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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

धातु (बहुविकल्पी)

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‘धातु’ शब्द सभी शास्त्रों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। धातु शब्द की व्युत्पत्ति ‘धा’ धातु में ‘तुन्’ प्रत्यय लगाने से हुआ है। व्याकरण में ‘धातु’ का अर्थ है - ‘जिससे शब्द निष्पन्न होता है’। महर्षि पाणिनि ने लगभग दो हजार धतुओं का उल्लेख किया है। भाषा का मूल बीज ‘धातु’ है। आयुर्वेद में वात-पित्त-कफ को 'धातु’ कहा गया है, जिससे समस्त जीव-शरीर का निर्माण हुआ है। आयुर्वेद में प्रयुक्त धतु को देखा नहीं जा सकता, परन्तु इनमें से किसी एक में भी विकार होते ही उसे हम अनुभव करते हैं। मनुष्य के शरीर मे ‘ओज’ को ‘धातु’ की संज्ञा दी गई है। यह शरीर के मूल बीज का घटक है जिन्हें हम सत्त्व-रज-तम भी कहते हैं। इन्हें भी नहीं देखा जा सकता परन्तु आचरण आदि में किसी एक गुण का विकास होता है इसी प्रकार वीणा की वादन क्रिया में प्रयुक्त समस्त युक्तियों का सार ‘धातु’ है। प्रबन्ध के अवयव को भी धातु कहा गया है। शास्त्रीय संगीत के सन्दर्भ में ‘धातु’ विभिन्न विशेष अर्थों में प्रयुक्त हुआ है जैसे प्रबन्ध का अवयव धातु, विविध वादनों में प्रयुक्त धातु, वाग्गेयकार के संदर्भ में धातु, वाचिक अभिनय के संदर्भ में धातु आदि। धातु शब्द 'धा' में 'तुन्' प्रत्यय जोड़ने से बना है। यह शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त होता है- धातु (metal) : आधुनिक रसायन विज्ञान की परिभाषा के अनुसार धातु उस खनिज पदार्थ को कहते हैं जो चमकीला तो हो, परन्तु पारदर्शी न हो, जिसमें ताप, विद्युत आदि का संचार होता हो, जो कूटने, खींचने पीटने आदि पर बढ़ सके अर्थात् जिसके तार और पत्तर बन सके। खानों में ये धातुएँ अपने विशुद्ध रूप में नहीं निकलती, बल्कि उनमें अनेक दूसरे तत्त्व भी मिले रहते हैं। उन मिश्रित रूपों को साफ करने पर धातुएँ अपने बिलकुल शुद्ध रूप में आती हैं। धातु (आयुर्वेद) : शरीर को धारण करने या बनाये रखनेवाले तत्त्व जिनकी संख्या वैद्यक में ७ कही गई है। यथा—रस, रक्त, मांस, भेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र। कहा गया है कि जो कुछ हम खाते-पीते हैं, उन सबसे क्रमात् उक्त सात धातुएँ बनती हैं, जिनसे हमारा शरीर बनता है। धातु (संस्कृत के क्रिया शब्द) : संस्कृत व्याकरण में, क्रियाओं के वे मूल रूप जिससे उनके भिन्न-भिन्न विकारी रूप बनते हैं। जैसे — अस्, कृ, घृ, भू आदि। इसके अतिरिक्त स्तूप को भी धातु कहते हैं। गौतम बुद्ध अथवा अन्य बौद्ध महापुरुषों की अस्थियाँ भी 'धातु' कहलाती हैं जिनको उनके अनुयायी डिब्बों में बन्द करके स्मारक रूप में स्थापित करते थे। पुरुष का वीर्य इन्हें भी देखें धातुपाठ