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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

गौतम बुद्ध

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अक्टूबर 2011 बौद्ध धर्म सिद्धार्थ गौतम, शाक्यमुनि, तथागत Byzantine-style Buddha illustration.jpg सारनाथ में भगवान बुद्ध की प्रतिमा, चतुर्थ शताब्दी ईसवी पूर्व 563 ईसवी पूर्व 483 (आयु 80 वर्ष) लुंबिनी, नेपाल कुशीनगर, भारत कुशीनगर, उत्तर प्रदेश, भारत बौद्ध धर्म के संस्थापकKinnard Jacob N. The Emergence of Buddhism: Classical Traditions in Contemporary Perspective 1 October 2010 Fortress Press 978-0-8006-9748-8 1 https://books.google.com.bd/books?id=xIzyZ7Nvs7cC&pg=PA1 en मैत्रेय महाराजा शुद्धोधन (पिता) महाराणी महामाया (माता) गौतम बुद्ध (जन्म ५६३ ईसा पूर्व – निर्वाण ४८३ ईसा पूर्व) एक श्रमण थे जिनकी शिक्षाओं पर बौद्ध धर्म का प्रचलन हुआ।https://indianexpress.com/article/explained/govind-pansare-mm-kalburgi-gauri-lankesh-murder-5316465/ Indian rationalism, Charvaka to Narendra Dabholkar 22 अगस्त 2018 https://web.archive.org/web/20180822154123/https://indianexpress.com/article/explained/govind-pansare-mm-kalburgi-gauri-lankesh-murder-5316465/ 22 अगस्त 2018 live इनका जन्म लुंबिनी में 563 ईसा पूर्व अनार्य शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। उनकी माँ का नाम महामाया था जो कोलीय वंश से थीं, जिनका इनके जन्म के सात दिन बाद निधन हुआ, उनका पालन महारानी की छोटी सगी बहन महाप्रजापती गौतमी ने किया। २९ वर्ष की आयुु में सिद्धार्थ विवाहोपरांत एक मात्र प्रथम नवजात शिशु राहुल और धर्मपत्नी यशोधरा को त्यागकर संसार को जरा, मरण, दुखों से मुक्ति दिलाने के मार्ग एवं सत्य दिव्य ज्ञान की खोज में रात्रि में राजपाठ का मोह त्यागकर वन की ओर चले गए। वर्षों की कठोर साधना के पश्चात बोध गया (बिहार) में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे सिद्धार्थ गौतम से भगवान बुद्ध बन गए। इतिहासकार पं. कोटा वेंकटचलम के अनुसार गौतम बुद्ध का जन्म १८८७ में तथा निर्वाण १८०७ ईपू मे हुआ था और अनेकानेक इतिहासकार मानते हैं कि भारतीय तिथिक्रम, वंशावलियों और पुरातत्व के अनुसार बुद्ध निर्वाण की यही तिथि सिद्ध होती है। https://books.google.co.in/books?id=yVIhAAAAMAAJ&q=buddha+nirvana+1807+bce&dq=buddha+nirvana+1807+bce&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwjaq_yhvsv4AhUBfN4KHY7DDtwQ6AF6BAgKEAM Astronomical Dating of the Mahabharata War Ekkirala Vedavyas 1986 229History of the Mathematical Sciences Ivor Grattan-Guiness 978-81-85931-45-6 54Dates of the Buddha Shriram Sathe 1987 137https://books.google.co.in/books?id=BNgGAAAAYAAJ&q=buddha+nirvana+1807+bce&dq=buddha+nirvana+1807+bce&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwjaq_yhvsv4AhUBfN4KHY7DDtwQ6AF6BAgHEAM Chronology of Ancient Hindu History, Volume 1 Kota Venkatachelam India The dates tally accurately with 27-3-1807 B.C. , as the date of the Nirvana of the Buddha .https://books.google.com/books/about/Building_a_New_India.html?id=wQBIAAAAMAAJ Building a New India: An Agenda for National Renaissance Subramanian Swamy 1992 67 Buddha's Nirvana 1807 B.C. , Maurya Chandragupta c . 1534 B.C. , Harsha Vikramaditya ( Parmar ) c . 82 B.C.https://books.google.co.in/books?id=3I8kAQAAIAAJ&q=buddha+nirvana+1807+bce&dq=buddha+nirvana+1807+bce&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwjm6pKkvsv4AhXD4mEKHS2VAPc4ChDoAXoECAIQAw Die Datierung Des Historischen Buddha Heinz Bechert 1991 104 Ramachandran fixes the date of the Buddha's death in 1807 B.C.https://books.google.co.in/books?id=eLhJAAAAIAAJ&q=buddha+nirvana+1807+bce&dq=buddha+nirvana+1807+bce&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwjB6IXBxcv4AhWopVYBHeqgCoo4ChDoAXoECAcQAw Chronology of Kashmir History Reconstructed Kota Venkatachalam 1955 143 Buddha's Nirvana happened in 1807 B.C.https://books.google.co.in/books?id=6y1uAAAAMAAJ&q=buddha+nirvana+1807+bce&dq=buddha+nirvana+1807+bce&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwjB6IXBxcv4AhWopVYBHeqgCoo4ChDoAXoECAsQAw Origin of Orissa Names Arun Kumar Upadhyay 2000 16 Siddhartha- Birth 1887 BC , became Buddha 1852 BC , Death ( nirvana ) 1807 B.C.https://books.google.co.in/books?id=EDZuAAAAMAAJ&q=buddha+nirvana+1807+bce&dq=buddha+nirvana+1807+bce&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwj2npq7ycv4AhX6s1YBHWP2AIU4ChDoAXoECAgQAw Glimpses of Bhāratiya History Rajendra Singh Kushwaha 2003 India 35 Buddha was born in the year 1887 BC and his Nirvana took place in 1807 BC .https://books.google.co.in/books?id=EFcPAQAAMAAJ&q=buddha+nirvana+1807+bce&dq=buddha+nirvana+1807+bce&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwj7-qroysv4AhVLct4KHUWCDtY4FBDoAXoECAoQAw The Origin of Mathematics V. Lakshmikantham, S. Leela 2000 America 21 Buddha attained Nirvana when he was 80 years old . Thus he lived during 1887-1807 B.C.https://books.google.co.in/books?id=eVVuAAAAMAAJ&q=buddha+nirvana+1807+bce&dq=buddha+nirvana+1807+bce&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwj7-qroysv4AhVLct4KHUWCDtY4FBDoAXoECAsQAw Historic Dates Velandai Gopalayyar Ramachandran 1991 55 The dates tally with 27-3-1807 as the date of Nirvana of Lord Buddha .https://books.google.co.in/books?id=KaofAQAAIAAJ&q=buddha+nirvana+1807+bce&dq=buddha+nirvana+1807+bce&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwj7-qroysv4AhVLct4KHUWCDtY4FBDoAXoECAUQAw Origin and History of Mathematics J. Vasundhara Devi, S. Leela, Cambridge Scientific Publishers 2005 27 The famous Buddha , for example , lived during 1887 to 1807 B.C. and not in 563-483 B.C. as was adopted .https://books.google.co.in/books?id=Ax8SAQAAIAAJ&q=buddha+nirvana+1807+bce&dq=buddha+nirvana+1807+bce&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwj7-qroysv4AhVLct4KHUWCDtY4FBDoAXoECAcQAw Manadēśamu-manasaṃskr̥ti Ekkirala Vedavyas 1970 india 158 The dates tally accurately with 27-3-1807 B.C. as the date of Nirvana of Lord Buddha . जीवन वृत्त उनका जन्म 563 ईस्वी पूर्व के बीच शाक्य गणराज्य की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी में हुआ था, जो नेपाल में है।http://indology.info/papers/cousins The Dating of the Historical Buddha: A Review Article 12 फ़रवरी 2007 https://web.archive.org/web/20110226184207/http://indology.info/papers/cousins/ 26 फ़रवरी 2011 dead लुम्बिनी वन नेपाल के तराई क्षेत्र में कपिलवस्तु और देवदह के बीच नौतनवा स्टेशन से 8 मील दूर पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान के पास स्थित था। कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी के अपने नैहर देवदह जाते हुए रास्ते में प्रसव पीड़ा हुई और वहीं उन्होंने एक बालक को जन्म दिया। शिशु का नाम सिद्धार्थ रखा गया।http://hindi.webdunia.com/buddhism-religion/%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%A8-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%AF-%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A4%AE-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7-112051200047_1.htm संग्रहीत प्रति 16 अक्तूबर 2015 https://web.archive.org/web/20160305012247/http://hindi.webdunia.com/buddhism-religion/%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%A8-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%AF-%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A4%AE-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7-112051200047_1.htm 5 मार्च 2016 dead गौतम गोत्र में जन्म लेने के कारण वे गौतम भी कहलाए। क्षत्रिय राजा शुद्धोधन उनके पिता थे। परंपरागत कथा के अनुसार सिद्धार्थ की माता का उनके जन्म के सात दिन बाद निधन हो गया था। उनका पालन पोषण उनकी मौसी और शुद्दोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती (गौतमी) ने किया। शिशु का नाम सिद्धार्थ दिया गया, जिसका अर्थ है "वह जो सिद्धी प्राप्ति के लिए जन्मा हो"। जन्म समारोह के दौरान, साधु द्रष्टा आसित ने अपने पहाड़ के निवास से घोषणा की- बच्चा या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र पथ प्रदर्शक बनेगा।http://mrsp.mcgill.ca/reports/pdfs/Wesak.pdf संग्रहीत प्रति 14 अप्रैल 2010 https://web.archive.org/web/20070415174531/http://mrsp.mcgill.ca/reports/pdfs/Wesak.pdf 15 अप्रैल 2007 dead शुद्दोधन ने पांचवें दिन एक नामकरण समारोह आयोजित किया और आठ ब्राह्मण विद्वानों को भविष्य पढ़ने के लिए आमंत्रित किया। सभी ने एक सी दोहरी भविष्यवाणी की, कि बच्चा या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र आदमी बनेगा। दक्षिण मध्य नेपाल में स्थित लुंबिनी में उस स्थल पर महाराज अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व बुद्ध के जन्म की स्मृति में एक स्तम्भ बनवाया था। बुद्ध का जन्म दिवस व्यापक रूप से थएरावदा देशों में मनाया जाता है। सिद्धार्थ का मन वचपन से ही करुणा और दया का स्रोत था। इसका परिचय उनके आरंभिक जीवन की अनेक घटनाओं से पता चलता है। घुड़दौड़ में जब घोड़े दौड़ते और उनके मुँह से झाग निकलने लगता तो सिद्धार्थ उन्हें थका जानकर वहीं रोक देता और जीती हुई बाजी हार जाता। खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था क्योंकि किसी को हराना और किसी का दुःखी होना उससे नहीं देखा जाता था। सिद्धार्थ ने चचेरे भाई देवदत्त द्वारा तीर से घायल किए गए हंस की सहायता की और उसके प्राणों की रक्षा की। शिक्षा एवं विवाह सिद्धार्थ ने गुरु विश्वामित्र के पास वेद और उपनिषद्‌ को तो पढ़ा ही , राजकाज और युद्ध-विद्या की भी शिक्षा ली। कुश्ती, घुड़दौड़, तीर-कमान, रथ हाँकने में कोई उसकी बराबरी नहीं कर पाता। सोलह वर्ष की उम्र में सिद्धार्थ का कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुआ। पिता द्वारा ऋतुओं के अनुरूप बनाए गए वैभवशाली और समस्त भोगों से युक्त महल में वे यशोधरा के साथ रहने लगे जहाँ उनके पुत्र राहुल का जन्म हुआ। लेकिन विवाह के बाद उनका मन वैराग्य में चला और सम्यक सुख-शांति के लिए उन्होंने अपने परिवार का त्याग कर दिया। विरक्ति left|thumb|200px|सिद्धार्थ का महाभिनिष्क्रमण (रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा चित्रित) राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ के लिए भोग-विलास का भरपूर प्रबंध कर दिया। तीन ऋतुओं के लायक तीन सुंदर महल बनवा दिए। वहाँ पर नाच-गान और मनोरंजन की सारी सामग्री जुटा दी गई। दास-दासी उसकी सेवा में रख दिए गए। पर ये सब चीजें सिद्धार्थ को संसार में बाँधकर नहीं रख सकीं। वसंत ऋतु में एक दिन सिद्धार्थ बगीचे की सैर पर निकले। उन्हें सड़क पर एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया। उसके दाँत टूट गए थे, बाल पक गए थे, शरीर टेढ़ा हो गया था। हाथ में लाठी पकड़े धीरे-धीरे काँपता हुआ वह सड़क पर चल रहा था। दूसरी बार कुमार जब बगीचे की सैर को निकला, तो उसकी आँखों के आगे एक रोगी आ गया। उसकी साँस तेजी से चल रही थी। कंधे ढीले पड़ गए थे। बाँहें सूख गई थीं। पेट फूल गया था। चेहरा पीला पड़ गया था। दूसरे के सहारे वह बड़ी मुश्किल से चल पा रहा था। तीसरी बार सिद्धार्थ को एक अर्थी मिली। चार आदमी उसे उठाकर लिए जा रहे थे। पीछे-पीछे बहुत से लोग थे। कोई रो रहा था, कोई छाती पीट रहा था, कोई अपने बाल नोच रहा था। इन दृश्यों ने सिद्धार्थ को बहुत विचलित किया। उन्होंने सोचा कि ‘धिक्कार है जवानी को, जो जीवन को सोख लेती है। धिक्कार है स्वास्थ्य को, जो शरीर को नष्ट कर देता है। धिक्कार है जीवन को, जो इतनी जल्दी अपना अध्याय पूरा कर देता है। क्या बुढ़ापा, बीमारी और मौत सदा इसी तरह होती रहेगी सौम्य? चौथी बार कुमार बगीचे की सैर को निकला, तो उसे एक संन्यासी दिखाई पड़ा। संसार की सारी भावनाओं और कामनाओं से मुक्त प्रसन्नचित्त संन्यासी ने सिद्धार्थ को आकृष्ट किया। महाभिनिष्क्रमण left|thumb|250px|तपस्या से क्षीण हुआ बुद्ध का शरीर (लाहौर संग्रहालय) सुंदर पत्नी यशोधरा, दुधमुँहे राहुल और कपिलवस्तु जैसे राज्य का मोह छोड़कर सिद्धार्थ तपस्या के लिए चल पड़े। वह राजगृह पहुँचे। वहाँ भिक्षा माँगी। सिद्धार्थ घूमते-घूमते आलार कालाम और उद्दक रामपुत्र के पास पहुँचे। उनसे योग-साधना सीखी। समाधि लगाना सीखा। पर उससे उसे संतोष नहीं हुआ। वह उरुवेला पहुँचे और वहाँ पर तरह-तरह से तपस्या करने लगे। सिद्धार्थ ने पहले तो केवल तिल-चावल खाकर तपस्या शुरू की, बाद में कोई भी आहार लेना बंद कर दिया। शरीर सूखकर काँटा हो गया। छः साल बीत गए तपस्या करते हुए। सिद्धार्थ की तपस्या सफल नहीं हुई। शांति हेतु बुद्ध का मध्यम मार्ग : एक दिन कुछ स्त्रियाँ किसी नगर से लौटती हुई वहाँ से निकलीं, जहाँ सिद्धार्थ तपस्या कर रहे थे। उनका एक गीत सिद्धार्थ के कान में पड़ा- ‘वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ो । ढीला छोड़ देने से उनका सुरीला स्वर नहीं निकलेगा। पर तारों को इतना कसो भी मत कि वे टूट जाएँ।’ बात सिद्धार्थ को जँच गई। वह मान गये कि नियमित आहार-विहार से ही योग सिद्ध होता है। अति किसी बात की अच्छी नहीं। किसी भी प्राप्ति के लिए मध्यम मार्ग ही ठीक होता है ओर इसके लिए कठोर तपस्या करनी पड़ती है। ज्ञान की प्राप्ति thumb|right|असुरों के बीच घिरे ध्यान मुद्रा में महात्मा बुद्ध बुद्ध के प्रथम गुरु आलार कलाम थे, जिनसे उन्होंने संन्यास काल में शिक्षा प्राप्त की। ३५ वर्ष की आयु में वैशाखी पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ थे। बुद्ध ने बोधगया में निरंजना नदी के तट पर कठोर तपस्या की तथा सुजाता नामक लड़की के हाथों खीर खाकर उपवास तोड़ा। समीपवर्ती गाँव की एक स्त्री सुजाता को पुत्र हुआ।वह बेटे के लिए एक पीपल वृक्ष से मन्नत पूरी करने के लिए सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर पहुँची। सिद्धार्थ वहाँ बैठा ध्यान कर रहा था। उसे लगा कि वृक्षदेवता ही मानो पूजा लेने के लिए शरीर धरकर बैठे हैं। सुजाता ने बड़े आदर से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा- ‘जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो।’ उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई। उसे सच्चा बोध हुआ। तभी से सिद्धार्थ 'बुद्ध' कहलाए। जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध मिला वह बोधिवृक्ष कहलाया और गया का समीपवर्ती वह स्थान बोधगया। धर्म-चक्र-प्रवर्तन वे 80 वर्ष की उम्र तक अपने धर्म का संस्कृत के बजाय उस समय की सीधी सरल लोकभाषा पालि में प्रचार करते रहे। उनके सीधे सरल धर्म की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। चार सप्ताह तक बोधिवृक्ष के नीचे रहकर धर्म के स्वरूप का चिंतन करने के बाद बुद्ध धर्म का उपदेश करने निकल पड़े। आषाढ़ की पूर्णिमा को वे काशी के पास मृगदाव (वर्तमान में सारनाथ) पहुँचे। वहीं पर उन्होंने सर्वप्रथम धर्मोपदेश दिया और प्रथम पाँच मित्रों को अपना अनुयायी बनाया और फिर उन्हें धर्म प्रचार करने के लिये भेज दिया। महाप्रजापती गौतमी (बुद्ध की विमाता) को सर्वप्रथम बौद्ध संघ मे प्रवेश मिला। आनंद, बुद्ध का प्रिय शिष्य था। बुद्ध आनंद को ही संबोधित करके अपने उपदेश देते थे। महापरिनिर्वाण thumb|right|बुद्ध परिनिर्वाण में प्रवेश करते हुए पालि सिद्धांत के महापरिनिर्वाण सुत्त के अनुसार ८० वर्ष की आयु में बुद्ध ने घोषणा की कि वे जल्द ही परिनिर्वाण के लिए रवाना होंगे। बुद्ध ने अपना आखिरी भोजन, जिसे उन्होंने कुन्डा नामक एक लोहार से एक भेंट के रूप में प्राप्त किया था, ग्रहण लिया जिसके कारण वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गये। बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद को निर्देश दिया कि वह कुन्डा को समझाए कि उसने कोई गलती नहीं की है। उन्होने कहा कि यह भोजन अतुल्य है।http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/dn/dn.16.1-6.vaji.html त्रिपिटक 30 सितंबर 2011 https://web.archive.org/web/20110606001458/http://www.accesstoinsight.org/tipitaka/dn/dn.16.1-6.vaji.html 6 जून 2011 live उपदेश भगवान बुद्ध ने लोगों को मध्यम मार्ग का उपदेश दिया । उन्होंने दुःख, उसके कारण और निवारण के लिए अष्टांगिक मार्ग सुझाया। उन्होंने अहिंसा पर बहुत जोर दिया है। उन्होंने यज्ञ और पशु-बलि की निंदा की। बुद्ध के उपदेशों का सार इस प्रकार है - महात्मा बुद्ध ने सनातन धरम के कुछ संकल्पनाओं का प्रचार किया, जैसे अग्निहोत्र तथा गायत्री मन्त्र ध्यान तथा अन्तर्दृष्टि मध्यमार्ग का अनुसरण चार आर्य सत्य अष्टांग मार्ग बौद्ध धर्म एवं संघ बुद्ध के धर्म प्रचार से भिक्षुओं की संख्या बढ़ने लगी। बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी उनके शिष्य बनने लगे। भिक्षुओं की संख्या बहुत बढ़ने पर बौद्ध संघ की स्थापना की गई। बाद में लोगों के आग्रह पर बुद्ध ने स्त्रियों को भी संघ में ले लेने के लिए अनुमति दे दी, यद्यपि इसे उन्होंने उतना अच्छा नहीं माना। भगवान बुद्ध ने ‘बहुजन हिताय’ लोककल्याण के लिए अपने धर्म का देश-विदेश में प्रचार करने के लिए भिक्षुओं को इधर-उधर भेजा। अशोक आदि सम्राटों ने भी विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार में अपनी अहम्‌ भूमिका निभाई। मौर्यकाल तक आते-आते भारत से निकलकर बौद्ध धर्म चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया, बर्मा, थाईलैंड, हिंद चीन, श्रीलंका आदि में फैल चुका था। इन देशों में बौद्ध धर्म बहुसंख्यक धर्म है। कलात्मक चित्रण भरहुत और सांची में प्राप्त बुद्ध के सबसे प्राचीन कलात्मक चित्रण अनाकार (ऐनाइकोनिक) और प्रतीकात्मक थे। इस प्रारंभिक अनाकार काल में बुद्ध को सीधे मानव रूप में नहीं दिखाया जाता था, बल्कि खाली सिंहासन, बिना सवार का घोड़ा, पदचिह्न, धर्मचक्र या बोधि वृक्ष जैसे प्रतीकों द्वारा दर्शाया जाता था। चूँकि अनाकार परंपरा एकल आराध्य मूर्ति को स्वीकार नहीं करती थी, इसलिए अधिकांश चित्रण बुद्ध के जीवन की कथात्मक घटनाओं पर आधारित थे। साँची की कला में जातक कथाएँ भी दर्शाई गई हैं, जो बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाएँ हैं। भारतीय बौद्ध कला की अन्य शैलियों में बुद्ध को मानव रूप में खड़े, पद्मासन में बैठे (अक्सर पद्मासन) या एक करवट लेटे हुए दर्शाया गया है। पहली शताब्दी ईस्वी के बाद बुद्ध के प्रतिमात्मक (आइकोनिक) चित्रण अत्यंत लोकप्रिय और व्यापक हो गए। विशेषकर गंधार बौद्ध कला और मध्य एशियाई बौद्ध कला की कुछ प्रतिमाएँ हेलेनिस्टिक कला से प्रभावित थीं, जिसे यूनानी-बौद्ध कला कहा जाता है। बाद में इस शैली का प्रभाव पूर्वी एशियाई बौद्ध कला तथा दक्षिण-पूर्व एशिया की थेरवाद बौद्ध कला पर भी पड़ा। अन्य माध्यमों में फ़िल्में फ़िल्मों में गौतम बुद्ध के चित्रण बुद्ध देव (भगवान बुद्ध का जीवन), 1923 की भारतीय मूक फ़िल्म, जिसका निर्देशन दादासाहेब फाल्के ने किया। प्रेम संन्यास (एशिया का प्रकाश), 1925 की मूक फ़िल्म। महाबुद्ध का उद्घाटन, 1952 की जापानी फ़िल्म। गोतमा द बुद्ध, 1957 की भारतीय वृत्तचित्र फ़िल्म। सिद्धार्थ (1972 फ़िल्म), 1972 की फ़िल्म। लिटिल बुद्ध, 1994 की फ़िल्म। द लीजेंड ऑफ बुद्ध, 2004 की भारतीय एनिमेटेड फ़िल्म। गौतम बुद्ध (फ़िल्म), 2008 की भारतीय फ़िल्म। श्री सिद्धार्थ गौतम, 2013 की सिंहली जीवनीपरक फ़िल्म। टेलीविज़न बुद्ध (1996 टीवी धारावाहिक) द बुद्ध (पीबीएस वृत्तचित्र) बुद्ध (2013 टीवी श्रृंखला) साहित्य एशिया का प्रकाश, 1879 की काव्य रचना। बुद्ध और उनका धम्म, डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा। बुद्ध (मंगा) सिद्धार्थ (उपन्यास) लॉर्ड ऑफ लाइट क्रिएशन (उपन्यास) संगीत एशिया का प्रकाश (ओराटोरियो) करुणा नदी स्रोत ग्रन्थ Cousins LS 1996 The dating of the historical Buddha: a review article Indology Journal of the Royal Asiatic Society 3 6 1 57–63 http://indology.info/papers/cousins 10.1017/s1356186300014760 12 फ़रवरी 2007 https://web.archive.org/web/20110226184207/http://indology.info/papers/cousins/ 26 फ़रवरी 2011 dead According to Pali scholar K. R. Norman, a life span for the Buddha of c. 480 to 400 BCE (and his teaching period roughly from c. 445 to 400 BCE) "fits the archaeological evidence better".Norman 1997 33 See also Notes on the Dates of the Buddha Íåkyamuni.}} इन्हें भी देखें हिन्दू धर्म में भगवान बुद्ध बुद्धावतार चार आर्य सत्य अष्टांगिक मार्ग महाबोधि विहार बौद्ध संगीति नवयान सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ Gautama Buddha गौतम बुद्ध"गोतम बुद्ध की कहानी https://web.archive.org/web/20230929074443/https://navhindi.com/spiritual/buddha-story/ 29 सितंबर 2023 ". Navhindi. अभिगमन तिथि सितम्बर ३०, २०२३. श्रेणी:बौद्ध धर्म श्रेणी:धर्म प्रवर्तक श्रेणी:भारतीय बौद्ध