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दुरसाजी आढ़ा

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श्रेणी:Articles with hCards दुरसा जी आढ़ा राष्ट्रकवि Hinduwadi Pratham Rashtra Kavi Dursa Arha.jpg हिंदुवादी प्रथम राष्ट्रकवि दुरसा जी आढ़ा 1535 धूँदला, पाली जिला(पहले जोधपुर) 1655 पाँचेटिया कवि योद्धा सलाहकार डिंगल राजस्थानी भाषा विरुद छिहत्तरी किरतार बावनी भारमल, जगमाल, सादुल, कमजी, और किसनाजी।दुरसा जी आढ़ा (ई. 1535-1655) भारत के 16वीं सदी के योद्धा और राजस्थानी ( डिंगल ) कवि थे। http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.120404 Rajasthan District Gazetteers Pali Sehgal K. k 1960 उन्हें भारत के 'प्रथम राष्ट्रवादी कवि' की संज्ञा प्राप्त है। इसका कारण उनका मुगलों के खिलाफ मेवाड़ के महाराणा प्रताप के संघर्ष के पक्ष में अपनी साहसी डिंगल कविताओं में प्रखर राष्ट्रवादी स्वर है। https://books.google.com/books?id=MWlDAAAAYAAJ&q=%22%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE+%E0%A4%86%E0%A5%9D%E0%A4%BE%22 Saṃskṛti 1978 Śikshā Mantrālaya hi वह उस समय के सबसे उच्च माने जाने वाले कवियों में से एक हैं, जो मुगल दरबार का एक मूल्यवान और सम्मानजनक हिस्सा भी थे। वह एक उत्कृष्ट साहित्यकार, इतिहासकार, युद्ध सेनापति, सलाहकार, मध्यस्थ, प्रशासक थे। उनके कई पूर्ववर्ती राज्यों के शासकों के साथ घनिष्ठ संबंध थे। अपने जीवनकाल में अर्जित धन, प्रसिद्धि और सम्मान के आधार पर और राजस्थान के इतिहास और साहित्य में उनके योगदान के आधार पर, राजस्थान के इतिहासकार और साहित्यकार उन्हें सबसे महान कवियों में से एक मानते हैं।https://www.google.com/search?kgmid=/g/12bm7rbqx&hl=en-IN&q=A+History+of+Rajasthan&kgs=d420f7e0d66e2246&shndl=0&entrypoint=sh/x/kp A History of Rajasthan - Google Search www.google.com 2021-05-10 दुरसा जी आढ़ा के समान वैभव और आभिजात्य की ऊँचाइयां किसी कवि द्वारा स्पर्श किया जाना इतिहास में कतिपय ही देखा गया है। दिल्ली साहित्य अकादमी की 'भारतीय साहित्य के निर्माता' नामक सूची में भारतीय इतिहास के महान साहित्यकारों में दुरसा जी आढ़ा का नाम सम्मिलित है। उन्होंने महाराणा प्रताप की प्रशंसा में कविताएँ लिखीं, और जब प्रताप के निधन की खबर मुगल दरबार में पहुँची, तो निडर होकर अकबर की उपस्थिति में प्रताप का बखान किया। http://archive.org/details/dli.bengal.10689.21542 MEDIEVAL INDIAN LITERATURE AN ANTHOLOGY VOL. 4 N.A. 1959 SAHITYA AKADEMI, NEW DELHI रोचक बात है कि दुरसा जी से 4 पीढ़ी पश्चात् मेवाड़ के सिसौदिया वंश का मूल गाँव सिसौदा भी, दुरसा जी के वंशजों को ही जागीर में मिला जहाँ वे आज तक निवास करते हैं। प्रारंभिक जीवन दुरसाजी आढ़ा का जन्म 1535 ए.डी. (विक्रम संवत 1592 माघ सुदी चौहदस) में सोजत परगने (पाली) व मारवाड़ राज्य के धूँदला गांव में चारणों की आढ़ा शाखा में हुआ था। उनके पिताजी मेहाजी आढ़ा हिंगलाज माता के अनन्य भक्त थे और उन्होंने तीन बार बलूचिस्तान में हिंगलाज शक्तिपीठ की तीर्थयात्रा की। http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.444009 Dursa Aarha Rawat saswat 1983 उनके पूर्वज जालौर जिले के असाडा के गांव से संबन्धित थे और इस प्रकार उनकी शाखा का नाम आढ़ा पड़ा। https://books.google.com/books?id=ObFCT5_taSgC&q=duraso&pg=PA73 The Encyclopaedia of Indian literature Volume One (A To Devo) Sahitya Akademi 1987 9788126018031 Datta Amaresh 73–74 दुरसाजी आढ़ा अपने पिता की ओर से गौतम के वंश में पैदा हुआ थे, जबकि उनकी मां धनी बाईजी चारणों की बोगसा शाखा से थी व विख्यात गोविंदजी बोगसा की बहन थी। जब दुरसाजी छह वर्ष के थे, उनके भक्त पिता मेहाजी आढ़ा फिर से हिंगलाज की तीर्थ यात्रा पर चले गए और इस बार उन्होंने वहीं पर संन्यास ले लिया। इसलिए पिता की अनुपस्थिति में घर चलाने के लिए उन्हें एक किसान के खेत में बाल मजदूर का काम करना पड़ा। कठिनाइयां मारवाड़ राज्य के धुंदला गांव में एक खेत में काम करने वाला एक बालक बालवाड़ी में सिंचाई कर रहा था, लेकिन उस लड़के से सिंचाई के लिए इस्तेमाल की जा रही रेत का कच्चा नाला टूट जाने से दोनों तरफ से पानी निकलने लगा। गुस्साए किसान ने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए उस बालक को टूटे रास्ते में डाल दिया और उस पर मिट्टी डाल दी, ताकि उसकी फसल की सिंचाई के लिए पानी का फैलाव न हो। http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.444009 Dursa Aarha Rawat saswat 1983Rawat, saswat (1983). Dursa Aarha. उस समय बगड़ी नामक जागीर के सामंत ठाकुर प्रताप सिंह अपने घोड़ों को चराने के लिए किसान के खेत में स्थित कुएं पर आए थे, जब उनकी नजर खेत की मिट्टी में दबे लड़के पर पड़ी, तो वह चौंक गए।जब यह ज्ञान हुआ कि वह बालक एक चारण था, वह लड़के को अपने साथ सोजत ले गये और उसकी उचित शिक्षा और दीक्षा की व्यवस्था की। कुछ वर्षों में, वह बच्चा एक सक्षम प्रशासक, योद्धा और एक प्रतिभाशाली कवि और विद्वान बन गया । वही बालक महाकवि दुरसाजी आढ़ा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.444009 Dursa Aarha Rawat saswat 1983Rawat, saswat (1983). Dursa Aarha. जीवन दुरसाजी ने अपनी शिक्षा और प्रशिक्षण समाप्त होने के बाद न केवल एक प्रतिभाशाली कवि बन गए थे, उनकी तलवार भी उनकी कलम की तरह तेज़ थी। उनकी कुशाग्र बुद्धि को देखते हुए बगड़ी के ठाकुर प्रताप सिंह ने उन्हे अपना प्रधान सलाहकार और सेनापति नियुक्त किया। दुरसा जी को पुरस्कार के रूप में धूँदला और नाथलकुडी नाम के दो गाँवों की जागीर से नवाजा गया। http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.272117 History Of Sirohi Raj Lala Sita Ram 1920 दुरसाजी आढ़ा और सिरोही राज्य 1583 ई. में, मुगल सम्राट अकबर ने सिरोही के राव सुरतन सिंह के खिलाफ जगमाल सिसोदिया (मेवाड़ ) के पक्ष में एक सेना भेजी, मारवाड़ राज्य ने भी जगमल के पक्ष में सुरतन सिंह के खिलाफ मोर्चा खोला। उस सेना में मारवाड़ से बगड़ी ठाकुर प्रताप सिंह और दुरसाजी आढ़ा भी थे। दोनों सेनाएं आबू के निकट दातानी नामक स्थान पर भिड़ी, जिसमें प्रताप सिंह जी की लड़ते हुए मृत्यु हो गई और दुरसाजी गंभीर रूप से घायल हो गये। शाम को, महाराव सुरतान सिंह अपने सामंतों सहित अपने घायल सैनिकों की देखभाल कर रहे थे, जब उन्हें दुरसाजी आढ़ा मिले और वह उन्हें अफीम का दूध (दर्द रहित तरीके से जीवन समाप्त करने के लिए) देने वाले थे। घायल दुरसाजी ने किसी प्रकार अपना परिचय देने में सफल रहे, उन्होंने कहा कि वह एक चारण हैं, और सबूत के रूप में, उन्होंने योद्धा समरा देवड़ा की प्रशंसा में तुरंत एक दोहे की रचना की, जो उस युद्ध में वीरतापूर्वक लड़ते हुए मारा गया था। http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.272117 History Of Sirohi Raj Lala Sita Ram 1920Lala Sita Ram (1920). History Of Sirohi Raj. महाराव इस दोहे को सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए और दुरसाजी के चारण होने की पहचान होने पर ; उन्हे स्वयं अपनी डोली( पालके) में साथ ले गए और उनके घावों का इलाज करवाया। राव सुरतन सिंह ने दुरसाजी की प्रतिभा से प्रसन्न होकर उन्हे अपने साथ रहने के लिए कहा और अपने किले के प्रोलपात (किले के रक्षक) की पदवी की पेशकश की। दुरसाजी ने सुरतान सिंह के इस सम्मान को स्वीकार लिया और उन्हें उंड, पेशुआ, झांकर, साल नाम के 4 गाँवों की जागीर से नवाजा गया। इसके बाद दुरसा जी सिरोही में रहे। http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.272117 History Of Sirohi Raj Lala Sita Ram 1920Lala Sita Ram (1920). History Of Sirohi Raj. महाकवि दुरसाजी ने तत्कालीन मुगल शासकों के राजनीतिक उद्देश्यों को समझा और अपनी कविताओं के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त करने में कभी असफल नहीं हुए। राजस्थान में जब वे मेवाड़ पहुंचे तो महाराणा अमर सिंह ने स्वयं दुरसाजी का भव्य स्वागत किया और बड़ी पोल पर उनका स्वागत किया। https://books.google.com/books?id=MWlDAAAAYAAJ&q=%22%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE+%E0%A4%86%E0%A5%9D%E0%A4%BE%22 Saṃskṛti 1978 Śikshā Mantrālaya hiSaṃskṛti (in Hindi). Śikshā Mantrālaya. 1978. श्रेणी:CS1 Hindi-language sources (hi) दुरसाजी आढ़ा ने चारणों द्वारा 1586 ईस्वी में मोटा राजा उदय सिंह के खिलाफ किए गए आउवा के धरने का नेत्रत्व किया। https://books.google.com/books?id=DA0MAAAAIAAJ&q=%22%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE+%E0%A4%86%E0%A5%9D%E0%A4%BE%22 Māravāṛa kā sāṃskr̥tika itihāsa Rāṭhauṛa Vikramasiṃha 1996 Rājasthānī Granthāgāra hi दुरसाजी आढ़ा के शासन की जागीरें उंड,‌‌‌‍‌‌‌‌‌‌ धूँदला, नातल कुड़ी, पाँचेटिया, जसवंतपुरा, गोदावास, हिंगोला खुर्द, लुंगिया, पेशुआ, झांकर, साल,डागला, वराल, शेरुवा, पेरुवा, रायपुरिया, दुथारिया, कांगड़ी, तसोल। इनके अलावा, बीकानेर के राजा राय सिंह ने दुरसाजी को चार गांवों की जागीर से सम्मानित किया, जिसकी पुष्टि बीकानेर के इतिहास से होती है। http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.444009 Dursa Aarha Rawat saswat 1983Rawat, saswat (1983). Dursa Aarha. इमारतें और स्मारक दुरसाजी के अपनी जागीरों में निर्माण संबंधित कार्य:- http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.444009 Dursa Aarha Rawat saswat 1983Rawat, saswat (1983). Dursa Aarha. पेशुआ 1. दुरसालाव पेशुआ (तालाब) 2. बालेश्वरी माता मंदिर (मंदिर) 3. कानको दे सती स्मारक (स्मारक) 4. पेशुआ का शाशन थड़ा झांकर 1. फुतेला तलाव (तालाब) 2. झांकर का थड़ा पाँचेटिया 1. किसनालाव पाँचेटिया (तालाब) 2. शिव मंदिर (मंदिर) 3. दुर(सा)श्याम मंदिर (मंदिर) 4. धौळिया महल (धवल महल) 5. काळिया महल (काला महल) हिंगोला खुर्द 1. हिंगोला महल (महल) 2. हिंगोला का तालाब (तालाब) रायपुरिया 1. बावड़ी (बावड़ी) का निर्माण,इस बावड़ी का निर्माण मेवाड़ रियासत के रायपुरिया गांव में किया गया था, जहां से पानी पाँचेटिया (मारवाड़) तक पहुंचाया जाता था, क्योंकि आउवा के धरने के बाद दुरसाजी जी ने मारवाड़ के पानी को त्याग दिया था। http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.444009 Dursa Aarha Rawat saswat 1983Rawat, saswat (1983). Dursa Aarha. दुरसाजी आढ़ा के सम्मान में राजाओं द्वारा पुरस्कार मध्ययुगीन काल में लाख पसाव या करोड़ पसाव नामक पुरस्कारों से प्रतिभाशाली चारणों का सम्मान किया जाता था। जब कभी प्रसिद्ध चारण कवि एक राजपूत शासक के दरबार में जाते थे, तो उन्हें राजाओं द्वारा हाथी, पालकी या घोड़े पर बैठा कर उनका राजकीय सम्मान किया जाता था। http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.444009 Dursa Aarha Rawat saswat 1983Rawat, saswat (1983). Dursa Aarha. करोड़ पसाव पुरस्कार: राय सिंह जी बीकानेर द्वारा करोड़ पसाव राव सूरतन सिंह सिरोही द्वारा करोड़ पसाव मान सिंह आमेर द्वारा करोड़ पसाव महाराणा अमर सिंह मेवाड़ द्वारा करोड़ पसाव महाराजा गज सिंह मारवाड़ द्वारा करोड़ पसाव जाम सत्ती द्वारा करोड़ पसाव मुगल सम्राट अकबर द्वारा 3 करोड़ पसाव (व्यक्तिगत चीजों के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया था, बल्कि लोगों के कल्याण में खर्च किया गया था यानी तालाब (तालाब), बावड़ी ( बावड़ी ), कुवा (कुएं), आदि के निर्माण में खर्च किया गया था।) http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.444009 Dursa Aarha Rawat saswat 1983Rawat, saswat (1983). Dursa Aarha. मृत्यु और विरासत दुरसा जी आढ़ा विषमता और विपन्नता के अंधकार से उठकर संपन्नता, ऐश्वर्य और उससे भी अधिक, राष्ट्र गौरव के तेज से साहित्य क्षितिज का चमकता नक्षत्र बन जाने वाले एक विलक्षण व्यक्तित्व हैं। सत्यनिष्ठा और प्रतिभा पर कोई भी चुनौती ग्रहण नहीं बन सकती है, दुरसा जी का जीवन उसका श्रेष्ठ उदाहरण है। बचपन में कठिनाईयों का सामना करना पड़ा था, लेकिन उन्होंने प्रशासक और काव्य प्रतिभा से सम्मान अर्जित किया। वह दिल्ली, बीकानेर, जोधपुर और सिरोही सहित कई शाही दरबारों का हिस्सा रहे। मुगल बादशाह अकबर के साथ भी उनके अच्छे संबंध थे। https://books.google.com/books?id=ObFCT5_taSgC&q=duraso&pg=PA73 The Encyclopaedia of Indian literature Volume One (A To Devo) Sahitya Akademi 1987 9788126018031 Datta Amaresh 73–74Datta, Amaresh, ed. (1987). The Encyclopaedia of Indian literature Volume One (A To Devo). Sahitya Akademi. pp. 73–74. ISBN 9788126018031. दुरसा जी आढ़ा की 2 पत्नियाँ थीं और उनसे उनके 4 पुत्र थे, जिनका नाम भारमल, जगमाल, सादुल, कमजी और किसना जी था। http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.444009 Dursa Aarha Rawat saswat 1983Rawat, saswat (1983). Dursa Aarha. अपने अंतिम दिनों में वह अपने बेटे किसना जी के साथ पाँचेटिया गांव (पाली ज़िला, राजस्थान) में रहते थे, जहां 1655 में उनकी मृत्यु हो गई। https://books.google.com/books?id=ObFCT5_taSgC&q=duraso&pg=PA73 The Encyclopaedia of Indian literature Volume One (A To Devo) Sahitya Akademi 1987 9788126018031 Datta Amaresh 73–74Datta, Amaresh, ed. (1987). The Encyclopaedia of Indian literature Volume One (A To Devo). Sahitya Akademi. pp. 73–74. ISBN 9788126018031. उनकी मृत्यु पर, उनकी दो पत्नियों के साथ, एक पासवान और दो सेविकाएं सती हुईं। http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.444009 Dursa Aarha Rawat saswat 1983Rawat, saswat (1983). Dursa Aarha. रचनाएँ दुरसाजी आढ़ा द्वारा लिखी गई कविताएँ ज्यादातर उस समय के शासकों की वीरता और युद्दों से संबंधित हैं, लेकिन कई सांसारिक मामलों का भी वर्णन करती हैं। अकबर और महाराणा प्रताप के बारे में उनके लेखन के मामले में, उन्होंने अपने विषयों की उपलब्धियों को व्यक्तिगत रूप से तब भी माना जब वे लगातार एक-दूसरे के विरोधी थे। उन्होंने हिंदू धर्म में अपनी गहरी आस्था व्यक्त थी, हिंदू नायकों की बहादुरी की सराहना की और मुगलों के अन्याय के बारे में लिखा। https://books.google.com/books?id=ObFCT5_taSgC&q=duraso&pg=PA73 The Encyclopaedia of Indian literature Volume One (A To Devo) Sahitya Akademi 1987 9788126018031 Datta Amaresh 73–74Datta, Amaresh, ed. (1987). The Encyclopaedia of Indian literature Volume One (A To Devo). Sahitya Akademi. pp. 73–74. ISBN 9788126018031. उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं: https://books.google.com/books?id=ObFCT5_taSgC&q=duraso&pg=PA73 The Encyclopaedia of Indian literature Volume One (A To Devo) Sahitya Akademi 1987 9788126018031 Datta Amaresh 73–74Datta, Amaresh, ed. (1987). The Encyclopaedia of Indian literature Volume One (A To Devo). Sahitya Akademi. pp. 73–74. ISBN 9788126018031. विरुद छिहत्तरी (महाराणा प्रताप के सम्मान में) दोहा सोलंकी वीरमदेवजी रा झूलना राव सुरतन रा मरसिया राव सुरतन रा झूलना राजा मानसिंह कच्छवाहा रा झूलाना रावत मेघा रां गीत राजी श्री रोहितासजी रा झूलना राव अमरसिंह गजसिंहोत (नागौर के राव अमरसिंह की वीरतापूर्ण कविता) किरतार बावनी माताजी रा छंद श्री कुमार अज्जाजी और भुचर मोरी नि गजगत संदर्भ   श्रेणी:1538 में जन्मे लोग श्रेणी:कवि श्रेणी:राजस्थानी कवि श्रेणी:चारण