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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

फणीश्वर नाथ 'रेणु'

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फणीश्वर नाथ 'रेणु' Phanishwar Nath Renu 2016 stamp of India.jpg yes 1921 3 4 Purnia, बिहार, भारत yes रेखा, पद्मा और लतिका रेणु कविता रॉय, पद्म पराग वेणु, नवनीता, अपरजीत, दक्षिणेश्वर प्रसाद राय, वहीदा रॉय yes 1977 4 11 1921 3 4 उपन्यासकार, कहानीकार, संस्मरणकार मैला आँचल शीला नाथ मंडल फणीश्वर नाथ 'रेणु' (4 मार्च 1921 - 11 अप्रैल 1977) हिंदी भाषा के साहित्यकार थे। इनके पहले उपन्यास मैला आँचल को बहुत ख्याति मिली। उन्हें आगे चलकर पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी एक कहानी ' मारे गए गुलफाम उर्फ तीसरी कसम ' जो बहुत चर्चित रही अभिनेता पंकज त्रिपाठी की पसंदीदा कहानी रही . जीवनी फणीश्वर नाथ 'रेणु' का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के अररिया जिले में फारबिसगंज के पास औराही हिंगना गाँव में हुआ था। उस समय यह पूर्णिया जिले में था। उनकी शिक्षा भारत और नेपाल में हुई। रेणु जी का बिहार के कटिहार से गहरा संबंध रहा है। शादी कटिहार जिले के हसनगंज प्रखंड अंतर्गत बलुआ ग्राम में काशी नाथ विश्वास की पुत्री रेखा रेणु से हुई ,हसनगंज के ही गांव महमदिया ग्राम में पद्मा रेणु की मायके हैं और रेणु जी के दो और पुत्री सबसे बड़ी कविता रॉय और छोटी वहीदा रॉय की शादी महमदिया और कवैया गांव में हुई है। प्रारंभिक शिक्षा फारबिसगंज तथा अररिया में पूरी करने के बाद रेणु ने मैट्रिक नेपाल के विराटनगर के विराटनगर आदर्श विद्यालय से कोईराला परिवार में रहकर की। इन्होने इन्टरमीडिएट काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1942 में की जिसके बाद वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। बाद में 1950 में उन्होने नेपाली क्रांतिकारी आन्दोलन में भी हिस्सा लिया जिसके परिणामस्वरुप नेपाल में जनतंत्र की स्थापना हुई। पटना विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के साथ छात्र संघर्ष समिति में सक्रिय रूप से भाग लिया और जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति में अहम भूमिका निभाई। 1952-53 के समय वे भीषण रूप से रोगग्रस्त रहे थे जिसके बाद लेखन की ओर उनका झुकाव हुआ। उनके इस काल की झलक उनकी कहानी तबे एकला चलो रे में मिलती है। उन्होने हिन्दी में आंचलिक कथा की नींव रखी। सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय, एक समकालीन कवि, उनके परम मित्र थे। इनकी कई रचनाओं में कटिहार के रेलवे स्टेशन का उल्लेख मिलता है। लेखन-शैली इनकी लेखन-शैली वर्णानात्मक थी, जिसमें पात्र की प्रत्येक मनोवैज्ञानिक सोच का विवरण लुभावने तरीके से किया होता था। पात्रों का चरित्र-निर्माण काफी तेजी से होता था क्योंकि पात्र एक सामान्य-सरल मानव मन (प्रायः) के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता था। इनकी लगभग हर कहानी में पात्रों की सोच घटनाओं से प्रधान होती थी। एक आदिम रात्रि की महक इसका एक सुंदर उदाहरण है। रेणु की कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने आंचलिक जीवन के हर धुन, हर गंध, हर लय, हर ताल, हर सुर, हर सुंदरता और हर कुरूपता को शब्दों में बांधने की सफल कोशिश की है। उनकी भाषा-शैली में एक जादुई सा असर है जो पाठकों को अपने साथ बांध कर रखता है। रेणु एक अद्भुत किस्सागो थे और उनकी रचनाएँ पढते हुए लगता है मानों कोई कहानी सुना रहा हो। ग्राम्य जीवन के लोकगीतों का उन्होंने अपने कथा साहित्य में बड़ा ही सर्जनात्मक प्रयोग किया है। इनका लेखन प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थवादी परंपरा को आगे बढाता है और इन्हें आजादी के बाद का प्रेमचंद की संज्ञा भी दी जाती है। अपनी कृतियों में उन्होंने आंचलिक पदों का बहुत प्रयोग किया है। साहित्यिक कृतियाँ उपन्यास रेणु को जितनी ख्याति हिंदी साहित्य में अपने उपन्यास मैला आँचल से मिली, उसकी मिसाल मिलना दुर्लभ है। इस उपन्यास के प्रकाशन ने उन्हें रातो-रात हिंदी के एक बड़े कथाकार के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। कुछ आलोचकों ने इसे गोदान के बाद इसे हिंदी का दूसरा सर्वश्रेष्ठ उपन्यास घोषित करने में भी देर नहीं की। हालाँकि विवाद भी कम नहीं खड़े किये उनकी प्रसिद्धि से जलनेवालों ने इसे सतीनाथ भादुरी के बंगला उपन्यास 'धोधाई चरित मानस' की नक़ल बताने की कोशिश की गयी। पर समय के साथ इस तरह के झूठे आरोप ठण्डे पड़ते गए। रेणु के उपन्यास लेखन में मैला आँचल और परती परिकथा तक लेखन का ग्राफ ऊपर की और जाता है पर इसके बाद के उपन्यासों में वो बात नहीं दिखी। मैला आंचल (1954) परती परिकथा (1957) जलूस दीर्घतपा (1964) कितने चौराहे (1966) कलंक मुक्ति (1972) पलटू बाबू रोड (1979) कथा-संग्रह ठुमरी (1959) एक आदिम रात्रि की महक (1967) अग्निखोर (1973) एक श्रावणी दोपहर की धूप (1984) अच्छे आदमी (1986) रिपोर्ताज ऋणजल-धनजल नेपाली क्रांतिकथा वनतुलसी की गंध श्रुत अश्रुत पूर्वे प्रसिद्ध कहानियाँ मारे गये गुलफाम (तीसरी कसम) एक आदिम रात्रि की महक लाल पान की बेगम पंचलाइट तबे एकला चलो रे ठेस संवदिया तीसरी कसम पर इसी नाम से राजकपूर और वहीदा रहमान की मुख्य भूमिका में प्रसिद्ध फिल्म बनी जिसे बासु भट्टाचार्य ने निर्देशित किया और सुप्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र इसके निर्माता थे। यह फिल्म हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाती है। हीरामन और हीराबाई की इस प्रेम कथा ने प्रेम का एक अद्भुत महाकाव्यात्मक पर दुखांत कसक से भरा आख्यान सा रचा जो आज भी पाठकों और दर्शकों को लुभाता है। सम्मान उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। बाहरी कड़ियाँ रेणु रचनावली, भाग - ५ (गूगल पुस्तक) एक श्रावणी दोपहरी की धूप (गूगल पुस्तक ; लेखक - फणीश्वर नाथ ' रेणु ') फणीश्वर नाथ ' रेणु ' : चुनी हुई रचनाएँ (गूगल पुस्तक) परती परीकथा (गूगल पुस्तक ; लेखक - फणीश्वर नाथ ' रेणु ') अभिव्यक्ति जालस्थल पर फणीश्वर जी के बारे में श्रेणी:1921 में जन्मे लोग श्रेणी:१९७७ में निधन श्रेणी:हिन्दी साहित्यकार (जन्म १९२१-१९३०) श्रेणी:हिन्दी उपन्यासकार