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यन्त्र (संस्कृत)

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यन्त्र शब्द भारतीय साहित्य में उपकरण, मशीन या युक्ति के अर्थ में आया है। ज्योतिष, रसशास्त्र, आयुर्वेद, गणित आदि में इस शब्द का प्रयोग हुआ है। ब्रह्मगुप्त द्वारा रचित ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त में 'यन्त्राध्याय' नामक २२वां अध्याय है। संस्कृत साहित्य में वर्णित कुछ यन्त्रों के नाम यन्त्रराज, दोलायन्त्र, तिर्यक्पातनयन्त्र, डमरूयन्त्र, ध्रुवभ्रमयन्त्र, पातनयन्त्र, राधायन्त्र, धरायन्त्र, ऊर्ध्वपातनयन्त्र, स्वेदनीयन्त्र, मूसयन्त्र, कोष्ठियन्त्र, यन्त्रमुक्त, खल्वयन्त्रhttps://www.wisdomlib.org/definition/yantra Yantra 7 मई 2018 https://web.archive.org/web/20180507153602/https://www.wisdomlib.org/definition/yantra 7 मई 2018 dead रसरत्नसमुच्चय के अध्याय ७ में रसशाला यानी प्रयोगशाला का विस्तार से वर्णन है। रसशाला में ३२ से अधिक यंत्रों का उपयोग किया जाता था, जिनमें मुख्य हैं- (१) दोल यंत्र (२) स्वेदनी यंत्र (३) पाटन यंत्र (४) अधस्पदन यंत्र (५) ढेकी यंत्र (६) बालुक यंत्र (७) तिर्यक्‌ पाटन यंत्र (८) विद्याधर यंत्र (९) धूप यंत्र (१०) कोष्ठि यंत्र (११) कच्छप यंत्र (१२) डमरू यंत्र। रसेन्द्रमंगल में निम्नलिखित यन्त्रों का उल्लेख है- ''शिलायन्त्र, पाषाण यन्त्र, भूधर यन्त्र, बंश यन्त्र, नलिका यन्त्र, गजदन्त यन्त्र, डोला यन्त्र, अधस्पातन यन्त्र, भूवस्पातन यन्त्र, पातन यन्त्र, नियामक यन्त्र, गमन यन्त्र, तुला यन्त्र, कच्छप यन्त्र, चाकी यन्त्र, वलुक यन्त्र, अग्निसोम यन्त्र, गन्धक त्राहिक यन्त्र, मूषा यन्त्र, हण्डिका कम्भाजन यन्त्र, घोण यन्त्र, गुदाभ्रक यन्त्र, नारायण यन्त्र, जलिका यन्त्र, चरण यन्त्र। त्र (यन्त्र) (संस्कृत) (जिसका शाब्दिक अर्थ होता है “मशीन, कॉन्ट्रैक्शन”) वास्तव में एक रहस्यमय आकृति है, जो मुख्य रूप से भारतीय धर्मों की तांत्रिक परंपराओं से संबंधित है। उनका उपयोग मंदिरों या घरों में देवताओं की पूजा तथा ध्यान में सहायता के लिए किया जाता है। हिंदू ज्योतिष और तांत्रिक ग्रंथों के आधार पर उनका उपयोग काल्पनिक गुप्त शक्तियों द्वारा दिए जाने वाले लाभों के लिए किया जाता है। मुख्य रूप से उनके सौंदर्य और सममित गुणों के कारण, इन्हें मंदिर में फर्श की सजावट के लिए भी उपयोग किया जाता है। विशिष्ट यंत्र परंपरागत रूप से विशिष्ट देवताओं से संबंधित होते हैं। भारत में यंत्र का वर्णन अब तक ११,०००-१०,००० वर्ष ईसापूर्व माना जाता है।https://books.google.co.in/books?id=NtKrbKIOL5wC&lpg=PA39&dq=baghor%20stone%20roots%20of%20tantra&pg=PA39 तंत्र की जड़ें हार्पर कॅथरिन ऍन ब्राउन रॉबर्ट एल. 2012-02-01 सुनी प्रेस 9780791488904 en 21 सितंबर 2018 https://web.archive.org/web/20180913074046/https://books.google.co.in/books?id=NtKrbKIOL5wC&lpg=PA39&dq=baghor%20stone%20roots%20of%20tantra&pg=PA39 13 सितंबर 2018 live सोन नदी घाटी में ऊपरी-पुरापाषाण संदर्भ में पाया गया बागोर पाषाण, शर्मा जी द्वारा सबसे पुराना उदाहरण http://www.oac.cdlib.org/view?docId=kt3f59n89f;NAAN=13030&doc.view=frames&chunk.id=d0e11490&toc.depth=1&toc.id=d0e11202&brand=calisphere वर्क इन इन आफ्रिकन प्रिहिस्ट्री अँड अर्ली ह्यूमन स्टडीज: टीमवर्क अॅन्ड इनसाइट www.oac.cdlib.org 2017-04-11 https://web.archive.org/web/20170912192919/http://www.oac.cdlib.org/view?docId=kt3f59n89f;NAAN=13030&doc.view=frames&chunk.id=d0e11490&toc.depth=1&toc.id=d0e11202&brand=calisphere 12 सितंबर 2017 live माना जाता है, जो पाषाण की खुदाई में शामिल थे। त्रिभुज के आकार का पत्थर, जिसके एक तरफ त्रिकोणीय नक्काशी की गई है, उसे गेरू से रंगा गया था, जिसे पूजा से संबंधित स्थल माना जाता था। यह पाया गया है कि उस समय क्षेत्र में देवियों की पूजा-अर्चना वर्तमान समय के समान तरीके से की जाती थी।केनोएर जे. एम. क्लार्क जे.डी. पाल जे.एन. शर्मा जी.आर. 1983-07-01 भारत में एक ऊपरी पालीओलिथिक मंदिर? https://www.cambridge.org/core/journals/antiquity/article/an-upper-palaeolithic-shrine-in-india/37143141A4BE7260CBC015681CE04539 पुरातनता ५७ ८८–९४ 10.1017/S0003598X00055253 21 सितंबर 2018 https://web.archive.org/web/20181228185834/https://www.cambridge.org/core/journals/antiquity/article/an-upper-palaeolithic-shrine-in-india/37143141A4BE7260CBC015681CE04539 28 दिसंबर 2018 liveकेनोयर, जो उत्खनन में भी शामिल थे,इसे शक्ति के साथ जुड़ा हुआ माना है। उपयोग और अर्थ यंत्र आमतौर पर एक विशेष देवता से जुड़े होते हैं और उनका उपयोग विशिष्ट लाभों के लिए उपयोग किया जाता हैं, जैसे: ध्यान के लिए; हानिकारक प्रभाव से सुरक्षा के लिए; विशेष शक्तियों का विकास करने के लिए; धन या सफलता को प्राप्त करने के लिए इत्यादि।डेनिस कुश कॅथरिन रॉबिन्सन मायकेल यॉर्क हिंदू धर्म का विश्वकोष https://books.google.com/books?id=3N4mGlbutbgC&pg=PA1028 २१ अगस्त २०१२ रूटलेज 978-1-135-18978-5 १०२८–१०२९ 21 सितंबर 2018 https://web.archive.org/web/20170422201457/https://books.google.com/books?id=3N4mGlbutbgC&pg=PA1028 22 अप्रैल 2017 live अक्सर घर पर या मंदिरों में दैनिक अनुष्ठानिक पूजा में उनका इस्तेमाल किया जाता है, और कभी-कभी ताबीज के रूप में पहना जाता है।खन्ना मधू गैले का एनसायक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन यन्त्र दुसरा जोन्स लिंडसे थॉमसन गैले २००५ ९८७१–९८७२ 0-02-865997-X ध्यान में सहायता के रूप में, यंत्र देवता का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसका उद्देश्य ध्यान है। ये यंत्र केंद्रीय-बिंदु, अर्थात् बिंदु से निकलते हैं। यंत्र में सामान्य रूप से केंद्र से संकेन्द्रित रूप से फैलती हुई अनेक ज्यामितीय आकृतियाँ, जैसे त्रिकोण, वृत्त, षट्भुज, अष्टभुज और कमल की प्रतीकात्मक पंखुड़ियाँ शामिल होती हैं। बाहर हिस्से में अक्सर चार मुख्य दिशाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला वर्ग शामिल होता है, जिनमें से प्रत्येक एक दरवाजा-युक्त होता हैं। यंत्र का एक लोकप्रिय रूप श्री चक्र, या श्री यंत्र है, जो त्रिपुरा सुंदरी के रूप में अपने देवी का प्रतिनिधित्व करता है। श्री चक्र में शिव का प्रतिनिधित्व भी शामिल है, और इसका निर्माण ब्रह्मांड के साथ उपयोगकर्ता की अपनी एकता के साथ-साथ सृजन और अस्तित्व की समग्रता दिखाने के लिए किया गया है। संरचनात्मक तत्त्व और प्रतीकात्मकता एक यंत्र में ज्यामितीय आकृतियाँ, छवियाँ, और लिखित मंत्र शामिल होते हैं। त्रिकोण और षट्भुज सामान्य हैं, जैसे वृत्त और ४ से १००० पंखुड़ियों के कमल सामान्य हैं। शिव और शक्ति यंत्र में अक्सर एक त्रिशूल का शूल शामिल होता है। मंत्र यंत्रों में अक्सर संस्कृत में लिखा मंत्र शामिल होता हैं। मधु खन्ना लिखते हैं कि, “यंत्र और मंत्र हमेशा संयोजन में पाए जाते हैं। ध्वनि को बहुत अधिक महत्वपूर्ण नहीं माना जाता है, क्योंकि इसके सार में रूप ध्वनि है जिसे पदार्थ के समान संघनित माना है।”खन्ना,मधु (२००३) ''यंत्र: लौकिक एकता का तांत्रिक प्रतीक, २१. आंतरिक परंपरा. 0-89281-132-3 978-0-89281-132-8 रंग पारंपरिक यंत्र में रंगों का उपयोग पूरी तरह से प्रतीकात्मक है, न कि केवल सजावटी या कलात्मक प्रदर्शन के लिए रंगों का उपयोग किया गया हैं। प्रत्येक रंग का उपयोग चेतना के विचारों और आंतरिक अवस्थाओं को दर्शाने के लिए किया जाता है। सफेद/लाल/ काला सबसे महत्वपूर्ण रंग संयोजनों में से एक है, जो तीन गुणों या प्रकृति के गण (प्रकृति) का प्रतिनिधित्व करता है। बिंदु पारंपरिक यंत्रों के केंद्र-बिंदु में एक बिंदु या पॉइंट होता है, जो यंत्र से जुड़े मुख्य देवता का प्रतिनिधित्व करता है। देवता के परिचरों को अक्सर केंद्र के चारों ओर ज्यामितीय भागों में दर्शाया जाता है। एक यंत्र में बिंदु को एक डॉट या छोटे वृत्त द्वारा प्रतिनिधित्व किया जा सकता है, या यह अदृश्य रह सकता है। यह उस बिंदु का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ से सभी सृजन उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी, लिंग भैरवी यंत्र के मामले में, बिंदु को लिंग के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।http://isha.sadhguru.org/blog/yoga-meditation/science-of-yoga/yantras-benefit/ "यंत्र क्या हैं और वे मुझे कैसे लाभ पहुंचा सकते हैं?" २०१४-०८-०९ इशा ब्लॉग २०१७-०४-११ en-US https://web.archive.org/web/20180519142136/http://isha.sadhguru.org/blog/yoga-meditation/science-of-yoga/yantras-benefit/ 19 मई 2018 deadhttps://www.rudraksha-ratna.com/p/yantras यंत्र की जानकारी रुद्राक्ष-रत्ना.कॉम en-US 21 सितंबर 2018 https://web.archive.org/web/20180921190904/https://www.rudraksha-ratna.com/p/yantras 21 सितंबर 2018 dead चित्रवीथी इन्हें भी देखें भारत में मापन प्रणालियों का इतिहास यंत्र (मशीन) यन्त्रराज सन्दर्भ यन्त्र तत्त्वं ISBN 978-1645462057 बाहरी कड़ियाँ Yantra (५ परिभाषाएँ) श्रेणी:सम्स्कृत शब्द श्रेणी:साहित्य श्रेणी:संस्कृत