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हेलियोस्फीयर
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thumb|right|300px|हेलियोस्फीयर के घटकों का आरेख। इसक आकार गलत हो सकता है।
सूर्य से लाखों मील प्रति घंटे के वेग से चलने वाली सौर वायुसोलर विंड https://web.archive.org/web/20180621193958/https://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/gyan/67-75-83062.html 21 जून 2018 । हिन्दुस्तान लाइव। २७ नवम्बर २००९ सौरमंडल के आसपास एक सुरक्षात्मक बुलबुला निर्माण करती हैं। इसे हेलियोस्फीयर कहा जाता है। यह पृथ्वी के वातावरण के साथ-साथ सौर मंडल की सीमा के भीतर की दशाओं को तय करती हैं।सोलर विंड 50 सालों में सबसे कमजोर https://web.archive.org/web/20110823195413/http://navbharattimes.indiatimes.com/rssarticleshow/3523746.cms?prtpage=1 23 अगस्त 2011 । नवभारत टाइम्स। २४ सितंबर २००८ हेलियोस्फीयर में सौर वायु सबसे गहरी होती है। पिछले ५० वर्षों में सौर वायु इस समय सबसे कमजोर पड़ गई हैं। वैसे सौर वायु की सक्रियता समय-समय पर कम या अधिक होती रहती है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है।
हेलियोपॉज़
right|thumb|300px|हेलियोपॉज़ हेलियोस्फीयर और सौर मंडल के बाहर के अंतरतारकीय माध्यम के बीच की सीमा बनाता है। हेलियोपॉज़ के निकट आते ही सौर वायु धीमी होती जाती है और शॉक वेव जैसी बनती है, जिसे सौर वायु का टर्मिनेशन शॉक कहते हैं।
सौर वायु की बौछार सौर-मंडल के प्रत्येक ग्रह पर अपना प्रभाव छोड़ती है। इसके साथ ही यह सौरमंडल और बाहरी अंतरिक्ष के बीच एक सीमा रेखा भी बनाती है। इस सीमा को हेलियोपॉज कहते हैं। यह आकाशगंगा के बाहर से आने वाली ब्रह्माण्डीय किरणों को बाहर ही रोक देती है। इन किरणों में अंतरिक्ष से आने वाले हानिकारक विकिरण होते हैं, जो हानिकारक भी हो सकते हैं।
टर्मिनेशन शॉक
thumb|टर्मिनेशन शॉक का एक उदाहरण, सिंक बेसिन से संबंधित
हेलियोपॉज़ के निकट आते ही सौर वायु धीमी होती जाती है और शॉक वेव जैसी बनती है, जिसे सौर वायु का टर्मिनेशन शॉक कहते हैं।
सन्दर्भ
श्रेणी:सौर मंडल
श्रेणी:सूर्य
श्रेणी:प्लाज्मा