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परहिया जनजाति
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जुलाई 2025
जुलाई 2025
परहिया जनजाति भारत के झारखंड राज्य की एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) है, जिसे भारत सरकार ने आधिकारिक मान्यता दी है। यह जनजाति मुख्यतः पलामू, गढ़वा, चतरा और लातेहार जिलों में निवास करती है। परहिया समुदाय की जीवनशैली, परंपराएँ और भाषा इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं।
उत्पत्ति और इतिहास
परहिया जनजाति की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न मत हैं। कुछ मानवविज्ञानी इन्हें आदिम शिकारी एवं खाद्य संग्राहक समुदायों की श्रेणी में रखते हैं। कई विद्वान मानते हैं कि परहिया समुदाय झारखंड के प्राचीन निवासियों में से एक है, जिनकी संस्कृति और जीवनशैली जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों से गहरे रूप से जुड़ी रही है।
भाषा और धर्म
परहिया जनजाति की बोली मुण्डारी भाषा परिवार से मिलती-जुलती है, जो स्थानीय बोलियों के प्रभाव में विकसित हुई है। अधिकांश परहिया लोग सरना धर्म के अनुयायी हैं और सरहुल, करम, सोहराई जैसे त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। इनमें प्रकृति पूजन, पवित्र वृक्षों (विशेषकर करम वृक्ष) की आराधना प्रमुख है।
सामाजिक और आर्थिक स्थिति
परहिया समुदाय की सामाजिक स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है। पारंपरिक रूप से ये लोग वन उत्पाद संग्रह, कृषि, और दैनिक मजदूरी पर निर्भर हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की दृष्टि से यह समुदाय अभी भी विकास की मुख्यधारा से काफी पीछे है।
जीवनयापन और संस्कृति
परहिया लोग जंगलों से लकड़ी, महुआ, साल बीज, जड़ी-बूटियाँ आदि एकत्र करते हैं। इनके पारंपरिक आवास मिट्टी और पत्तों से बने होते हैं। महिलाएं पारंपरिक पोशाक पहनती हैं और जनजातीय गहनों का प्रयोग करती हैं। समुदाय में आज भी लोकगीत, नृत्य और मौखिक परंपराओं का विशेष स्थान है।
सरकारी संरक्षण और योजनाएं
परहिया जनजाति को भारत सरकार द्वारा PVTG के रूप में अधिसूचित किया गया है। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं जैसे विशेष शिक्षा योजना, पोषण योजना, और वन अधिकार अधिनियम के माध्यम से इनके जीवन स्तर को सुधारने के प्रयास किए जा रहे हैं। झारखंड का आदिवासी कल्याण विभाग विशेष रूप से इनके लिए कार्यरत है।
इन्हें भी देखें
झारखंड की जनजातियाँ
सन्दर्भ