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वाक्यकरण
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अंगूठाकार|वाक्यकरण का मुखपृष्ट
वाक्यकरण वह ग्रन्थ है जिस पर वाक्यपञ्चाङ्ग आधारित है।https://archive.org/details/vakyakaranawithlaghuparkasikasudararajaed.kuppannasastrit.s.sarmak.v._865_t/mode/2up?view=theater वाक्यकरण, सुन्दरराज की 'लघुप्रकाशिका' नामक टीका सहित T. S. Kuppanna Sastri and K. V. Sarma 1962 Kuppanna Sastri Research Institute Madras (Chennai) Sarma 11 January 2024 अर्थात वाक्यपञ्चाङ्ग में आकाशीय पिण्डों की स्थिति और आकाशीय घटनाओं (जैसे ग्रहण आदि) की प्राप्ति के लिये वाक्यकरण में दी गयी गणना-विधियों का उपयोग किया जाता है। वाक्यकरण में दी गयी गणना-विधियाँ खगोलीय सारणियों का उपयोग करतीं हैं जिनको कई शताब्दी पहले बनाया गया था। इन सारणियों में दिया गया प्रत्येक संख्यात्मक मान एक वाक्य (जैसे : 'धनवान् पुत्रः' या 'गुह्या सुरा राज्ञा' आदि) के रूप में है जो एक संख्या को निरूपित करता है। ये मान कटपयादि का उपयोग करते हुए निकाले जा सकते हैं। भिन्न-भिन्न आकाशीय पिण्डों के लिये भिन्न-भिन्न वाक्य-समुच्चय बनाये गये हैं। उदाहरण के लिये, चन्द्रमा के लिये जो वाक्य बनाये गये हैं उन्हें चन्द्रवाक्य कहते हैं जिसमें चन्द्रमा की स्थिति बताने के लिये कुल २४७ वाक्य हैं। मूल चन्द्रवाक्य, वररुचि द्वारा निर्मित माने जाते हैं। बाद में संगमग्राम के माधव ने संशोधित चन्द्रवाक्य बनाये । बुध, मंगल, शुक्र, बृहस्पति और शनि ग्रहों के लिये भी वाक्य-समूह बनाये गये हैं। ध्यातव्य है कि ये वाक्य अपने आप में वाक्यकरण के अन्तर्गत नहीं हैं।
सन्दर्भ
श्रेणी:भारतीय ज्योतिष ग्रंथ
श्रेणी:भारतीय खगोलिकी