411 REFERENCE · Wikipedia
गणेश पुराण
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
thumb|right|250px|श्रीतत्त्वनिधि (१९ वी शताब्दी) में गणेश जी का चित्रण
किसी भी पूजा-अर्चना या शुभ कार्य को सम्पन्न कराने से पूर्व गणेश जी की आराधना की जाती है। यह गणेश पुराण अति पूजनीय है। इसके पठन-पाठन से सब कार्य सफल हो जाते हैं।
पहला खण्ड - आरम्भ खण्ड -
इस खंड में ऐसी कथाएं सूत जी ने सुनाई हैं जिनके पढ़ने या सुनने से हमेशा सब जगह मंगल ही होगा। सूत जी ने सबसे पहली कथा द्वारा बताया है कि किस प्रकार प्रजाओं की सृष्टि हुई और सर्वश्रेष्ठ देव भगवान गणेश का आविर्भाव किस प्रकार हुआ।
आगे सूत जी ने शिव के अनेक रूपों का वर्णन किया है। वे कैसे सृष्टि की उत्पत्ति, संहार और पालन करते हैं। साथ ही यह भी बताया गया है कि विष्णु का एक वर्ष शिव के एक दिन के बराबर होता है। साथ ही सती की कथा है जिसका विवाह शिवजी से हुआ।
दूसरा खण्ड - परिचय खण्ड -
दूसरा खण्ड परिचय खण्ड है जिसमें गणेश जन्म कथाओं का परिचय दिया गया है। इसमें अलग-अलग पुराणों के अनुसार कथा कही गई है। जैसे पद्म व लिंग पुराण के अनुसार और अंत में गणेश की उत्पत्ति की सविस्तार से कथा है।
तीसरा खण्ड - माता पार्वती खण्ड -
तीसरा खण्ड माता पार्वती खण्ड है। इसमें पार्वती के पर्वतराज हिमालय के घर जन्म की कथा है और शिव से विवाह की कथा। आगे कार्तिकेय के जन्म की कथा है जिसमें तारकासुर के अत्याचार से लेकर कार्तिकेय के जन्म की कथा है। इस खण्ड में वशिष्ठ जी द्वारा सुनाई अरण्यराज की कथा है।
चौथा खण्ड - युद्ध खण्ड -
चौथा खण्ड युद्ध खण्ड : नाम खण्ड है। इसमें आरम्भ में मत्सर नामक असुर के जन्म की कथा है जिसने दैत्य गुरु शुक्राचार्य से शिव पंचाक्षरी मन्त्र की दीक्षा ली। आगे तारक नामक असुर की कथा है। उसने ब्रह्मा की अराधना कर त्रैलोक्य का स्वामित्व प्राप्त किया। साथ में इसमें महोदर व महासुर के आपसी युद्ध की कथा है। लोभासुर व गजानन की कथा भी है जिसमें लोभासुर ने गजानन के मूल महत्त्व को समझा और उनके चरणों की वंदना करने लगा। इसी तरह आगे क्रोधासुर व लम्बोदर की कथा है।
पांचवा खण्ड - महादेव पुण्य कथा खण्ड -
पांचवा खण्ड महादेव पुण्य कथा खण्ड है। इसमें सूत जी ने ऋषियों को कहा, आप कृपा करके गणेश, पार्वती के युगों का परिचय दीजिए। तब आगे इस खण्ड में सतयुग, त्रेतायुग व द्वापर युग के बारे में बताया गया है। जन्मासुर, तारकासुर की कथा से इसका अन्त हुआ है।
संक्षिप्त कथा
बहुत प्राचीन समय की बात है कि एक बार नैमिषारण्य में कथाकार सूतजी पधारे। उन्हें आया देखकर वहां रहने वाले ऋषि मुनियों ने उनका अभिवादन किया। अभिवादन के बाद सभी ऋषि-
मुनि अपने-अपने आसन पर बैठ गए तब उन्हीं में से किसी एक ने सूतजी से कहा-‘‘हे सूत जी ! आप लोक और लोकोत्तर के ज्ञान-ध्यान से परिपूर्ण कथा वाचन में सिद्धहस्त हैं। हमारा
आप से निवेदन है कि आप हमें हमारा मंगल करने वाली कथाएँ सुनायें।’’
ऋषि-मुनियों से आदर पाकर सूतजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा-‘‘आपने जो मुझे आदर दिया है वह सराहनीय है। मैं यहां आप लोगों को परम कल्याणकारी कथा सुनाऊंगा।’’
सूतजी ने कहा-‘‘बह्मा, विष्णु, महेश, ब्रह्म के तीन रूप हैं। मैं स्वयं उनकी शरण में रहता हूं। यद्यपि विष्णु संसार पालक हैं और वह ब्रह्मा की उत्पन्न की गयी सृष्टि का पालन करते हैं। ब्रह्मा
ने ही सुर-असुर, प्रजापति तथा अन्य यौनिज और अयौनिज सृष्टि की रचना की है। रुद्र अपने सम्पूर्ण कल्याणकारी कृत्य से सृष्टि के परिवर्तन का आधार प्रस्तुत करते हैं। पहले तो मैं तुम्हें बताऊंगा कि किस प्रकार प्रजाओं की सृष्टि हुई और फिर उनमें सर्वश्रेष्ठ देव भगवान गणेश का आविर्भाव कैसे हुआ। भगवान ब्रह्मा ने जब सबसे पहले सृष्टि की रचना की तो उनकी प्रजा नियमानुसार पथ में प्रवृत्ति नहीं हुई। वह सब अलिप्त रह गए। इस कारण ब्रह्मा ने सबसे पहले तामसी सृष्टि की, फिर राजसी। फिर भी इच्छित फल प्राप्त नहीं हुआ। जब रजोगुण ने तमोगुण को ढक लिया तो उससे एक मिथुन की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा के चरण से अधर्म और शोक से इन्सान ने जन्म लिया। ब्रह्मा ने उस मलिन देह को दो भागों में विभक्त कर दिया। एक पुरुष और एक स्त्री। स्त्री का नाम शतरूपा हुआ। उसने स्वयंभू मनु का पति के रूप में वरण किया और उसके साथ रमण करने लगी।
रमण करने के कारण ही उसका नाम रति हुआ। फिर ब्रह्मा ने विराट का सृजन किया। तब विराट से वैराज मनु की उत्पत्ति हुई। फिर वैराज मनु और सतरूपा से प्रियव्रत और उत्तानुपात दो पुत्र उत्पन्न हुए और आपूति तथा प्रसूति नाम की दो पुत्रियां हुईं।
इन्हीं दो पुत्रियों से सारी प्रजा उत्पन्न हुई। मनु ने प्रसूति को दक्ष के हाथ में सौंप दिया। जो प्राण है, वह दक्ष है और जो संकल्प है, वह मनु है। मनु ने रुचि प्रजापति को आपूति नाम की कन्या भेंट की। फिर इनसे यज्ञ और दक्षिणा नाम की सन्तान हुई। दक्षिणा से बारह पुत्र हुए, जिन्हें याम कहा गया। इनमें श्रद्धा, लक्ष्मी आदि मुख्य हैं। इनसे फिर यह विश्व आगे विकास को प्राप्त हुआ।
अधर्म को हिंसा के गर्भ से निर्कति उत्पन्न हुई और अन्निद्ध नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। फिर इसके बाद यह वंश क्रम बढ़ता गया। कुछ समय बाद नीलरोहित, निरुप, प्रजाओं की उत्पत्ति हुई और उन्हें रुद्र नाम से प्रतिष्ठित किया गया। रुद्र ने पहले ही बता दिया था कि यह सब शतरुद्र नाम से विख्यात होंगे। यह सुनकर ब्रह्माजी प्रसन्न हुए और फिर इसके बाद उन्होंने पृथ्वी पर मैथुनी सृष्टि का प्रारम्भ करके शेष प्रजा की सृष्टि बन्द कर दी।
सूतजी की बातें सुनकर ऋषि-मुनियों ने कहा, ‘‘आपने हमें जो बताया है उससे हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। आप कृपा करके हमें हमारे पूजनीय देव के विषय में बताइये। जो देवता हमें पूज्य हो और उसकी कृपा से हमारे और आगे आने वाली प्रजाओं के कल्याणकारी कार्य सम्पन्न हों।’’ ऋषियों की बात सुनकर सूतजी ने कहा कि ऐसा देव तो केवल एक ही है और वह है महादेव और पार्वती के पुत्र श्री गणेश।
बाहरी कडियाँ in
वेद-पुराण - यहाँ चारों वेद एवं दस से अधिक पुराण हिन्दी अर्थ सहित उपलब्ध हैं। पुराणों को यहाँ सुना भी जा सकता है।
महर्षि प्रबंधन विश्वविद्यालय-यहाँ सम्पूर्ण वैदिक साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है।
ज्ञानामृतम् - वेद, अरण्यक, उपनिषद् आदि पर सम्यक जानकारी
वेद एवं वेदांग - आर्य समाज, जामनगर के जालघर पर सभी वेद एवं उनके भाष्य दिये हुए हैं।
वेद-विद्या_डॉट_कॉम
श्रेणी:गणेश
श्रेणी:संस्कृत साहित्य
श्रेणी:पुराण
श्रेणी:वैदिक धर्म