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नरोत्तमदास ठाकुर
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नरोत्तमदास ठाकुर (सं. १५८५ की माघ पूर्णिमा -- सं. १६६८ की कार्तिक कृष्ण ४) भक्त कवि तथा संगीतज्ञ थे। उन्होने ओड़ीसा तथा बंगाल में गौडीय भक्ति का प्रसार किया।
नरोत्तमदास ठाकुर, राजा कृष्णनन्ददत्त के पुत्र थे। इनका जन्मस्थान परगना गोपालपुरा था जो वर्तमान समय में बांग्लादेश के राजशाही जिला के अंतर्गत आता है। माता का नाम नारायणीदेवी था। ये कायस्थ जाति के थे तथा पद्मा नदी के तटस्थ खेतुरी इनकी राजधानी थी। इनका जन्म सं. १५८५ की माघ पूर्णिमा को हुआ था। यह जन्म से ही विरक्त स्वभाव के थे। १२ वर्ष की अवस्था ही में इन्हें स्वप्न में श्री नित्यानन्द के दर्शन हुए और उसी प्रेरणानुसार यह पद्मा नदी में स्नानार्थ गए। यहीं इन्हें भगवत्प्रेम की प्राप्ति हुई। पिता की मृत्यु पर यह अपने चचेरे भाई संतोषदत्त को सब राज्य सौंपकर कार्तिक पूर्णिमा को वृन्दावन चल दिए। यह वृंदावन में श्री जीव गोस्वामी के यहाँ बहुत वर्षों तक भक्तिशास्त्र का अध्ययन करते रहे। यहीं इन्होंने श्री लोकनाथ गोस्वामी से श्रावणी पूर्णिमा को दीक्षा ली और उनके एकमात्र शिष्य हुए। सं. १६३९ में श्रीनिवासाचार्य तथा श्यामानंद जी के साथ ग्रंथराशि लेकर यह भी बंगाल लौटे। विष्णुपुर में ग्रंथों के चोरी जाने पर यह खेतुरी चले आए। यहाँ से एक कोस पर इन्होंने एक आश्रम खोला, जिसका नाम 'भजनटूली' था। इसमें श्री गौरांग तथा श्रीकृष्ण के छह श्रीविग्रह प्रतिष्ठापित कर सं. १६४० में महामहोत्सव किया। इन्होंने संकीर्तन की नई प्रणाली निकाली तथा "गरानहाटी" नामक सुर का प्रवर्तन किय। यह भक्त सुकवि तथा संगीतज्ञ थे। 'प्रार्थना', 'प्रेमभक्ति चंद्रिका' आदि इनकी रचनाएँ हैं।
इनका शरीरपात सं. १६६८ की कार्तिक कृ. ४ को हुआ और इनका भस्म वृंदावन लाया गया, जहाँ इनके गुरु लोकनाथ गोस्वामी की समाधि के पास इनकी भी समाधि बनी। इनके तथा इनके शिष्यों के प्रयत्न से उत्तर बंग में गौड़ीय मत का विशेष प्रचार हुआ।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
नरोत्तम दास (हिन्दी कवि)
श्रेणी:भक्त कवि