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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

लीलावती

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लीलावती, भारतीय गणितज्ञ भास्कर द्वितीय द्वारा सन ११५० ईस्वी में संस्कृत में रचित, गणित और खगोल शास्त्र का एक प्राचीन ग्रन्थ है।यह सिद्धान्त शिरोमणि का एक भाग है जिसमें अंकगणित का विवेचन किया गया है। इसमें 625 श्लोक हैं। 'लीलावती', भास्कराचार्य की पुत्री का नाम था या उनकी पत्नी का । इस ग्रन्थ में पाटीगणित (अंकगणित), बीजगणित और ज्यामिति के प्रश्न एवं उनके उत्तर हैं। प्रश्न प्रायः लीलावती को सम्बोधित करके पूछे गये हैं। किसी गणितीय विषय (प्रकरण) की चर्चा करने के बाद लीलावती से एक प्रश्न पूछते हैं। उदाहरण के लिये निम्नलिखित श्लोक देखिये- अये बाले लीलावति मतिमति ब्रूहि सहितान् द्विपञ्चद्वात्रिंशत्‍त्रिनवतिशताष्टादश दश। शतोपेतानेतानयुतवियुतांश्चापि वद मे यदि व्यक्ते युक्तिव्यवकलनमार्गेऽसि कुशला ॥ (लीलावती, परिकर्माष्टक, १३) (अये बाले लीलावति ! यदि तुम जोड़ और घटाने की क्रिया में दक्ष हो गयी हो तो (यदि व्यक्ते युक्तिव्यवकलनमार्गेऽसि कुशला) (इनका) योगफल (सहितान् ) बताओ- द्वि पञ्च द्वात्रिंशत् (32), त्रिनवतिशत् (193), अष्टादश (18), दश (10) -- इनमें १०० जोड़ते हुए (शतोपेतन), १० हजार से (अयुतात् ) इनको घटा दें (वियुताम्) तो। ) लीलावती का उपसंहार भास्कराचार्य ने निम्नलिखित श्लोक से किया है- येषां सुजातिगुणवर्गविभूषिताङ्गी शुद्धाखिल व्यवहृतिः खलु कण्ठसक्ता । लीलावतीह सरसोक्तिमुदाहरन्ती तेषां सदैव सुखसम्पदुपैति वृद्धिम् ॥ अर्थ - जिन शिष्यों को जोड़, घटाना, गुणन, भाग, वर्ग, घन आदि व्यवहारों, गणित के अवयवों निर्दोषगणित आदि से विभूषित लीलावती ग्रन्थ कण्ठस्थ होता है, उनकी गणित सम्पत्ति सदा वर्धमान होती है। सन १८४२ में अमीचन्द्र श्रवग ने लीलावती का हिन्दी में अनुवाद किया। वर्ण्यविषय लीलावती में १३ अध्याय हैं जिनमें निम्नलिखित विषयों का समावेश है- १. परिभाषा २. परिकर्म-अष्टक (संकलन (जोड़), व्यवकलन (घटाना), गुणन (गुणा करना), भाग (भाग करना), वर्ग (वर्ग करना), वर्गमूल (वर्ग मूल निकालना), घन (घन करना), घनमूल (घन मूल निकालना)) ३. भिन्न-परिकर्म-अष्टक ४. शून्य-परिकर्म-अष्टक ५. प्रकीर्णक ६. मिश्रक-व्यवहार - इसमें ब्याज, स्वर्ण की मिलावट आदि से सम्बन्धित प्रश्न आते हैं। ७. श्रेढी-व्यवहार ८. क्षेत्र-व्यवहार ९. खात-व्यवहार १०. चिति-व्यवहार ११. क्रकच-व्यवहार १२. राशि-व्यवहार १३. छाया-व्यवहार १४. कुट्टक १५. अंक-पाश लीलावती के कुछ प्रश्न लीलावती के पार्थः कर्णवधाय मार्गणगणं क्रुद्धो रणे सन्दधे तस्यार्धेन निवार्य तच्छरगणं मूलैश्चतुभिर्हयान् । शल्यं षड्भिरथेषुभिस्त्रिभिरपि च्छत्रं ध्वजं कार्मुकम् चिच्छेदास्य शिरः शरेण कति ते यानर्जुनः सन्दधे ॥ ७६ ॥ (भागमूलोन-दृष्ट श्लोक-४) अन्वयः- पार्थः रणे क्रुद्धः सन् कर्णवधाय मार्गणगणं सन्दधे । तस्यान तच्छरगणं निवार्य तथा चतुभिः मूलैः ह्यान् निवार्य तथा षड्भिः इषुभिः शल्यं निवार्य । अथ त्रिभिः छत्रं ध्वजं कामुकम् अपि चिच्छेद । शरेण अस्य शिरः चिच्छेद। तर्हि कति ते बाणाः । यान् रणे अर्जुनः सन्दधे ॥४॥ अर्थ:- पृथा के पुत्र (अर्जुन) ने क्रोध से भरकर रण में कर्ण को मारने के लिए कुछ बाणों का समूह लिया। उसमें से आधे बाणों से कर्ण के बाणों को काट डाला और उस बाणगण के चतुर्गुणित मूल से उसके घोड़ों को मार डाला और ६ बाणों से उसके सारथी शल्य को यमराज का अतिथि बनाया। फिर तीन ३ बाणों से छत्र, ध्वजा और धनुष को तोड़ डाला। पीछे एक बाण से कर्ण का शिर काट डाला। तो कहो उस रण में अर्जुन ने कुल कितने बाण लिये थे? ॥४॥ लीलावती के क्षेत्रव्यवहार प्रकरण में भास्कराचार्य ने त्रिकोणमिति पर प्रश्न, त्रिभुजों तथा चतुर्भुजों के क्षेत्रफल, पाई का मान और गोलों के तल के क्षेत्रफल तथा आयतन के बारे में जानकारी दी है- व्यासे भनन्दाग्नि (३९२७) हते विभक्ते , खबाणसूर्यैः (१२५०) परिधिस्तु सूक्ष्मः ॥ द्वाविंशति (२२) घ्ने वृहितेथ शैलैः (७) स्थूलोऽथवा स्याद व्यवहारः योग्यः॥ अर्थात पाई का सूक्ष्म मान = ३९२७/१२५० , और पाई का स्थूल मान = २२/७ है। https://web.archive.org/web/20160304141940/https://books.google.co.in/books?id=kzHyr5yd7hAC&printsec=frontcover#v=onepage&q&f=false 4 मार्च 2016 संसार के महान गणितज्ञ, पृष्ट ९१ (गूगल पुस्तक ; गुणाकर मूले) [ भनन्दाग्नि = भ + नन्द + अग्नि ---> भम् (नक्षत्र) - २७, नन्द (नन्द राजाओं की संख्या) - ९, अग्नि - ३ (जठराग्नि, बड़वाग्नि, तथा दावाग्नि) , भनन्दाग्नि - ३९२७ (ध्यान रखे, अंकानां वामतो गतिः --> अंकों को दायें से बायें तरफ रखना है), खम् (आकाश) - ०, बाण - ५, सूर्याः - १२, खबाणसूर्याः - १२५०, शैलम् - ७] निम्नलिखित प्रश्न, गायत्री छन्द से सम्बन्धित क्रमचय के बारे में है- प्रस्तारे मित्र गायत्र्याः स्युः पादे व्यक्तयः कति। एकादिगुरवश्चाशु कथ्यतां तत्पृथक् पृथक् ॥११०॥ [The metre गायत्री has six syllables। The number of possible times the long syllable occurs in any पाद in a metre with sixsyllables is six, then umber of times it occurs twice is fifteen and so on, so that the sum total of all its occurrences is 64 (including the case when it does not occur at all। For the गायत्री छन्द with four पाद, the number of all such possibilities is 644 = 16777216 ]. लीलावती कौन थी कुछ लोगों का विचार है कि लीलावती नाम की भास्कराचार्य की कन्या थी। जबकि सम्पूर्ण ग्रन्थ का अध्ययन करने पर यह कल्पना आ ही नहीं सकती। उदाहरण के लिए, भिन्न परिक्रमाष्टक प्रकरण के प्रारम्भ में गणेश स्तुति करते हुए लिखते हैं- लीलागललुलल्लोलकालव्यालविलासिने गणेशाय नमो नीलकमलामलकान्तये। इस प्रकार, 'लीला' शब्द से ग्रन्थ आराम्भ हुआ है। इसके बाद स्थान-स्थान पर 'लीला' या 'लीलावती' शब्द प्रयुक्त हुआ है। लीलावती ग्रन्थ का अन्तिम श्लोक इस बात का प्रमाण है कि लीलावती, भास्कराचार्य की पत्नी का नाम है। येषां सुजातिगुणवर्गविभूषिताङ्गी शुद्धाखिल व्यवहृति खलु कण्ठासक्ता। लीलावतीह सरसोक्तिमुदाहरन्ती तेषां सदैव सुखसम्पदुपैति वृद्धिम्॥ इस श्लोक के स्पष्टतः दो अभिप्राय हैं- (१) भावार्थ - जिन शिष्यों को जोड़, घटाना, गुणन, भाग, वर्ग, घन आदि व्यवहारों, गणित के अवयवों निर्दोषगणित आदि से विभूषित लीलावती ग्रन्थ कण्ठस्थ होता है, उनकी गणित सम्पत्ति सदा वर्धमान होती है। (२) भावार्थ- उच्च कुलपरम्परा में उत्पन्न, सुन्दर, सुशील, गुणसम्पत्तिसम्पन्न, स्वच्छव्यवहारप्रिया, सुकोमल एवं मधुरभाषिणी पत्नी जिनके कण्ठासक्ता हो (अर्थात अर्धाङ्गिनी हो) , उनकी सुख सम्पत्ति इस जगत में सदा सुखद, सुभद एवम वर्धमान होती है। अतएव उक्त सद्गुणसम्पन्ना आर्या लीलावती नाम की श्रीमती को आचार्य भास्कर की अर्धाङ्गिनी होने का ऐतिहासिक गौरव प्राप्त है। https://books.google.co.in/books?id=4xnU26NeZZMC&printsec=frontcover#v=onepage&q&f=false गणेशदैवज्ञकृत ग्रहलाघवम्, पृष्ठ २० 3 अप्रैल 2018 https://web.archive.org/web/20180403234844/https://books.google.co.in/books?id=4xnU26NeZZMC&printsec=frontcover#v=onepage&q&f=false 3 अप्रैल 2018 live लीलावती की टीकाएँ लीलावती की लगभग ६८ टीकाएँ सूचीकृत हैं। इनमें से तीन टीकाएँ प्रकाशित हो चुकीं हैं- (१) गणेश दैवज्ञ की बुद्धिविलासिनी (२) महीधर का लीलावती-विवरण (३) शंकर वरियार एवं नारायण द्वारा रचित क्रियाक्रमकरी इन्हें भी देखें सिद्धान्त शिरोमणि बीजगणित (संस्कृत ग्रन्थ) गणिताध्याय गोलाध्याय आर्यभटीय दश-गीतिका-पाद गणित-पाद काल-क्रिया-पाद गोल-पाद सूर्यसिद्धान्त सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ sa लीलावती लीलावती (संस्कृत विकिस्रोत) लीलावती, 'तत्त्वप्रकाशिका' हिन्दी टीका सहित (टीकाकार : लषणलाल झा) Lilavati of Bhaskaracharya-Original Book in English Translation Leelaawatii of Bhaskaracharya (कृष्णजी शंकर पटवर्धन) लीलावती (उत्तरार्धरूपो द्वितीयो भागः) (आनन्दाश्रम) लीलावती (उत्तरार्धरूपो द्वितीयो भागः) (२००७ संस्करण; आनन्दाश्रम) Bhaskaracharya's Lilavathiदिसंबर 2021 InternetArchiveBot - Book Review Bhaskara खगोल मण्डल Leelaavati - Eight Operations Leelaavati - the 'net' of numbers गणित काव्य लीलावती (अनिल कुमार ठाकुर) लीलावती में काव्य सौन्दर्य (पूनम घई) गणित डर नहीं था: लीलावती की अनकही कथा, जब संख्या कहानी बनी और गणना ने सभ्यता रची श्रेणी:संस्कृत ग्रन्थ श्रेणी:भारतीय गणित श्रेणी:गणित का इतिहास श्रेणी:भारत का सामाजिक इतिहास