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411 समाचार
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बुल्ला की जाना

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बुल्ला की जाना (بُلھا کیہ جاناں (शाहमुखी), ਬੁਲ੍ਹਾ ਕੀ ਜਾਣਾਂ (गुरुमुखी)) पंजाबी सूफी संत बुल्ले शाह द्वारा लिखित सबसे प्रसिद्ध काफ़ी कविताओं में से एक है। 1990 के दशक में पाकिस्तानी रॉक बैंड जुनून ने, "बुल्ला की जाना" को एक गीत का रूप दिया। 2005 में, रब्बी शेरगिल का रॉक संस्करण भारत और पाकिस्तान में बहुत लोकप्रिय हुआ। http://www.telegraphindia.com/1050604/asp/calcutta/story_4806895.asp Soundscape for the soul ज़ीशान जावेद द टेलीग्राफ कोलकाता 4 जून 2005 2008-04-23 https://web.archive.org/web/20171201115830/https://www.telegraphindia.com/1050604/asp/calcutta/story_4806895.asp 1 दिसंबर 2017 live http://www.hindu.com/mp/2005/04/11/stories/2005041100540100.htm Urban balladeer द हिन्दू बागेश्री एस 26 मार्च 2005 2008-04-23 https://web.archive.org/web/20140416134120/http://www.hindu.com/mp/2005/04/11/stories/2005041100540100.htm 16 अप्रैल 2014 live भारत से एक पंजाबी सूफ़ी समूह, वडाली बंधुओं ने भी अपने एलबम आ मिल यार... कॉल ऑफ़ द बिलवेड में "बुल्ला की जाना" का एक संस्करण जारी किया है। एक और संस्करण लखविंदर वडाली द्वारा "बुल्ला" के नाम से प्रदर्शित किया गया। अपने पहले एल्बम "वज्ज" में अरीब अजहर ने भी इस कविता पर आधारित एक गीत जारी किया। बोल ना मैं मोमन विच मसीतां ना मैं विच कुफ़र दीआं रीतां ना मैं पाकां विच पलीतां ना मैं मूसा ना फरऔन बुल्ला की जाणा मैं कौण ना मैं अन्दर बेद किताबां ना विच भंगां ना शराबां ना विच रिन्दां मसत खराबां ना विच जागन ना विच सौण बुल्ला की जाणा मैं कौण ना विच शादी ना ग़मनाकी ना मैं विच पलीती पाकी ना मैं आबी ना मैं ख़ाकी ना मैं आतिश ना मैं पौण बुल्ला की जाणा मैं कौण ना मैं अरबी ना लाहौरी ना मैं हिन्दी शहर नगौरी ना हिन्दू ना तुर्क पशौरी ना मैं रहन्दा विच नदौण बुल्ला की जाणा मैं कौण ना मैं भेत मज़हब दा पाइआ ना मैं आदम हवा जाइआ ना मैं आपना नाम धराइआ ना विच बैठण ना विच भौण बुल्ला की जाणा मैं कौण अव्वल आखर आप नूं जाणां ना कोई दूजा होर पछाणां मैथों होर ना कोई स्याणा बुल्हा शाह खढ़ा है कौण बुल्ला की जाणा मैं कौण सन्दर्भ श्रेणी:पंजाबी कविता श्रेणी:सूफी संगीत