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411 समाचार
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भारत में बौद्ध धर्म का पतन

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right|thumb|300px|सोमनाथपुर के चेन्नकेशव मन्दिर में विष्णु के अवतार के रूप में बुद्ध की प्रतिमा भारत में बौद्ध धर्म का जन्म ईसा पूर्व छठी शताब्दी को हुआ था किन्तु कालक्रम में भारत से बौद्ध धर्म लगभग समाप्त हो गया जबकि विश्व के अन्य भागों में बौद्ध धर्म का प्रसार एवं विकास होता रहा है। भारत में बौद्ध धर्म का पतन आश्चर्यजनक लगता है, विशेषतः तब जब विश्व के अन्य भागों में बौद्ध धर्म बचा रहा या उसका प्रसार हुआ। फिर भी भारत में बौद्ध धर्म के पतन के अनेक कारण गिनाये जाते हैं, जिनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं- (१) हिन्दू धर्म में सुधार : हिन्दू धर्म के असंख्य देवी-देवता हैं। अतः उन्होंने गौतम बुद्ध को भी अवतार मानकर उसकी भी पूजा अर्चना शुरू कर दी। इनके कुछ सिद्धान्तों जैसे सत्य और अहिंसा को ग्रहण कर लिया। ब्राह्मणों एवं हिन्दू विद्वानों के समय पर चेत जाने के कारण हिन्दू धर्म का विघटन रुक गया। जो लोग हिन्दू धर्म छोड़कर चले गये थे उसे उन्होंने पुनः स्वीकार कर लिया। (२) हूणों का आक्रमण : बौद्धों की अधिकतम हानि हूणों द्वारा हुई। उन्होंने हजारों भिक्षुओं को मौत के घाट उतार दिया। उनके मठों को खण्डहर बना दिया गया। तक्षशिला आदि विश्वविद्यालयों को आग लगा दी तथा बौद्ध साहित्य को जला दिया गया। इस प्रकार से पंजाब, राजपूताना एवं उत्तर पश्चिमी सीमा प्रान्त से बौद्धों का सफाया हो गया था। (३) बौद्ध धर्म का विभाजन : कनिष्क के काल में बौद्ध धर्म का विभाजन हीनयान और महायान के रूप में हो गया था। महायान शाखा को मूर्तिपूजा की छूट दी गई जिसके फलस्वरूप कई लोगों ने फिर से इस धर्म में प्रवेश पा लिया, जो पहले इसे छोड़ चुके थे। (४) बौद्ध मठों में भ्रष्टाचार : मठों में सुख-सुविधाओं के मिल जाने तथा स्त्रियों को भिक्षुणी बनाने की छूट दिये जाने के कारण मठों में भ्रष्टाचार फैल गया। भिक्षु तथा भिक्षुणियाँ धार्मिक कार्यों की आड़ में विषय-वासनाओं में लग गये। उनका चरित्र भ्रष्ट हो गया। उनके सब त्याग, तपस्या व आदर्श मिट्टी में मिल गये। गौतम बुद्ध के उपदेशों को भूलकर थे वासनाओं में लिप्त हो गये जिससे समाज पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। (५) राजकीय सहायता का न मिलना : कनिष्क की मृत्यु के पश्चात् बौद्धों को राजकीय सहायता मिलनी बन्द हो गई। गुप्त साम्राज्य के आ जाने के कारण हिन्दू धर्म का बढ़ावा मिलना प्रारम्भ हो गया। उधर बौद्ध धर्म धनाभाव के कारण अधिक दिनों तक नहीं चल सका। (६) बौद्ध धर्म में जटिलता आना : बौद्धों ने हिन्दुओं के कई सिद्धान्त ग्रहण कर लिये थे। जन-साधारण की भाषा को छोड़कर वे संस्कृत में साहित्य रचना करने लगे थे। अतः यह धर्म जनता की समझ से बाहर होने लगा था। (७) हिन्दू दार्शनिकों का प्रभाव : कुमारिल भट्ट और शंकराचार्य जैसे हिन्दू विद्वानों के मैदानों में आ जाने से बौद्ध विद्वानों की दाल गलनी बंद हो गई थी। वे इन सिद्धान्तों के तर्कों के सामने नहीं ठहर पाते थे। (८) राजपूत शक्ति का विस्तार : सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी तक सारे उत्तरी भारत में राजपूतों की सत्ता छा गई। राजपूत शक्ति के उपासक थे वे अहिंसा को कायरता मानते थे। उनका मत था कि बौद्ध मत में अहिंसा का अर्थ मृत्यु को बुलावा देना होता है, अतः अहिंसा आदि सिद्धान्त ताक पर रख दिये गये। इससे बौद्ध धर्म का प्रचार कार्य बन्द होने लगा और वे विदेशों में जाने लगे। (९) मुसलमानों के आक्रमण : बारहवीं शताब्दी में महमूद गजनवी और अन्य आक्रमणकारियों ने भारत पर आक्रमण किये। बौद्धों में उनके आक्रमण का मुकाबला करने का साहस न था। अतः वे या तो मारे गये, या निकटवर्ती क्षेत्रों जैसे नेपाल, तिब्बत, बर्मा, श्रीलंका आदि में चले गये। बौद्ध धर्म के भारत में पतन को आन्तरिक कारणों और बाह्य कारणों में विभाजित करके भी देखा जा सकता है। आन्तरिक कारण कुछ विद्वानों के कथनानुसार भारतवर्ष से बौद्ध धर्म के लोप हो जाने का कारण बौद्ध विहारो में अनैतिकता का बढ़ना, मोर्य सम्राटों एवं दूसरे बौद्ध राजाओं द्वारा बौद्ध भिक्षुओं का संरक्षण लेकिन अन्य धर्मो का तिरस्कार एवं दमन करना, जिसके कारण वैदिक एवं अन्य धर्म के लोगों में असंतोष बढ़ने लगा और वह बौद्ध धर्म का विरोध करने लगे। बौद्ध धर्म के पूर्व कोई विशेष धर्म नही था। लोग माता पिता और गुरु को ईश्वर मानते थे। बौद्ध धर्म का आगमन के शुरु में इसको अधिक बढ़ावा नहीं मिला। मौर्यकाल में चुकि सम्राट अशोक एवं उसके अधीन राजाओं ने बौद्ध धर्म को अपना राजधर्म बना लिया था जिसके कारण अन्य धर्मों पर अत्याचार होने लगे थे। बौद्ध ग्रंथ 'दिव्यावदान' के अनुसार सम्राट अशोक जैन मुनि एवं ऋषियों के सर काट कर लाने वालो को स्वर्ण मुद्रा देने की घोषणा की थी, मौर्य सम्राज्य में बौद्ध भिक्षुओं को राजदरबार में आदर एवं उच्च स्थान प्राप्त होता था, जिसके कारण बौद्ध धर्म का तेजी से विस्तार हुआ। जैसे ही बौद्ध पर मोर्य शासकों का संरक्षण खत्म हुआ इसका पतन शुरू हो गया। पुष्यमित्र शुंग जब अंतिम मोर्य सम्राट बृहद्रथ मौर्य की हत्या करके राजा बना तो उसके पश्चात बौद्ध भिक्षुओं को राजकीय महत्व नहीं मिला। जिसके परिणाम स्वरूप नये सम्राट के विरुद्ध बौद्ध विहारो में षड़यंत्र होने लगे और यवनों को भारत पर आक्रमण करने के लिए बौद्ध मठों द्वारा आमंत्रित किया गया। परिणाम स्वरूप पुष्यमित्र शुंग ने स्वयं जाकर यवनों (युनानियों) को फिर से सिंधू नदी के पार भगा दिया और कई बौद्ध मठों को नष्ट कर दिया। शुंग वंश के शासन के दौरान वैदिक धर्म फिर से फलफुलने लगा था। पुष्यमित्र शुंग के विषय में धारणा है कि वह बौद्ध धर्म का विरोधी था। लेकिन यह सत्य प्रतीत नहीं होता हैं, पुष्यमित्र शुंग के बारे में बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान में कहाँ है कि पुष्यमित्र ने बौद्ध भिक्षुओं के सर काट के लाने वाले को दीनार(स्वर्ण मुद्रा) देने की घोषणा की थी, लेकिन इसी बौद्ध ग्रंथ के अशोकवदान खंड में यही बात सम्राट अशोक के लिए भी कही थी। दुसरी बात उस काल में भारत में दीनार का प्रचलन नहीं था, संभवतः यह बात बौद्ध ग्रंथों में बहुत बाद में जोड़ी हुई प्रतीत होती हैं। पुष्यमित्र शुंग ने सांची के स्तूप सहित कई बौद्ध स्तुपों का जीर्णोध्दार किया था, उसके दरबार में बौद्ध भिक्षु भी थे। उसने केवल उन्हीं बौद्ध मठों पर आक्रमण किया था, जिन्होंने सम्राट बनने पर उसके विरुद्ध विद्रोह किया था एवं आक्रमणकारी यवनों को संरक्षण दिया था। शुंग वंश के पश्चात कई बौद्ध राजा हुये उनके राज्य में बौद्ध धर्म बड़ता रहा। कनिष्क के शासन काल में बौद्ध संगीति हुई लेकिन उसके पश्चात बहुत समय तक कोई भी बौद्ध संगीति का आयोजन नहीं किया जा सका। बौद्ध धर्म में भी वैदिक धर्म की तरह ही बुद्ध की मुर्ति पुजा, कर्मकांडो का अधिकाधिक प्रचलन और ग्रंथों का संस्कृत में अनुवाद शुरू हो गया था, जिससे जैसे वैदिक धर्म ब्राह्मण केंद्रित था तो बौद्ध धर्म भी बौद्ध विहार केंद्रित होने लगा था । सातवीं सदी आते आते बौद्ध धर्म में अनेक कुरीतियाँ आ गई थी, वैदिक धर्म की तरह कर्मकांड इसमें शामिल हों गये थे। बौद्ध धर्म अपनी वास्तविक पहचान खोते जा रहा था, कई बौद्ध भिक्षु स्वयं अपने धर्म को लेकर संशय में थे। उसी समय कुमारिल भट्ट और आदि शंकराचार्य जैसे विद्वानों ने मीमांसा और वेदांत जैसे दर्शनों का प्रतिपादन करके वैदिक धर्म को बढ़ाया। आदि शंकराचार्य ने शास्त्राथ में अनेक बौद्ध भिक्षुओं और मठाधीशों को पराजित कर अपना अनुयायी बना लिया, और फिर इन्हीं बौद्ध मठों से वैदिक धर्म का प्रसार होने लगा। वैदिक धर्म में अन्य धर्म एवं संप्रदायों के दर्शन एवं परम्पराओं को मान्यता दी जाने लगी। विभिन्न संप्रदायों की दंत कथाओं का संकलन करके या तो पुरानों और ग्रंथों में इनको शामिल किया गया अथवा नये ग्रंथों की रचना हुई। वैदिक धर्म में अन्य धर्म और संप्रदाय के संमिश्रण के कारण इसका स्वरूप भी कुछ बदल गया जिसको हम आज हिन्दू धर्म कह सकते हैं। कई सम्प्रदाय और पंथों के संमिश्रण ने हिन्दू धर्म में एक जटिल जाति व्यवस्था को जन्म दिया जिसके कारण इसमें सामाजिक भेदभाव और शोषण को भी बढ़ावा मिला। बाद के वर्षो में में कई हिन्दू संतो ने लोगों के बीच आसान और कर्मकांड रहित भक्ति मार्ग का प्रसार किया, जिससे हिन्दू धर्म आम लोगों के मध्य तेजी से पहुंचा। जिससे बौद्ध धर्म भारत से लगभग समाप्त हो गया एवं अधिकांशतः बौद्ध विहारो तक ही सीमित हो कर रह गया। बौद्ध धर्म सम्राट अशोक और उसके उत्तराधिकारियों के संरक्षण में अकस्मात् इतना बड़ गया था कि देश भर में छा गया, लेकिन जैसे ही बौद्ध धर्म से राजाओं का संरक्षण खत्म हुआ वह निर्बल पड़ने लगा और भारत में उसकी जड़े उखड़ते भी देर न लगी। विदेशी आक्रमण मौर्य साम्राज्य के पतन के साथ ही भारत में बौध्द धर्म कमजोर होने लगा था, साथ ही वैदिक धर्म का प्रसार फिर से बढ़ रहा था। वैदिक धर्म में भारत के अन्य धर्म और सम्प्रदाय ही नहीं विदेशी आक्रमणकारियों के दर्शनों और सिधांतों को भी आदर दिया जाने लगा था और यह वैदिक धर्म का हिस्सा बनते जा रहे थे, इससे वैदिक धर्म की व्यापकता बड़ने लगी थी। मौर्य सम्राज्य के पतन के बाद अनेक बौद्ध और हिन्दू राजा हुयें उन्होनें अपने अपने धर्म को संरक्षण तो दिया लेकिन धर्मप्रसार के लिए मौर्यों की तरह दुसरे धर्मो को क्षति नहीं पहुँचाई। यही कारण है कि मौर्य शासन के बाद भी बौध्द एवं वैदिक धर्म बहुत समय तक सह-अस्तित्व में रहे, उनमें प्रतिस्पर्धा केवल अपने अपने दर्शन को पुनःस्थापित करने के लिए थी। गुप्त काल में बौद्ध धर्म के मुकाबले वैदिक धर्म का खुब विकास हुआ, तो कुषाण एवं हर्षवर्धन के समय में बौद्ध धर्म ने फिर से अपनी प्रतिष्ठा प्राप्त करने की कोशिश की। बौद्ध और हिन्दू धर्म को सबसे अधिक नुकसान बार बार हुए विदेशी आक्रमणों से हुआ। पहले से ही कमजोर हो चुका बौद्ध धर्म इन आक्रमणों के बाद पुरी तरह नहीं संभल पाया। पाँचवी शताब्दी ईसवी के अंत में पश्चिमोत्तर भारत (आज के पाकिस्तान और अफगानिस्तान) पर मध्य एशिया (अथवा कुछ संदर्भों में उत्तरी चीन) की प्रजाति हूणों ने तोरामन के नेतृत्व मे हमला कर दिया। गुप्त राजा स्कंदगुप्त की सेना ने उसको खदेड़ दिया लेकिन उसने वहाँ पर काफी लूटपाट और विध्वंस किया था। उसके कुछ वर्षों बाद तोरामन के पुत्र मिहिरकुल ने फिर से आक्रमण कर दिया और मालवा से लेकर मध्य एशिया तक अपने राज्य की स्थापना कर ली। इसने बड़ी ही क्रुरता से आक्रमण किया एवं कई बौद्ध विहार और हिन्दू एवं जैन मंदीरों को नष्ट कर दिया। इसने तक्षशीला के बौद्ध विहारो पर बहुत क्रुरता की और लगभग उनको नष्ट कर दिया और ग्रंथों को जला दिया। तक्षशीला बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण स्थल था, यह भारत, मध्य एशिया और चीन को बोद्ध धर्म से आपस में जोड़ने वाला केंद्र था। कहते हैं कि मिहिरकुल बौद्ध बनना चाहता था लेकिन उसकी हिंसक प्रवृति के कारण तिरस्कार स्वरुप बौद्ध भिक्षुओं ने एक कनिष्ठ भिक्षु को उसे बौध शिक्षा देने के लिए उसके दरबार में भेज दिया, इसका पता चलने पर मिहिरकुल ने इसे अपना अपमान समझा। इसके बाद प्रतिशोध स्वरूप उसने बौध्दों पर बहुत हत्याचार किया। मिहिरकुल ने मथुरा में हिन्दू मंदीरों भी नष्ट किया था, जिसके कारण उसे हिन्दू ग्रंथों में मलेच्छ भी कहा गया है। शायद बाद में वह शिवभक्त बन गया था जिसका पता उसकी मुद्रा पर ऋषभ की आकृति से चलता है। मिहिरकुल की मृत्यु के बाद हूण भारत में ही बस गये और वैदिक धर्म अपना लिया। हूणों के बाद भी भारत पर हमले होते रहे लेकिन यह पश्चिमोत्तर भारत तक ही सीमित रहे। भारत पर अभी तक हुए विदेशी आक्रमणों का उद्देश्य अधिकांशतः लूटपाट था, धार्मिक स्थलों पर हुये आक्रमण भी इसी का हिस्सा थे। लेकिन केवल लूटपाट ही नहीं भारत की धार्मिक व्यवस्था और स्थानीय संस्कृति को नष्ट करने के उद्देश्य से अरब और तुर्क के मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत पर हमला किया जिसने बौद्ध और हिन्दू धर्म ही नहीं भारत की संस्कृति को भी बहुत नुकसान पहुँचाया मुस्लिम आक्रांताऔं ने भारत में हजारों मंदिर और बौद्ध विहारों को नष्ट कर दिया। बख्तियार खिलजी ने नालंदा के बौद्ध विहार और नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया और पुस्तकालय को जला दिया। इसके पश्चात भी बहुत से मुस्लिम आक्रांता एवं शासक भारत आये और भारत पर शासन ही नहीं किया बल्कि यहां की संस्कृति और धार्मिक स्थलों को नष्ट करते रहे और लोगों को मुसलमान बनाते रहे। इन नर संहारों और विध्दवंशों का उल्लेख तत्कालिक मुस्लिम लेखकों ने भी इन आक्रांताओं और शासकों की गौरव गाथाओं में किया है। कालांतर में स्थानीय हिन्दू राजाओं के संरक्षण में कई मंदिरों का पुनः निर्माण तो फिर से हो गया लेकिन बौद्ध धर्म को ऐसा संरक्षण नहीं मिला और भारत से बौद्ध धर्म लगभग समाप्त हो गया। बाह्य कारण इसके अन्तर्गत मध्य एशिया से आये श्वेत हूण तथा मंगोल, मुस्लिम शासक मुहम्मद बिन कासिम, महमूद ग़ज़नवी तथा मोहम्मद ग़ोरी इत्यादि को माना जा सकता है। भारत के उत्तरी पूर्व भाग से आने वाले श्वेत हूण तथा मंगोलो के आक्रमणों से भी बौद्ध धर्म को बहुत हानि हुई। मुहम्मद बिन कासिम का सिन्ध पर आक्रमण करने से भारतीयों का पहली बार इस्लाम से परिचय हुआ। चूँकि सिन्ध का शासक दाहिर एक, बौद्धीस्ट प्रजा पर शासन करने वाला अलोकप्रिय शासक था, अतः राजा दाहिर को मुहम्मद ने हरा दिया। महमूद गजनवी ने १० वी शताब्दी ईसवी में बुद्धिस्ठ एवम ब्राम्हण दोनो धर्मो के धार्मिक स्थलो को तोडा एवं सम्पूर्ण पंजाब क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। इस प्रकार से बहुत से बौद्ध नेपाल एवं तिब्बत की ओर भाग गये। अंग्रेज अफसर हचिसन के अनुसार तुर्किश जनरल मुहम्मद बख्तियार खिल्जी के द्वारा भी बडी मात्रा में बुद्धिस्ट भिक्खुओ का कत्लेआम किया गया था। मंगोलो में चंगेज खान ने सन १२१५ में अफगानिस्तान एवम समस्त मुस्लिम देशों में तबाही मचा दी थी, उसकी मौत के बाद उसका साम्राज्य दो भागो में बट गया। भारतीय सीमा पर चगताई ने चगताई साम्राज्य खडा किया तथा ईरान प्लातु पर हलाकु खान ने अपना साम्राज्य बनाया जिसमे हलाकु के पुत्र अरघुन ने बौद्ध धर्म अपना कर इसे अपना राजधर्म बनाया था। उसने मुस्लिमों की मस्जिदो को तोड्कर स्तुप निर्माण कराये थे। बाद में उस्के पुत्र ने फिर से इस्लाम को अपना राजधर्म बना लिया। तैमुरलङ ने १४ वी सदी में लगभग सारे पश्चिम एवम मध्य एशिया को जीत लिया था, तेमुर ने बहुत से बुद्धिस्ट स्मारक तोडे एवम बुद्धिस्टो को मारा। आज बौद्ध धर्म अनेक दूरवर्ती देशों में फैला हुआ है और जिसके अनुयायियों की संख्या विश्व में चौथे स्थान पर है किन्तु भारत में अधिकांश अन्य धर्म वालों से बहुत कम हो गयी है। इसका भारत से इस प्रकार लोप हो जाना बड़ा हि दुर्भाग्यजनक हुआ है। लोग बौद्ध धर्म को पूर्ण रूप से एक विदेशी- धर्म ही मानने लगे थे किन्तु १४ अक्तुबर १९५६ को दलितो के नेता डा.भीमराव अम्बेड्कर ने हिन्दु धर्म में व्याप्त छूआछुत से तङ आकर अपने लगभग १० लाख अनुयायियो के साथ भारत के ईस प्राचीन एवम समानता पर आधारित धर्म को अपनाकर, बौद्ध धर्म को पुनः उसकी उसी जन्मभुमि पर पुनर्जीवित कर दिया है तथा आज महारास्ट्र, उत्तर प्रदेश एवं देशभर के दलीत बौद्ध धर्म को मानने वाले बन गये हैं। इस विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि संसार के सभी प्रमुख धर्म लोगों को निम्न स्तर के जैविक मुल्यो से निकालकर उच्च मुल्यो को प्राप्त करने के उद्देश्य से स्थापित किए गए हैं। पारसी, यहूदी, ईसाई, इस्लाम आदि मजहब आज चाहे जिस दशा में हों पर आरंभ में सबने अपने अनुयायियों को जीवन के श्रेष्ठ मुल्यो पर चलाकर उनका कल्याण साधन ही किया था। पर काल- क्रम से सभी में कुछ व्यक्तियों या समुदाय विशेष की स्वार्थपरता के कारण विकार उत्पन्न हुए और तब उनका पतन होने लगा। तब फिर किन्हीं व्यक्तियों के हृदय में अपने धर्म की दुरावस्था का ख्याल आया और वे लोगों को गलत तथा हानिकारक मार्ग से हटाकर धर्म- संस्कार का प्रयत्न करने लगे। बुद्ध भी इस बात को समझते थे और इसलिए यह व्यवस्था कर गये थे कि प्रत्येक सौ वर्ष पश्चात् संसार भर के बौद्ध प्रतिनिधियों की एक बडी़ सभा की जाए और उसमें अपने धर्म तथा धर्मानुयायियों की दशा पर पूर्ण विचार करके जो दोष जान पडे़ उनको दूर किया जाए और नवीन समयोपयोगी नियमों को प्रचलित किया जाए। इस उद्देश्य की सिद्धी के लिए अगर आवश्यक समझा जाए तो पुरानी प्रथाओं और नियमों से कुछ छोटी-मोटी बातों को छोडा़ और बदला जा सकता है। बौद्ध धर्माचार्यों द्वारा इसी बुद्धिसंगत व्यवस्था पर चलने और रूढि़वादिता से बचे रहने का यह परिणाम हुआ कि बौद्ध धर्म कई सौ वर्ष तक निरंतर बढ़ता रहा और संसार के दूरवर्ती देशों के निवासी आग्रहपूर्वक इस देश में आकर उसकी शिक्षा प्राप्त करके अपने यहाँ उसका प्रचार करते रहे। जीवित और लोक- कल्याण की भावना से अनुप्राणित धर्म का यही लक्षण है कि वह निरर्थक या देश- काल के प्रतिकूल रीति- रिवाजों के पालन का प्राचीनता या परंपरा के नाम पर वह आग्रह नहीं करता। वरन् सदा आत्म- निरीक्षण करता रहता है और किसी कारणवश अपने धर्म में, अपने समाज में अपनी जाति में यदि कोई बुराई, हानिकारक प्रथा-नियम उत्पन्न हो गए हों तो उनको छोड़ने तथा उनका सुधार करने में आगा- पीछा नहीं करता। इसलिए बुद्ध की सबसे बडी़ शिक्षा यही है कि-मनुष्यों को अपना धार्मिक, सामाजिक आचरण सदैव कल्याणकारी और समयानुकूल नियमों पर आधारित रखना चाहिए। जो समाज, मजहब इस प्रकार अपने दोषों, विकारों को सदैव दूर करते रहते हैं, उनको ही 'जिवित' समझना चाहिए और वे ही संसार में सफलता और उच्च पद प्राप्त करते हैं। वर्तमान समय में हिंदू धर्म में जो सबसे बडी़ त्रुटि उत्पन्न हो गई है। वह यही है कि इसने आत्म- निरीक्षण की प्रवृत्ति को सर्वथा त्याग दिया है और 'लकीर के फकीर' बने रहने को ही धर्म का एक प्रमुख लक्षण मान लिया है। अधिकांश लोगों का दृष्टिकोण तो ऐसा सीमित हो गया है कि वे किसी अत्यंत साधारण प्रथा- परंपरा को भी, जो इन्हीं सौ-दो सौ वर्षों में किसी कारणवश प्रचलित हो गई है। पर आजकल स्पष्टतः समय के विपरीत और हानिकारक सिद्ध हो रही है, छोड़ना 'धर्म विरुद्ध समझते' हैं। इस समय बाल- विवाह, मृत्युभोज, वैवाहिक अपव्यय, छुआछूत, चार वर्णों के स्थान पर आठ हजार जातियाँ आदि अनेक हानिकारक प्रवृत्तियाँ हिन्दू समाज में घुस गई हैं, पर जैसे ही उनके सुधार की बात उठाई जाती है, लोग 'धर्म के डूबने की पुकार, मचाने लग जाते हैं बुद्ध भगवान् के उपदेशों पर ध्यान देकर हम इतना समझ सकते है कि- वास्तविक धर्म आत्मोत्थान और चरित्र- निर्माण में है, न कि सामाजिक लौकिक प्रथाओं में। यदि हम इस तथ्य को समझ लें और परंपरा तथा रुढि़यो के नाम पर जो कूडा़-कबाड़ हमारे समाज में भर गया है। उसे साफ कर डालें तो हमारे सब निर्बलताएँ दूर करके प्राचीन काल की तरह हम फिर उन्नति की दौड़ में अन्य जातियों से अग्रगामी बन सकते हैं। इन्हें भी देखें भारत में बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान बौद्ध धर्म का इतिहास विश्व में बौद्ध धर्म बाहरी कड़ी बौद्ध धर्म - बौद्ध की सम्पूर्ण जानकारी https://web.archive.org/web/20221009230707/https://www.freejankari.com/2021/04/baudh-dharm.html 9 अक्तूबर 2022 बौद्ध धर्म के पतन के कारण https://web.archive.org/web/20221003163340/https://sarwar0.blogspot.com/2021/10/blog-post_11.html 3 अक्तूबर 2022 बौद्ध धर्म के पतन के कारण (गायत्री परिवार) Buddhism: Origin, Spread and Decline - Pankaj Jain, Ph.D. बौद्ध धर्म का पतन (चौथी दुनिया) Archives of Alexander Berzin: Historical Cultural and Comparative Studies (बौद्ध इतिहास और बौद्ध धर्म एवं इस्लाम के मध्य संपर्क पर चर्चा सहित) Revolution and Counter-Revolution in Ancient India by Bodhisattva Dr. B. R. Ambedkar श्रेणी:बौद्ध धर्म का इतिहास श्रेणी:भारत का इतिहास श्रेणी:भारत में बौद्ध धर्म