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प्राणचंद चौहान
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प्राणचंद चौहान भक्तिकाल के कवि थे। 'रामायण महानाटक' उनकी प्रसिद्ध कृति है। इनके व्यक्तित्व पर पर्याप्त विवरण नहीं मिलता है।http://leasure.iecit.in/?paged=13 संग्रहीत प्रति 9 अगस्त 2014 https://web.archive.org/web/20140809145350/http://leasure.iecit.in/?paged=13 9 अगस्त 2014 dead http://gandhigyan.gvpwardha.in/digital/?p=170 https://web.archive.org/web/20140811012454/http://gandhigyan.gvpwardha.in/digital/?p=170 11 अगस्त 2014 रामभक्ति पंथी शाखा के प्रमुख कवि Indian Literature भारतीय साहित्य http://books.google.co.in/books?id=dqGojPpe8DIC&pg=PA619 619 नागेन्द्र प्रभात प्रकाशन 1988 9 अगस्त 2014 https://web.archive.org/web/20140811013706/http://books.google.co.in/books?id=dqGojPpe8DIC&pg=PA619 11 अगस्त 2014 live
पं. रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, संस्कृत में रामचरित संबंधी कई नाटक हैं जिनमें कुछ तो नाटक के साहित्यिक नियमानुसार हैं और कुछ केवल संवाद रूप में होने के कारण नाटक कहे गए हैं। इसी पिछली पद्धति पर संवत 1667 (सन् 1610ई.) में प्राणचंद चौहान रामायण महानाटक लिखा।रामचंद्र शुक्ल विश्वनाथ प्रसाद तिवारी नेशनल पब्लिशिंग हाउस १९८५ १६६
प्राणचन्द की रचना का ढंग नीचे उद्धृत अंश से ज्ञात हो सकता है-
कातिक मास पच्छ उजियारा । तीरथ पुन्य सोम कर वारा॥ता दिन कथा कीन्ह अनुमाना । शाह सलेम दिलीपति थाना॥
संवत् सोरह सै सत साठा । पुन्य प्रगास पाय भय नाठा॥जो सारद माता कर दाया । बरनौं आदि पुरुष की माया॥
जेहि माया कह मुनि जग भूला । ब्रह्मा रहे कमल के फूला॥निकसि न सक माया कर बाँधा । देषहु कमलनाल के राँधा॥
आदिपुरुष बरनौं केहिभाँती । चाँद सुरज तहँ दिवस न राती॥निरगुन रूप करै सिव धयाना । चार बेद गुन जेरि बखाना॥
तीनों गुन जानै संसारा । सिरजै पालै भंजनहारा॥श्रवन बिना सो अस बहुगुना । मन में होइ सु पहले सुना॥
देषै सब पै आहि न ऑंषी । अंधकार चोरी के साषी॥तेहि कर दहुँ को करै बषाना । जिहि कर मर्म बेद नहिं जाना॥
''माया सींव भो कोउ न पारा । शंकर पँवरि बीच होइ हारा॥
सन्दर्भ
श्रेणी:कवि
श्रेणी:भक्तिकाल के कवि