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सन्तराम बीए
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right|thumb|300px|सन्तराम बीए
संतराम बी.ए (14 फरवरी 1887 - ५ जून १८८८) एक आर्यसमाजी विद्वान एवं लेखक थे जिन्होंने समाजसुधार के अनेक कार्य किये। वे अपने क्रन्तिकारी विचारों, प्रबुद्ध लेखन, आध्यात्मिक दर्शन, एवं सामाजिक सुधारों के लिए जाने जाते हैं।
संतराम बी.ए 14 फरवरी 1887 को पंजाब के होशियारपुर जिले के डेरा बस्सी गाँव के एक सम्पन्न परिवार मे पैदा हुए थे। माता मालिनी देवी का देहांत बचपन में ही हो गया था। उनके पिता श्री राम दास गोहिल व्यवसायी के रूप में वे सुदूर कंधार, सिक्यांग तक यात्राएं किया करते थे। अपनी आत्मकथा मेरे जीवन के अनुभव में उन्होंने लिखा है कि उनके परिवार के लोग सम्पन्न थे। वे व्यापार करते थे। उनके पास खच्चर थे, जिन पर सामान लादकर बाहर के इलाकों में जाया करते थे।
वर्ष १९०९ में उन्होंने बीए (BA) की डिग्री हासिल किया और अपने नाम के सामने BA भी लिखना प्रारम्भ किया। हिन्दू धर्म के आडम्बरों की उन्होंने भर्त्सना की और दयानन्द सरस्वती के विचारों से प्रभावित होकर, अपने तरुणावस्था में ही आर्यसमाज में शामिल हो गये और अंत तक आर्य समाजी ही रहे।
कुम्हार जाति में पैदा होने के कारण विद्यार्थी जीवन में छात्रावास में उनके साथ अस्पृश्य सा व्यवहार द्विज छात्रों द्वारा किया जाता था। हिन्दू समाज से इस कोढ़ को दूर करने हेतु उन्होने १९२२ में "जात पात तोड़ो मंडल" नामक एक संगठन की स्थापना की, जिसके प्रधान भाई परमानन्द को बनाया गया और स्वयं सचिव के पद पर रहे। संतराम BA वेदों में वर्णित चार वर्णों को तो मानते थे,किन्तु इसे जन्मजात नहीं, अपितु कर्मों के आधार पर मानते थे। उनका मानना था कि कर्म के अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी भी वर्ण को धारित कर सकता है। जैसे शूद्र कुल में पैदा हुए बहुत से महापुरुष बाल्मीकि, वेदव्यास को ऋषियों मुनियों का दर्जा प्राप्त हुआ है। उन्होंने स्वयं अपनी आत्मकथा "मेरे जीवन के अनुभव" में उद्घाटित किया है कि किस प्रकार एक ही वंश के लोग किसी स्थान पर क्षत्रिय हैं और दूसरे स्थान पर अपने कार्यों के अनुसार कुम्हार या वैश्य हैं।
संतराम जी जन्मजात वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था के खिलाफ थे और इसे वे लोगों के मानसिक चिंतन एवं सोच को बदलकर ख़त्म करना चाहते थ। इसके लिए उन्होंने अनेकों लेख लिखे, पुस्तकें लिखी और 'जात-पात तोड़ो मंडल' की स्थापना की। उन्होंने अपनी पुस्तक 'हमारा समाज' में लिखा हैकि महान सम्राट अशोक ने समाज की सोच, बौद्ध धम्म के प्रचार एवं प्रसार के द्वारा भारत में वर्ण व्यवस्था एवं जातीयता समाप्त कर दी थी। अशोक ने तत्कालीन समाज की सोच एवं चिंतन को बौद्ध धम्म कि उपदेशों का प्रचार और प्रसार कर, देश एवं विदेश में शिला लेखों एवं स्तूपों पर बौद्ध धर्म के उपदेशों को लिखवाकर बदल डाला और बगैर युद्ध के भारत का साम्राज्य कंधार से इंडोनेशिया तक फैलाया जो ब्रिटिश भारत से भी बड़ा था।
सन्तराम बीए का विशेष बल अंतर्जातीय विवाह और जन मानस के विचारों में परिवर्तन लाकर जाति प्रथा को समाप्त करने का था। उन्होंने स्वयं अपनी पुत्री का विवाह अंतर्जातीय किया था।सन्तराम बीए के बारे में आप क्या जानते हैं?
संतराम BA वर्ष १९८१ से १९८९६ तक पंजाब राज्य के विधान परिषद् के सदस्य भी रहे।
इन्हें भी देखें
वर्ण व्यवस्था
जाति
अस्पृश्यता (छुआछूत)
सन्दर्भ
श्रेणी:आर्य समाज
श्रेणी:भारतीय समाज सुधारक