411 REFERENCE · Wikipedia
उत्तराखंड में स्वाधीनता संग्राम
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
अंग्रेजों का आगमन
thumbnail|200px|right|1805 में भारत का नक्शा; वर्तमान राज्य उत्तराखण्ड का क्षेत्र उस समय गोरखा नेपाली शासन के अंतर्गत आता था।
thumb|200px|सुगौली संधि द्वारा गोरखा शासन से मुक्त हुआ क्षेत्र।
वर्तमान राज्य उत्तराखण्ड जिस भौगोलिक क्षेत्र पर विस्तृत है उस इलाके में ब्रिटिश शासन का इतिहास उन्नीसवी सदी के दूसरे दशक से लेकर भारत की आज़ादी तक का है। उत्तराखण्ड में ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन 1815 में हुआ। इससे पहले यहाँ नेपाली गोरखों का शासन था। यह भी माना जाता है कि गोरखा शासकों द्वारा इस इलाके के लोगों पर किये गये अत्याचारों को देखकर ही अंग्रेजों का ध्यान इस ओर गया।भसीन अनीस भारत के राज्य प्रभात प्रकाशन 47-48 https://books.google.co.in/books?id=JYxrBQAAQBAJ&lpg=PA47&dq=%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%A1%20%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE&pg=PA47#v=onepage&q=%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%A1%20%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE&f=false 6 जून 2015 https://web.archive.org/web/20160305074638/https://books.google.co.in/books?id=JYxrBQAAQBAJ&lpg=PA47&dq=%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%A1%20%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE&pg=PA47#v=onepage&q=%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%A1%20%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE&f=false 5 मार्च 2016 live हालाँकि अंग्रेजों और नेपाली गुरखाओं के बीच लड़े गये गोरखा युद्ध के अन्य कारण भी थे।
अल्मोड़ा में 27 अप्रैल 1815 को गोरखा प्रतिनिधि बमशाह और लेफ्टिनेंट कर्नल गार्डनर के बीच हुई एक संधि के बाद नेपाली शासक ने इस क्षेत्र से हट जाने को स्वीकारा और इस क्षेत्र पर ईस्ट इण्डिया कंपनी का अधिकार हो गया।https://books.google.co.in/books?id=7_Ct9gzvkDQC&lpg=PA182&ots=fZgvlr0EcX&dq=nepal%20and%20colonel%20gardner%2027%20april%201815&pg=PA182#v=onepage&q&f=false History of Uttaranchal 6 जून 2015 https://web.archive.org/web/20160304212105/https://books.google.co.in/books?id=7_Ct9gzvkDQC&lpg=PA182&ots=fZgvlr0EcX&dq=nepal%20and%20colonel%20gardner%2027%20april%201815&pg=PA182#v=onepage&q&f=false 4 मार्च 2016 live अंग्रेजों का इस क्षेत्र पर पूर्ण अधिकार 4 अप्रैल 1816 को सुगौली की सन्धि के बाद इस पूरे क्षेत्र पर हो गया और नेपाल की सीमा काली नदी घोषित हुई।https://books.google.co.in/books?id=K9IYYO09408C&lpg=PA44&ots=O_6XiEFiG8&dq=nepal%20and%20colonel%20gardner%201815&pg=PA46#v=onepage&q=nepal%20and%20colonel%20gardner%201815&f=false Notes on Nepal 6 जून 2015 https://web.archive.org/web/20160304215459/https://books.google.co.in/books?id=K9IYYO09408C&lpg=PA44&ots=O_6XiEFiG8&dq=nepal%20and%20colonel%20gardner%201815&pg=PA46#v=onepage&q=nepal%20and%20colonel%20gardner%201815&f=false 4 मार्च 2016 live अंग्रेजों ने पूरे इलाके को अपने शासन में न रख अप्रैल 1815 में ही गढ़वाल के पूर्वी हिस्से और कुमायूँ के क्षेत्र पर अपना अधिकार रखा और पश्चिमी हिस्सा सुदर्शन शाह, जो गोरखों के शासन से पहले गढ़वाल के राजा थे, को सौंप दिया जो अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों के पश्चिम में पड़ता था।Robert Montgomery Martin, History of the Possessions of the Honourable East India Company, Volume 1, pg. 107
इस प्रकार गढ़वाल दो हिस्सों में बंट गया, पूर्वी हिस्सा जो कुमाऊँ के साथ ब्रिटिश भारत का हिस्सा बन गया "ब्रिटिश गढ़वाल" कहलाया और पश्चिमी हिस्सा राजा सुदर्शनशाह के शासन में इसकी राजधानी टिहरी के नाम पर टिहरी गढ़वाल कहलाने लगा। टिहरी को राजा सुदर्शन शाह द्वारा नयी राजधानी बनाया गया था क्योंकि पुरानी राजधानी श्रीनगर अब ब्रिटिश गढ़वाल में आती थी।Tehri – History https://web.archive.org/web/20080923171722/http://210.212.78.56/50cities/tehri/english/profile_history.asp 23 सितंबर 2008 New Tehri Official website. ब्रिटिश गढ़वाल को बाद में 1840 में यहाँ पौड़ी में असिस्टेंट-कमिशनर की नियुक्ति के बाद इस क्षेत्र को पौड़ी-गढ़वाल भी कहा जाने लगा, जबकि इससे पहले यह नैनीताल स्थित कुमाऊँ कमिश्नरी के अंतर्गत आता था। दूसरी ओर कुमाऊँ क्षेत्र के पुराने शासक चंद राजा को यह अधिकार नहीं मिला और यह ब्रिटिश भारत का हिस्सा बन गया और ब्रिटिश चीफ़-कमीशनशिप के अंतर्गत शासित होने लगा जिसकी राजधानी (कमिश्नरी) नैनीताल में स्थित थी। भारत की आज़ादी तक टिहरी रजवाड़ा और ब्रिटिश शासन के अधीन रहा यह क्षेत्र आजादी के बाद उत्तर प्रदेश राज्य में मिला दिया गया।
प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष
1856 से 1884 तक पौड़ी-गढवाल और कुमाऊँ क्षेत्र हेनरी रैमजे के शासन में रहा तथा यह युग ब्रिटिश सत्ता के शक्तिशाली होने के काल के रूप में पहचाना गया। जो भी प्रभाव यहाँ भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पड़े उन्हें कमिश्नर हेनरी रैमजे ने कठोरता से समाप्त कर दिया। इस दौरान कुमाऊँ के काली क्षेत्र (पूर्वी) में कालू मेहरा द्वारा गुप्त संगठन बनाये जाने और विद्रोह की तैयारियों के प्रमाण मिलते हैं और कालू मेहरा को उत्तराखण्ड का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी माना जाता है। हालाँकि कुछ विद्वान यह मानते हैं कि कालू मेहरा और उसके साठी अवध के विद्रोहियों के सम्पर्क में अवश्य थे किन्तु वे अंग्रेज़ों और अवध के बागियों दोनों से गुप्त रूप से मिले रहकर जिसकी जीत हो उसके साथ जाने की मंशा रखते थे। यह भी तर्क दिया जाता है कि वे केवल आर्थिक लाभ के लिये दोनों पक्षों से सम्पर्क में थे और स्वतंत्रता से उनका कुछ लेना देना नहीं था।मित्तल अरुण कुमार British Administration in Kumaon Himalayas: A Historical Study, 1815-1947 17-18 https://books.google.co.in/books?id=4kAOImX9PfwC&lpg=PA17&ots=d9k5IsC7IZ&dq=kaloo%20mehra%20kumaon&pg=PA17#v=onepage&q=kaloo%20mehra%20kumaon&f=false 6 जून 2015 https://web.archive.org/web/20160304211625/https://books.google.co.in/books?id=4kAOImX9PfwC&lpg=PA17&ots=d9k5IsC7IZ&dq=kaloo%20mehra%20kumaon&pg=PA17#v=onepage&q=kaloo%20mehra%20kumaon&f=false 4 मार्च 2016 live
कुमाऊँ कमिश्नरी के मैदानी क्षेत्र अवश्य इस दौरान ग़दर से प्रभावित रहे जो कमिश्नर रैमजे के लिये चिंता का विषय बने। जुलाई 1857 में बकरीद के मौके पर रामपुर में विद्रोह भड़कने और उससे नैनीताल के प्रभावित होने की आशंका से रैमजे ने ब्रिटिश औरतों और बच्चों को नैनीताल से हटा कर अल्मोड़ा भेज दिया था, हालाँकि रामपुर के नवाब अंग्रेज़ों के सहयोगी थे। नैनीताल पर कब्ज़ा करने का प्रथम प्रयास सितंबर 1857 में हुआ और 17 सितम्बर 1857 की एक घटना में मैदानी भाग में स्थित हल्द्वानी शहर पर विद्रोहियों ने कब्ज़ा भी कर लिया था जिसे बाद में अंग्रेजों ने वापस हासिल कर लिया। इस आक्रमण का नेतृत्व काला खान नामक विद्रोही कर रहा था।
इस प्रकार भारत के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष के बहुत उल्लेखनीय प्रभाव इस क्षेत्र में नहीं देखने को मिलते और कुल मिलाकर कमिश्नर रैमजे का शासनकाल शान्तिपूर्ण शासन का काल माना जाता है। इसी दौरान सरकार के अनुरूप समाचारों का प्रस्तुतीकरण करने के लिये 1868 में समय विनोद तथा 1871 में अल्मोड़ा अखबार की शुरुआत हुई।
काँग्रेस की स्थापना के बाद
1905 में बंगाल के विभाजन के बाद अल्मोडा के नंदा देवी नामक स्थान पर विरोध सभा हुई। इसी वर्ष कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में उत्तराखंड से हरगोविन्द पंत, मुकुन्दीलाल, गोविन्द बल्लभ पंत बदरी दत्त पाण्डे आदि युवक भी सम्मिलित हुए।
1906 में हरिराम त्रिपाठी ने वन्देमातरम् जिसका उच्चारण ही तब देशद्रोह माना जाता था उसका कुमाऊँनी अनुवाद किया।
भारतीय स्वतंत्रता आंन्देालन की एक इकाइ के रुप् में उत्तराखंड में स्वाधीनता संग्राम के दौरान 1913 के कांग्रेस अधिवेशन में उत्तराखंड के ज्यादा प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। इसी वर्ष उत्तराखंड के अनुसूचित जातियों के उत्थान के लिये गठित टम्टा सुधारिणी सभा का रूपान्तरण एक व्यापक शिल्पकार महासभा के रूप में हुआ।
कुमाऊँ परिषद
1916 के सितम्बर माह में हरगोविन्द पंत, गोविन्दबल्लभ पंत, बद्रीदत्त पाण्डे, इन्द्रलाल साह, मोहनसिंह दड़मवाल, चन्द्रलाल साह, प्रेमबल्लभ पाण्डे, भोलादत पाण्डे, लक्ष्मीदत्त शास्त्री आदि उत्साही युवकों के द्वारा कुमाऊँ परिषद की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य तत्कालीन उत्तराखण्ड की सामाजिक तथा आर्थिक समस्याआें का समाधान खोजना था। 1926 तक इस संगठन ने उत्तराखण्ड में स्थानीय सामान्य सुधारोंं की दिशा के अतिरिक्त निश्चित राजनैतिक उद्देश्य के रूप में संगठनात्मक गतिविधियां संपादित कीं। 1923 तथा 1926 के प्रान्तीय काउन्सिल के चुनाव में गोविन्दबल्लभ पंत हरगोविन्द पंत मुकुन्दी लाल तथा बद्रीदत्त पाण्डे ने प्रतिपक्षियों को बुरी तरह पराजित किया।
1926 में कुमाऊँ परिषद का कांग्रेस में विलीनीकरण कर दिया गया। 1927 में साइमन कमीशन की घोषणा के तत्काल बाद इसके विरोध में स्वर उठने लगे और जब 1928 में कमीशन देश में पहुॅचा तो इसके विरोध में 29 नवम्बर 1928 को जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में 16 व्यक्तियों की एक टोली ने विरोध किया जिस पर घुड़सवार पुलिस ने निर्ममता पूर्वक डंडो से प्रहार किया। जवाहरलाल नेहरू को बचाने के लिये गोविन्दबल्लभ पंत पर हुए लाठी के प्रहार के शारीरिक दुष्परिणाम स्वरूप वे बहुत दिनों तक कमर सीधी न कर सके थे। (संदर्भःनेहरू एन आटोबाइग्राफी)।
उत्तराखण्ड राज्य की नींव
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार मई १९३८ में तत्कालीन ब्रिटिश शासन में गढ़वाल के श्रीनगर में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों को अपनी परिस्थितियों के अनुसार स्वयं निर्णय लेने तथा अपनी संस्कृति को समृद्ध करकने के आंदोलन का समर्थन किया।
उत्तराखण्ड राज्य का गठन
सन २००० में अपने गठन से पूर्व यह उत्तर प्रदेश का एक भाग था। इसका निर्माण 9 नवम्बर 2000 को कई वर्षों के आन्दोलन के पश्चात भारत गणराज्य के सत्ताइसवें राज्य के रूप में किया गया था। सन २००० से २००६ तक यह उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था। जनवरी २००७ में स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिया गया।
इन्हें भी देखें
उत्तराखंड के शहीदों की सूची
पंडित कृष्णा नन्द उप्रेती
सन्दर्भ
श्रेणी:भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम
श्रेणी:उत्तराखण्ड