारी गई है। thumb|380px|पल्लव स्तंभ, महेंद्रवर्मन प्रथम काल, 7 वीं शताब्दी सिंहविष्णु के पुत्र महेन्द्रवर्मन प्रथम (600-630 ई.) की गणना इस राजवंश के सर्वोच्च सम्राटों में होती है। इस महान शासक की बहुमुखी प्रतिभा युद्ध और शांति दोनों ही क्षेत्रों में विकसित हुई। इसी समय पल्लवों और चालुक्यों के संघर्ष का प्रारंभ हुआ। चालुक्य नरेश पुलकेशिन् द्वितीय की सेना विजय करती हुई पल्लव राजधानी के बिल्कुल समीप पहुँच गई थी। पुल्ललूर के युद्ध में महेंद्रवर्मन् ने चालुक्यों को पराजित किया और साम्राज्य के कुछ उत्तरी भागों का छोड़कर शेष सभी की पुनर्विजय कर ली। महेंद्रवर्मन् ने कई विरुद धारण किए जो उसके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के अनेक गुणों की ओर संकेत करते हैं, यथा मत्तविलास, विचित्रचित्त, चेत्थकारि और चित्रकारपुलि। चट्टानों को काटकर बनवाए गए इसके मदिरों में से कुछ त्रिचिनापली, महेंद्रवाडि और डलवानूर में उदाहरण रूप में अवशिष्ट हैं। उसने महेंद्रवाडि में महेंद्र-तटाक नाम के जलाशय का निर्माण किया। उसे चित्रकला में भी रुचि थी एवं वह कुशल संगीतज्ञ के रूप में भी प्रसिद्ध था। उसने मत्तविलास प्रहसन की रचना की थी। प्रारंभ में वह जैन मतावलंबी था किंतु अप्पर के प्रभाव से उसने शैव धर्म स्वीकार कर लिया। फिर भी उसने विष्णु की पूजा को प्रोत्साहन दिया किंतु जैनियों के प्रति वह असहिष्णु बना रहा। महेंद्रवर्मन् का पुत्र नरसिंहवर्मन् प्रथम (630-668) इस राजवंश का सर्वश्रेष्ठ सम्राट् था। इसके समय में पल्लव दक्षिणी भारत की प्रमुख शक्ति बन गए। उसने चालुक्य नरेश पुलकेशिन् द्वितीय के तीन आक्रमणों का विफल कर दिया। इन विजयों से उत्साहित हाकर उसने अपनी सेना चालुक्य साम्राज्य पर आक्रमण के लिए भेजी जिसने 642 ई. में चालुक्यों की राजधानी वातापी पर अधिकार कर लिया। इस विजय के उपलक्ष्य में उसने वातापिकोंड की उपाधि धारण की। युद्ध में पुलकेशिन् की मृत्यु के कारण चालुक्य साम्राज्य अव्यवस्थित रहा। फलस्वरूप चालुक्य साम्राज्य के दक्षिणी भाग पर पल्लवों का अधिकार बना रहा। पुलकेशिन् के पुत्र विक्रमादित्य ने 655 में पल्लवों को वातापी छोड़ने पर विवश किया। नरसिंहवर्मन् ने लंका के राजकुमार मानवर्मा की सहायता के लिए दो बार लंका पर आक्रमण किया और अंत में उसे लंका के सिंहासन पर फिर से अधिकार दिलाया। उसके लिए यह भी कहा जाता है कि उसने चोल, चेर, कलभ्र और पांडवों का भी पराजित किया था। उसका विरुद महामल्ल था। उसने महाबलिपुरम् का गौरव बढ़ाया। यहाँ उसने एक ही प्रस्तरखंड से बने कुछ मंदिरों या रथों का निर्माण कराया। 640 में चीनी यात्री ह्वेनसांग पल्लव साम्राज्य में आया। उसने तोंडमंडलम् और कांची का वर्णन किया है। नरसिंहवर्मन् के पुत्र महेंद्रवर्मन् द्वितीय का राज्यकाल दो वर्ष (668-670) का ही था जिसमें उसे चालुक्य विक्रमादित्य के हाथों पराजित होना पड़ा। महेंद्रवर्मन् के पुत्र परमेश्वरवर्मन् प्रथम (670-695) का राजनीतिक महत्व चालुक्य नरेश विक्रमादित्य का सफल विरोध करने में है। विक्रमादित्य ने पल्लवों के शत्रु पांड्यों के साथ संधि की और अपने देश के अपमान का प्रतिकार करने के लिए पल्लव राज्य पर आक्रमण किया और कांची को विजय करता हुआ कावेरी के दक्षिणी तट पर उरगपुर तक पहुँचा। परमेश्वरवर्मन् अपनी प्रारभिक असफलताओं से हतोत्साह नहीं हुआ। विपक्षियों का ध्यान आकर्षित करने के लिए उसने एक सेना चालुक्य साम्राज्य में भेजी जिसने विक्रमादित्य के पुत्र विनयादित्य और पौत्र विजयादित्य का पराजित किया। उसने स्वयं पेरुवलनल्लूर के युद्ध में आक्रमणकारियों को पराजित किया और उन्हें पल्लव साम्राज्य छोड़कर जान पर विवश किया। महाबलिपुरम् की कुछ कलाकृतियाँ उसी ने बनवाई थीं। वह शिव का उपासक था। उसने कांची के समीप कूरम् में एक शिवमंदिर का निर्माण कराया। परमेश्वरवर्मन् के पुत्र नरसिंह द्वितीय राजसिंह (695-722) का शांत और समृद्ध राज्यकाल कला और साहित्य की प्रगति की दृष्टि से उल्लेखनीय है। उसके मंदिर अपने आकार और सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। कांची का कैलासनाथ मंदिर और मामल्लपुरम् का मंदिर इनके उदाहरण हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार प्रसिद्ध काव्यशास्त्रज्ञ और गद्यलेखक दंडिन् इसी के दरबार में था और यहीं भास के नाटकों का रंगमंच पर प्रदर्शनार्थ परिवर्तन किया गया था। इस काल की समृद्धि का कारण विदेशो से व्यापार था। संभवत: व्यापारिक हित के लिए ही उसने एक राजदूतमंडल चीन भेजा था। उसे विरुदों स विशेष प्रेम था। उसने 250 के लगभग उपाधियाँ ग्रहण की थीं जिनमें राजसिंह, शंकरभक्त और आगमप्रिय प्रमुख है। नरसिंहवर्मन् के पुत्र परमेश्वरवर्मन् द्वितीय (722-730) के राज्यकाल के अंतिम वर्षों में चालुक्य युवराज विक्रमादित्य ने गंगों की सहायता से कांची पर आक्रमण किया। परमेश्वरवर्मन् ने भेंट आदि देकर आक्रमणकारियों को लौटाया। प्रतिकार की भावना से प्रेरित होकर उसने गंग राज्य पर आक्रमण किया किंतु युद्ध में मारा गया। तिरुवडि का शिवमंदिर संभवत: उसी ने बनवाया था। परमेश्वरवर्मन् की मृत्यु पर उसके वंशजों के अभाव में राज्य के अधिकारियों ने विद्वान् ब्राह्मणों की घटिका के परामर्श से बारहवर्षीय नंदिवर्मन् द्वितीय पल्लवमल्ल (730-800) की सिंहासन पर बैठाया यह सिंहविष्णु के भाई भीमवर्मन् के वंशज हिरण्यवर्मन् का पुत्र था। पांड्य नरेश मारवर्मन राजसिंह ने पल्लवों के विरुद्ध कई राज्यों का एक गुट संगठित किया और चित्रमाय नाम के व्यक्ति की सहायता के लिए, जो अपने को परमेश्वरवर्मन् का पुत्र कहता था, नंदिवर्मन् पर आक्रमण किया और उसे नंदिग्राम में घेर लिया। किंतु पल्लवों के सेनापति उदयचंद्र ने नंदिग्राम का घेरा तोड़ा, चित्रमाय को मारकर और दूसरे विरोधियों को पराजित किया। किंतु पल्लवों के सेनापति उदयचंद्र ने नंदिग्राम का घेरा तोड़ा, चित्रमाय को मारकर और दूसरे विरोधियों को पराजित किया। किंतु नंदिवर्मन् की सबसे भयंकर विपत्ति चालुक्य नरेश विक्रमादित्य द्वित्तीय का आक्रमण था। गंगों की सहायता से उसने 740 ई. के लगभग पल्लवों को पराजित कर कांची पर अधिकार कर लिया। किंतु नगर का विध्वंस न करके उसने उलटे जनता को दान और उपहार दिए और इस प्रकार पल्लवों के अधिकार को कुंठित किए बिना उनसे बदला लिया। उसके शासन के अंतिम वर्षों में उसके पुत्र कीर्तिवर्मन् ने फिर आक्रमण किया था। राष्ट्रकूट साम्राज्य के संस्थापक दंतिदुर्ग ने भी कांची पर आक्रमण किया था किंतु अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर उसने नंदिवर्मन् से संधिकर उसके साथ अपनी कन्या रेवा का विवाह कर दिया था। नंदिवर्मन् ने गंग नरेश श्रीपुरुष को पराजित किया और गंग राज्य की भूमि अपने बाण सामंत जयनदिवर्मन् को दी थी। नदिवर्मन् पांड्य नरेश वरगुण महाराज प्रथम के हाथों पराजित हुआ। उसने पांड्यों के विरुद्ध कोंगु, केरल और तगडूर के शासकों का संघ बनाया किंतु पांड्य नरेश अपने विपक्षियों को पराजित करके पल्लव राज्य में पेन्नर नदी के तट पर अरशूर पहुँचा था। पुराने मंदिरों के उद्धार के साथ ही नंदिवर्मन् ने मुक्तेश्वर, वैकुंठ पेरुमाल और दूसरे मंदिरों का निर्माण कराया। वह वैष्णव था। प्रसिद्ध वैष्णव संत तिरुमर्ग आल्वर उसी के राज्यकाल में हुए थे। नंदिवर्मन् स्वयं विद्वान् था। दंतिवर्मन् (796-847) नंदिवर्मन और रेवा का पुत्र था। राष्ट्रकूटों से संबंधित होने पर भी उसे राष्ट्रकूट सिंहासन के लिए उत्तराधिकार के संघर्ष में भाग लेने के कारण ध्रुव और गोविंद तृतीय के हाथों पराजित होना पड़ा था। पांड्य नरेश वरगुण प्रथम ने कावेरी प्रदेश की विजय कर ली थी किंतु बाण फिर भी पल्लवों के सामंत बने रहे। दंतिवर्मन् के पुत्र नंदिवर्मन् तृतीय (847-872) ने पल्लवों की लुप्तप्राय प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित सा कर दिया। उसका विवाह राष्ट्रकूट नरेश अमोधवर्ष प्रथम की पुत्री शंखा से हुआ था। उसने पांड्यों के विरुद्ध कई शक्तियों का एक संघ बनाया था। पांड्य नरेश श्रीमार श्रीवल्लभ को तेल्लारु के युद्ध में बुरी तरह पराजित कर वहवैगै के तट तक पहुँच गया था। अपनी विजय के उपलक्ष्य में उसने तेल्लारेंरिद की उपाधि ग्रहण की थी। किंतु बाद में श्रीमार ने नंदिवर्मन् और उसके सहायकों को कुंभकोनम् के समीप पराजित किया। स्याम में तकुआ-पा स्थान से प्राप्त एक तमिल अभिलेख में उसकी उपाधि के आधार पर अवनिनारणन् नाम के जलाशय और विष्णु मंदिर का उल्लेख है। इससे पल्लवों की नौशक्ति और विदेशों के साथ उनके संबध का आभास होता है। उसे अन्य विरुद थे वरतुंगन् और उग्रकोपन्। वह शैव था। उसने तमिल साहित्यकार पेरुदेवनार को प्रश्रय दिया था। नंदिवर्मन् की राष्ट्रकूट रानी से उत्पन्न नृपतुंगवर्मन् (872-913) ने सिंहासन पर बैठने के कुछ समय बाद ही कुंभकोनम् के समीप श्रीपुरंवियम् के युद्ध में पांड्य नरेश वरगुण द्वितीय को पराजित कर अपन पिता की पराजय का प्रतिकार किया। उसने पल्लव "साम्राज्य की सीमाओं को अक्षुण्ण रखा। उसने अभिलेखों से ज्ञात होता है कि शिक्षा और शासनप्रबंध के क्षेत्र में पल्लवों ने ही चोलों के लिए भूमिका बनाई थी। नृपतुंगवर्मन् का पुत्र अपराजित इस वंश का अंतिम सम्राट् था। पल्लवों के सामंत आदित्य प्रथम ने अपनी शक्ति बढ़ाई और 893 के लगभग अपराजित को पराजित कर पल्लव साम्राज्य को चोल राज्य में मिला लिया। इस प्रकार पल्लव साम्राज्य का अस्तित्व समाप्त हुआ। पल्लवों की कुछ शाखाओं (नोलंब-पल्लव) ने कुछ स्थानों पर बाद में भी शासन किया। 13वीं शताब्दी में कोपेरुंजिंग नाम के सामंत ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने का प्रयत्न किया। यद्यपि वह अपने को पल्लव कहता था, तथापि उसको पल्लव सम्राटों से संबधित करना कठिन है। वंशावली सिंहवर्मन १ 275 - 300 ई. स्कन्दवर्मन 300 - 350 ई. विष्णुगोप 350 - 355 ई. कुमारविष्णु १ 350 - 370 ई. स्कन्दवर्मन २ 370 - 385 ई. वीरवर्मन् 385 - 400 ई. स्कन्दवर्मन ३ 400 - 436 ई. सिंहवर्मन २ 436 - 460 ई. स्कन्दवर्मन ४ 460 - 480 ई. नन्दिवर्मन १ 480 - 510 ई. कुमारविष्णु २ 510 - 530 ई. बुद्धवर्मन् 530 - 540 ई. कुमारविष्णु ३ 540 - 550 ई. सिंहवर्मन ३ 550 - 560 ई. उत्तरकालीन पल्लव सिंहविष्णु 575 - 590 ई. महेन्द्रवर्मन १ 590 - 630इ.. नरसिंहवर्मन १ (ममल्ल) 630 - 668 ई. महान राजा महेन्द्रवर्मन २ 668 - 672 ई. परमेश्वरमर्मन १ 672 - 700 ई. महान राजा नरसिंहवर्मन २ (राजसिंह) 700 - 728 ई. परमेश्वरवर्मन २ 705 - 710 ई. नन्दिवर्मन २ (पल्लवमल्ल) 732 - 796 ई. तन्दिवर्मन् 775 - 825 ई. नन्दिवर्मन ३ 825 - 869 ई. नृपतुंगवर्मन 869-882 ई. अपराजितवर्मन 882 - 897 ई. इन्हें भी देखें कांचीपुरम बाहरी कड़ियाँ सन्दर्भ श्रेणी:दक्षिण भारत का इतिहास श्रेणी:दक्षिण भारत श्रेणी:पल्लव राजवंश श्रेणी:भारत के साम्राज्य श्रेणी:भारत का इतिहास श्रेणी:भारत के राजवंश